रावण और अन्य राक्षसों के अत्याचार से पृथ्वी, सब देवता, मुनि और गन्धर्व ब्रह्माजी के सत्यलोक गए। पृथ्वी ने गौ का रूप धारण किया था। शिवजी भी कहते हैं कि हे पार्वती मैं भी उनके साथ प्रभु को ढूँढ रहे थे कि आकाशवाणी हुई। हे मुनि सिद्ध और देवताओं के स्वामियों! डरो मत! तुम्हारे लिए मैं मनुष्य का रूप धारण करूँगा और पवित्र सूर्यवंश में अंशों सहित मनुष्य का अवतार लूँगा। मैं पृथ्वी का सब भार हर लूँगा। हे देवताओं तुम निर्भय हो जाओ। भगवान की वाणी सुनकर सब देवता तुरन्त लौट गए। उस समय ब्रह्माजी ने पृथ्वी को समझाया। यहीं से रावण को परास्त करने की योजना एवं रावण के विरुद्ध देवताओं की सेना की तैयारी का श्रीगणेश हुआ। दोहा- निज लोकहि बिरंचि गे देवन्ह इहदू सिखाई। बानर तनु धरि धरि महि हरि पद सेवहु जाई।। श्रीरामचरितमानस बालकाण्ड दो. १९७ देवताओं को यही सिखाकर कि वानरों का शरीर धर-धर कर तुम लोग पृथ्वी पर जाकर भगवान के चरणों की सेवा करो, ब्रह्माजी अपने लोक चले गए। सभी देवता भी अपने-अपने लोक को चले गए। पृथ्वी सहित सबके मन को शान्ति मिली। पृथ्वी पर उन्होंने वानर देह धारण किया। उनमें अपार बल और प्रताप था। वे पृथ्वी पर पहुँच कर भगवान के आने की प्रतीक्षा करने लगे, बस यहाँ से श्रीराम की सेना की उत्पत्ति हुई। शिवजी ने उमाजी को इनकी संख्या का जो वर्णन मानस में किया है वह अद्भुत है। बानर कटक उमा मैं देखा। सो मूरुरव जो करन चह लेखा।। आइ राम पद नावहिं माथा। निरखि बदनु सब होहि सनाथा।। श्रीरामचरितमानस किष्किन्धाकाण्ड २२-१ शिवजी कहते हैं कि हे उमा! वानरों की वह सेना मैंने देखी थी। उसकी जो गिनती करना चाहे वह महान मूर्ख है। सब वानर आ-आकर श्रीरामजी के चरणों में मस्तक नवाते हैं और श्रीमुख दर्शन करके कृतार्थ होते हैं। वाल्मीकिरामायण में श्रीराम की वानर सेना शुक तथा सारण नामक गुप्तचर ने रावण को श्रीराम की वानर सेना के बारे में कहा कि राजन जिन्हें आप मतवाले महाराजाओं के समान वहाँ खड़ा देख रहे हैं जो गंगा नदी के तट के वटवृक्षों और हिमालय के शाल वृक्षों के समान जान पड़ते हैं, इनका वेग दुस्सह है। ये इच्छानुसार रूप धारण करने वाले और बलवान हैं। दैत्यों और दानवों के समान शक्तिशाली तथा युद्ध में देवताओं के समान पराक्रम प्रकट करने वाले हैं- एषां कोटिसहस्राणि नव पञ्च च सप्त च। तथा शंकु सहस्राणि तथा वृन्दशनि च।। एते सुग्रीवसचिवारू किष्किन्धानिलयारू सदा। हरयो देवगन्धर्वैत्पन्नारू कामरुपिणरू।। वाल्मीकिरामायण युद्धकाण्ड सर्ग २८-५ इनकी संख्या इक्कीस कोटि सहस्र शंकु और सौ वृन्द हैं। (इन संख्याओं की स्पष्ट व्याख्या लेख में नीचे किया गया है।) ये सब के सब वानर सदा किष्किन्धा में रहने वाले और सुग्रीव के मन्त्री हैं। इनकी उत्पत्ति देवताओं और गन्धर्वों से हुई है। ये सभी इच्छानुसार रूप धारण करने में समर्थ हैं। मनीषी पुरुष सौ लाख की संख्या को एक कोटि कहते हैं और सौ सहस्र कोटि एक नील को एक शंकु कहा जाता है। एक लाख शंकु को महाशंख नाम दिया गया है। एक लाख महाशंकु को वृन्द कहते हैं। एक लाख वृन्द का नाम महावृन्द है। एक लाख महावृन्द को पदम कहते हैं। एक लाख पदम को महापदम माना गया है। एक लाख महापद को खर्व कहा जाता है। एक लाख खर्व का महाखर्व होता है। एक सहस्र महाखर्व को समुद्र कहते हैं। एक लाख समुद्र को ओध कहते हैं और एक लाख ओध को महौध संज्ञा दी गई है। इस प्रकार सहस्र कोटि, सौ शंकु, सहस्र महाशंकु, सौ वृन्द, सहस्र महावृन्द, सौ पदम, सहस्र महापदम, सौ खर्वे, सौ समुद्र, सौ महोघ तथा समुद्र-सदृश सौ कोटि महौध सैनिकों से वीर विभीषण से तथा अपने सचिवों से घिरे हुए वानरराज, सुग्रीव आपको युद्ध के लिए ललकारते हुए सामने आ रहे हैं। महातेजस्वी श्रीरघुनाथजी गरुड़व्यूह का आश्रय ले वानरों के बीच में विराजमान हैं और मुझे विदा करके लंका पर चढ़े चले आ रहे हैं। इसके बाद शार्दूल ने सेना के कतिपय महाशक्तिशाली योद्धाओं के नाम बताए। उस वानर सेना में जाम्बवान नाम से प्रसिद्ध एक वीर है, जिसको युद्ध में परास्त करना बहुत कठिन है। वह ऋक्षरजा तथा गद्गद का पुत्र है। गद्गद का एक दूसरा पुत्र भी है जिसका नाम धूम्र है। इन्द्र के गुरु बृहस्पति का पुत्र केसरी है जिनके पुत्र हनुमान ने अकेले ही यहाँ (लंका में) आकर पहले बहुत से राक्षसों का संहार कर डाला था। सुषेण धर्म का पुत्र है। दधिमुख नामक सौम्य वानर चन्द्रमा का बेटा है। सुमुख, दुर्मख और वेगदर्शी नामक वानर ये मृत्यु के पुत्र हैं। निश्चय ही स्वयंभू ब्रह्मा ने मृत्यु की ही इन वानरों के रूप सृष्टि की है। स्वयं सेनापति नील अग्रि का पुत्र है। वीर हनुमान वायु का बेटा है बलवान औश्र दुर्जय वीर अंगद इन्द्र का नाती है। शक्तिशाली वानर मैन्द और द्विविद ये दोनों अश्विनीकुमारों के पुत्र हैं। गज, गवाक्ष, गवय, शरभ और गन्धमादन ये पाँच यमराज के पुत्र हैं और काल एवं अन्त के समान पराक्रमी हैं। दशरथ नन्दन श्रीराम ने युवावस्था में अकेले खर-दूषण और त्रिशिरा का संहार किया है। इस भूखण्ड में श्रीरामचन्द्रजी के समान पराक्रमी वीर दूसरा कोई नहीं है। इन्होंने ही विराध और काल के समान विकराल कबन्ध का भी वध किया है। लक्ष्मणजी भी गजराज के समान पराक्रमी हैं, इनके बाणों का निशाना बन जाने पर देवराज इन्द्र भी जीवित नहीं रह सकते हैं। इसके अतिरिक्त सेना में श्वेत और ज्योतिर्मुख ये दोनों वानर भगवान सूर्य के और सपुत्र है। हेमकूट नाम का वानर वरुण का पुत्र भी है। महान वीर नल विश्वकर्मा के पुत्र वेगशाली और पराक्रमी दुर्धर वसु देवता के पुत्र है। रावण की सेना में राक्षसों की संख्या गजानां दशसाहस्रं रथानामयुतं तथा। ह्यानामयुते द्वे च साग्रकोटिश्च रक्षसाम्।। वाल्मीकिरामायण युद्धकाण्ड सर्ग ३७-१६ रावण को सेना में दस हजार हाथी, दस हजार रथ, बीस हजार घोड़े और एक करोड़ से ज्यादा पैदल राक्षस थे। इतना सब होने पर भी श्रीरामजी के समक्ष महायुद्ध में रावण का अहंकार होने के कारण श्रीराम द्वारा वध हुआ। डॉ. नरेन्द्रकुमार मेहता/29 नवंबर2025