दिवाली और छठ पूजा पर अपने घर गए यूपी–बिहार के लाखों प्रवासी श्रमिक अब सूरत, मुंबई, उदयपुर, चित्तौड़गढ़ और देश के अन्य औद्योगिक शहरों की ओर लौट रहे हैं। लेकिन वापसी की यह यात्रा उनके लिए पहले से अधिक कष्टदायक, महंगी और जोखिमभरी साबित हो रही है। रेल प्रशासन द्वारा पर्याप्त विशेष ट्रेनों की व्यवस्था न किए जाने, बस ऑपरेटरों द्वारा मनमाना किराया वसूलने, और जनरल कोचों में भयावह भीड़ जैसी समस्याओं ने मजदूरों की मुश्किलें कई गुना बढ़ा दी हैं। यह स्थिति केवल यात्रियों की परेशानी नहीं, बल्कि उन औद्योगिक क्षेत्रों के लिए भी गंभीर चुनौती है, जिनकी अर्थव्यवस्था यूपी–बिहार के श्रमिकों पर निर्भर है।खासकर सूरत का टेक्सटाइल सेक्टर उत्सव की उमंग के बाद लौटने का संघर्ष है।दिवाली और छठ बिहार-यूपी के लिए सबसे बड़े सामाजिक,धार्मिक पर्व माने जाते हैं। इन दिनों प्रवासी श्रमिक अपने परिवारों के बीच रहना चाहते हैं, इसलिए लाखों की संख्या में लोग वापस अपने गाँव,कस्बों की ओर जाते हैं। लेकिन त्योहारऔर चुनाव खत्म होते ही जब वे रोज़गार के लिए लौटना चाहते हैं, तो उन्हें सबसे पहले जिस समस्या का सामना करना पड़ता है, वह है कन्फर्म टिकट का संकट।कन्फर्म टिकट एक सपना बन गया है।सूरत, अहमदाबाद, मुंबई, दिल्ली, राजस्थान सहित देश के प्रमुख औद्योगिक शहरों से यूपी–बिहार आने वाली लगभग सभी ट्रेनों में वेटिंग 300 से 600 तक पहुंच चुकी है। सूरत–पटना,उधना–छपरामुंबईदरभंगा अहमदाबाद–गोरखपुर सूरत,भागलपुर आदि इन सभी ट्रेनों में एक भी कन्फर्म सीट मिलना लगभग नामुमकिन हो चुका है। स्थिति यह है कि त्योहार वाले सप्ताह में भर गई वेटिंग अब भी कम होने का नाम नहीं ले रही। जनरल कोच बने है दहनिय डिब्बे ।कन्फर्म टिकट न मिलने के कारण लाखों यात्री मजबूरी में जनरल कोचों में सफर कर रहे हैं।इन डिब्बों की स्थिति इतनी दयनीय है कि लोग इसे दहनिय कोच कहने लगे हैं।भीड़, घुटन, गर्मी और जान जोखिम में डालने वाली यात्रा हो गई है। एक कोच की क्षमता 100-120 यात्रियों की होती है, लेकिन इसमें 400-500 लोग ठूंसे जा रहे हैं।शौचालय तक पहुंचना असंभव है।खड़े रहने की जगह तक नहीं।बच्चे, महिलाएं और बुजुर्ग सबसे ज्यादा परेशान होते है।रेल प्रशासन इस भीड़ को नियंत्रित करने में असमर्थ दिखाई देता है। सुरक्षा और स्वास्थ्य के लिहाज से यह स्थिति बेहद खतरनाक है। बस ऑपरेटरों की मनमानी की वजह से किराया ढाई से तीन गुना बढ़ा दिया गया है।जब ट्रेन में जगह नहीं मिलती, तो श्रमिकों के पास बस का विकल्प बचता है। लेकिन बस ऑपरेटर स्थिति का फायदा उठाकर यात्रियों से मनमाना किराया वसूल रहे हैं। बिहार–यूपी से सूरत का किराया सामान्य दिनों मे 1800–2200 रुपये होता है।मौजूदा स्थिति में वसूला जा रहा किराया 5000 रुपये तक है। किराए में न भोजन मिलता है न आराम, और कई बार तो असुरक्षित व अवैध बसों में यात्रा करनी पड़ती है। दिहाड़ी मजदूरों के लिए यह खर्च बहुत भारी पड़ता है। जो लोग त्योहार के दौरान अपनी जमा-पूंजी खर्च कर चुके होते हैं, वे लौटते समय कर्ज लेने को मजबूर हो जाते हैं। बाधित यात्रा का सबसे बड़ा असर सूरत की टेक्सटाइल इंडस्ट्री पर खतरा है। सूरत, जो देश का सबसे बड़ा सिंथेटिक टेक्सटाइल हब है, उसकी रीढ़ यूपी–बिहार के ही श्रमिक हैं। पावरलूम, डाइंग, प्रिंटिंग, एम्ब्रॉयडरी और फिनिशिंग यूनिट्स में काम करने वाले 60–70% मजदूर इन्हीं राज्यों से आते हैं।सूरत उद्योग की हालत खराब क्यों पड़ रही है? त्योहार के बाद मशीनें आधी बंद पड़ी हैं।मजदूर नहीं लौटने से उत्पादन घट रहा है।ऑर्डर पूरे न होने से व्यापारियों की परेशानी बढ़ी।छोटे मालिकों को दैनिक नुकसान उठाना पड़ रहा है। यदि श्रमिक इसी तरह देरी से लौटते रहे, तो सूरत की टेक्सटाइल इकाइयों पर गंभीर असर पड़ सकता है।क्रिसमस–न्यू ईयर का सीजन भी प्रभावित होगी।।बिहार–यूपी की ट्रेनों में वेटिंग लगातार बढ़ रही है।रेलवे की वेबसाइट और टिकट काउंटरों पर रोज यात्रियों की भीड़ देखी जा रही है। हर ट्रेन में वेटिंग सूची बढ़ती ही जा रही है क्योंकिश्रमिक एक साथ लौटना चाहते हैं।अभी सीमित ट्रेनें चल रही हैं।इन ट्रेनों में जनरल कोच बढ़ाया जाए।लेकिन फिर भी अतिरिक्त कोच और विशेष ट्रेनें पर्याप्त नहींहै। परिणामस्वरूप, यात्रियों की परेशानी दिनोंदिन बढ़ती जा रही है।. उद्योग जगत और यात्रियों की मांग है कि तुरंत अतिरिक्त ट्रेनें चलें।यूपी-बिहार के संगठनों, सामाजिक संस्थाओं, सूरत के उद्योगपतियों और श्रमिक संगठनों की एक ही मांग है कि रेल प्रशासन तुरंत अतिरिक्त विशेष ट्रेनें चलाए। पटना, बनारस, मुजफ्फरपुर, सीतामढ़ी, कटिहार, भागलपुर, छपरा से आने वाली अतिरिक्त स्पेशल ट्रेनें बढ़ाई जाए। जनरल कोचों की संख्या को दोगुना किया जाए।रेल प्रशासन अगर यह कदम उठाता है तो यात्रा का दबाव काफी हद तक कम हो सकता है। मुंबई–उदयपुर–चित्तौड़गढ़: यहां तो रोज की एक भी ट्रेन नहीं जहाँ यूपी–बिहार जाने वाले यात्री ट्रेनें न मिलने से परेशान हैं, वहीं दूसरी ओर मुंबई, उदयपुर और चित्तौड़गढ़ जैसे महत्वपूर्ण रूटों पर भी रोज़ की एक स्थायी ट्रेन तक उपलब्ध नहीं है। इन मार्गों पर कामकाजी लोग छात्र ,व्यापारिक ,यात्रा पर्यटक सभी को वैकल्पिक साधनों पर निर्भर रहना पड़ता है। इसका सीधा असर रोजगार, पर्यटन और व्यापार पर पड़ रहा है। क्यों हर साल दोहराती है यह समस्या?यह समस्या नई नहीं है। दिवाली-छठ के बाद हर साल यही दृश्य देखने को मिलता है। . पुरानी रेल संरचना ट्रैकों की क्षमता सीमित है।मांग के अनुसार ट्रेनें नहीं बढ़ रहीं। लाखों की संख्या में प्रवासी श्रमिक, जिनकी यात्रा एक ही समय में होती है।राज्य सरकारों और रेल मंत्रालय में समन्वय की कमी।बस ऑपरेटरों पर नियंत्रण नहीं।जब तक इन बिंदुओं पर स्थायी समाधान नहीं होता, समस्या साल–दर–साल बढ़ती जाएगी।भीड़ का दबाव सिर्फ यात्रा को असुविधाजनक नहीं बनाता, बल्कि यह सुरक्षा और स्वास्थ्य के लिए भी बड़ा खतरा है।ओवरलोडेड बसें सड़क दुर्घटनाओं की संभावना बढ़ाती हैं।जनरल कोचों में दम घुटने, बेहोशी, चोट–लगने जैसी घटनाएं आम हो चुकी हैं। लंबी यात्रा में साफ-सफाई न होने से संक्रमण का खतरा। श्रमिक भावनात्मक रूप से भी परेशान रहते हैं।काम पर लौटना जरूरी है, पर रास्ता सुरक्षित नहीं है। विशेष ट्रेनों की संख्या बढ़ाई जाए।सूरत, मुंबई, अहमदाबाद जैसे शहरों से यूपी–बिहार के लिए 10 अतिरिक्त ट्रेनें तुरंत चलाई जा सकती हैं। डिमांड आधारित ट्रेन संचालनजरूरी है। त्योहारी सीजन में रेलवे को मांग के अनुसार कोच और रूट तय करने चाहिए।राज्य सरकारों को बस ऑपरेटरों पर दरें तय करने और अवैध बसों पर कार्रवाई करनी चाहिए।श्रमिकों के लिए विशेष “इंडस्ट्रीयल ट्रेनें” सूरत–मुंबई–अहमदाबाद जैसे शहरों से 12 महीनों तक कुछ तय ट्रेनें श्रमिकों के लिए आरक्षित की जा सकती हैं। यूपी–बिहार के प्रवासी श्रमिक देश के उद्योगों, विशेषकर सूरत के टेक्सटाइल सेक्टर, मुंबई के निर्माण कार्य, राजस्थान के पत्थर उद्योग और अन्य कई क्षेत्रों की रीढ़ हैं।यदि ये श्रमिक सुरक्षित और सम्मानजनक तरीके से अपने कार्यस्थलों तक नहीं पहुंच पाएंगे, तो केवल वे ही नहीं, बल्कि देश की औद्योगिक अर्थव्यवस्था भी प्रभावित होगी। सरकार, रेलवे प्रशासन और राज्य सरकारों को समन्वय बनाकर इस वार्षिक संकट का स्थायी समाधान निकालना होगा। यात्रियों की सुविधा, श्रमिकों की सुरक्षा और उद्योगों की निरंतरता तीनों एक–दूसरे से जुड़ी हुई हैं। ( L 103 जलवन्त टाऊनशिप पूणा बॉम्बे मार्केट रोड नियर नन्दालय हवेली सूरत मो 99749 40324 वरिष्ठ पत्रकार,साहित्यकार स्तम्भकार) ईएमएस / 27 नवम्बर 25