लेख
29-Nov-2025
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केंद्रीय चुनाव आयोग द्वारा एसआईआर का जो मकडजाल बुना गया है। इस मकडजाल में फंसकर अब चुनाव आयोग भी फड़फड़ा रहा है, लेकिन उससे बाहर निकलने का कोई रास्ता उसे भी नहीं मिल रहा है। विपक्षी दल एसआईआर की मार से कराह रहे हैं उन्हें भी इस एसआईआर के मकडजाल से निकलने का कोई रास्ता नहीं मिल रहा है। सुप्रीम कोर्ट में पिछले 5 महीने से एसआईआर को लेकर सुनवाई चल रही है। सुप्रीम कोर्ट के महान न्यायाधीशों को भी समझ में नहीं आ रहा है। इस एसआईआर के मकडजाल से वह कैसे बाहर निकलें। खंडपीठ के न्यायाधीश इस मामले की सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश बन गए। इसके बाद भी एसआईआर की सुनवाई खत्म नहीं हुई, ना ही कोई अंतिम फैसला सुप्रीमकोर्ट इतने महीने के बाद भी कोई रास्ता निकाल पा रही है। कई राज्य सरकारों ने अलग-अलग पिटीशन सुप्रीम कोर्ट में दाखिल कर रखी हैं। देश के महान अधिवक्ता इस मामले में लगातार अपनी दलीलें रख रहे हैं। तारीख पर तारीख के अलावा उनके हाथ में कुछ नहीं लग पा रहा है। एसआईआर की जब सुनवाई शुरू हुई थी, उस समय बिहार विधानसभा चुनाव के लिए कई महीने बाकी थे। चुनाव आयोग ने वहां चुनाव भी करा दिया, लेकिन जिस विवाद को लेकर विपक्ष और स्वयंसेवी संगठन सुप्रीम कोर्ट पहुंचे थे, वह आज भी नतीजे को लेकर अपना हाथ मल रहे हैं। चुनाव आयोग की जादूगरी और दूरदर्शिता को लेकर सभी विपक्षी दल हैरान और परेशान है। एसआईआर बाद में शुरू होती है, चुनाव आयोग पहले ही संभावना व्यक्त कर देता है, कि इतने लाख वोट इस राज्य में कटेंगे। चुनाव आयोग जो कहता है, और जो करना चाहता है, वह कर पाता है। सुप्रीम कोर्ट हर बार सुनवाई करने के बाद यह कहती है, यदि कोई गड़बड़ी होगी तो वह एसआईआर को निरस्त कर देंगे। इसी बीच बिहार राज्य के चुनाव संपन्न हो गए। चुनाव परिणाम आ गये,वहां पर एनडीए गठबंधन की सरकार भी बन गई। भाजपा ने जो दावे किए थे। उससे ज्यादा सीटें उन्हें बिहार में मिल गई हैं। अब 12 राज्यों में एसआईआर चल रही है। चुनाव आयोग की इस कार्रवाई से 12 राज्यों के मतदाताओं का जीवन दूभर हो गया है। मतदाता 2003 की मतदाता सूची में अपने जिंदा और मरे हुए पूर्वजों और रिश्तेदारों को खोज रहे हैं। कहीं कुछ मिल रहे हैं, कहीं नहीं मिल पा रहे हैं। कुछ रिश्तो को चुनाव आयोग मानता नहीं है। रही सही कसर बीएलओ और असिस्टेंट बीएलओ पूरी कर रहे हैं। जितने कम समय में सघन परीक्षण करवाया जा रहा है। वह उतने कम समय में संभव ही नहीं है। चुनाव आयोग हथेली में दही जमाना चाहता है, या दही के बहाने कुछ और जमाना चाहता है। इसको लेकर तरह-तरह की बातें सामने आने लगी हैं। हाल ही में मध्य प्रदेश के दतिया में भारतीय जनता पार्टी और संघ के पदाधिकारियों को दतिया के निर्वाचन अधिकारी ने असिस्टेंट बीएलओ बनाकर उन्हें मतदाता सूची के काम में लगा दिया था। मध्य प्रदेश कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष जीतू पटवारी ने इस तरह की नियुक्ति पर आपत्ति जताई, जांच कराई गई तो जीतू पटवारी के आरोप सही पाए गए। उसके बाद दतिया कलेक्टर ने माफी मांगते हुए चुनाव अधिकारी को निलंबित किया। जो असिस्टेंट बीएलओ बनाए गए थे उनकी नियुक्तियां निरस्त की गई। एसआईआर को लेकर अन्य राज्यों में नये -नये कारनामे उजागर हो रहे हैं। बिहार के बीएलओ ने बिना मतदाता के घर जाए मनमाने तरीके से जिसके वोट बनाने थे, उनके बना दिए। लगभग 62 लाख से अधिक मतदाताओं के नाम काट दिये। जिनके नाम कटे, उनमे अधिकांश मुस्लिम और गरीब थे। जिनके नाम अंतिम समय जोड़े गए। राजनैतिक दल उसकी सूची खोज रहे हैं। चुनाव आयोग से वह सूची नहीं मिल रही है। सरकार और सुप्रीमकोर्ट की सरपरस्ती होने से चुनाव आयोग बिना किसी विचार विमर्श के मनमाने निर्णय ले रहा है। अभी तक 30 से अधिक बीएलओ की मौते विभिन्न राज्यों में हो चुकी हैं। बीएलओ अलग - अलग राज्यों में प्रदर्शन कर रहे हैं। विपक्षी दल इसे हत्या बता रहे हैं। चुनाव आयोग मानने तैयार नहीं है, बीएलओ की मौतें चुनाव काम के दबाव से हुई हैं। बिहार में एसआईआर के बाद लाखों मतदाताओं के नाम कट गए। अभी भी मतदाता सूची में डुप्लीकेट वोटर बने हुए हैं। इतने सघन परीक्षण के बाद भी लाखों मतदाताओं की गड़बड़ी बनी हुई है। चुनाव आयोग जादूगर की तरह जो करतब दिखा रहा है। देश के लोग खुली आंखों से जादू देख रहे हैं। जादे के इस करतब को लोग चुनाव आयुक्त के कार्यों को जिस तरह से किया जा रहा है। उनके पास विश्वास करने के अलावा कोई विकल्प भी नहीं है। केन्द्र सरकार और न्यायपालिका से मिले वरदान के कारण चुनाव आयोग अजेय है। न्यायपालिका चुनाव आयोग को नियंत्रित कर सकती है। चुनाव आयोग को जो वरदान मिला हुआ है। उसकी काट न्यायपालिका के पास नहीं है। ऐसी स्थिति में यही कहा जा सकता है। समरथ को नहीं दोष गुसांई। ब्रम्हा-विष्णु और महेश का वरदान राम राज में चुनाव आयोग के पास है। ऐसी स्थिति में चुनाव आयोग जो चाहेगा, वही होगा। वैसे भी जिले की मतदाता सूची हो, या मतगणना सभी का एकाधिकार केन्द्रीय चुनाव आयोग के पास है। परिणाम भी डिजीटल मशीनों से आ रहे हैं। ऐसी स्थिति में चुनाव आयोग पर जिसकी कृपा होगी वही चुनाव जीतेगा। मतदाता अब चुनाव आयोग की मतदाता सूची में कैद है। जहॉ चुनाव आयोग की इच्छा होगी, वोट वहीं जाएंगे। ईएमएस/29/11/2025