राष्ट्रीय
30-Nov-2025
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-यह एक छात्र संगठन नहीं था, यह माओवादियों की वैचारिक फैक्ट्री था नई दिल्ली,(ईएमएस)। दिल्ली में इंडिया गेट पर बीते 23 नवंबर को हुए विरोध प्रदर्शन के मामले में दिल्ली पुलिस के हाथ कई अहम वीडियो लगे हैं, जिसमें गिरफ्तार प्रदर्शनकारी देश की खिलाफत करने वालों का समर्थन करते नजर आए। ऐसा ही एक वीडियो भगतसिंह सिंह छात्र एकता मंच के छात्राओं का मिला है, जो इस साल फरवरी माह में हैदराबाद के एक कॉन्फ्रेंस रूम में एकत्र हुए थे, जहां इन्होंने रेडिकल स्टूडेंट्स यूनियन (आरएसयू) के लोगों के समर्थन में नारे लगाए हैं और उनके लिए गाना भी गा रहे हैं। बता दें ये वही संगठन है, जिसने किशनलाल और बसवराजू जैसे खूंखार नक्सलियों को जन्म दिया। आरएसयू को 1992 में ही भारत सरकार ने बैन किया है, लेकिन यह अब भी देश में जहर घोलने का काम कर रहा है। दिल्ली पुलिस के सूत्रों के मुताबिक वीडियो में दिख रही छात्राओं की पहचान गुरकीरत और रवजोत के रूप में हुई हैं। यह दोनों बहनें हैं और इन्होंने कर्तव्य पथ पर भी माड़वी हिडमा के समर्थन में नारे लगाए थे और दिल्ली पुलिस के साथ बदसलूकी की थी। इन दोनों को दिल्ली पुलिस ने अन्य साथियों के साथ गिरफ्तार किया है। पुलिस का कहना है कि इनके सोशल मीडिया अकाउंट्स को लगातार चेक किया जा रहा है, जिसमें साफ दिख रहा है कि ये पिछले काफी समय से अलग-अलग मंचों से देश की खिलाफत करने वालों का समर्थन करते आए हैं। अप्रैल 1972 में हैदराबाद के ओस्मानिया विश्वविद्यालय में युवा छात्र नेता जॉर्ज रेड्डी की हत्या ने पूरे राज्य की राजनीति और छात्र आंदोलनों को झकझोर दिया था। आरोप था कि रेड्डी को एक दक्षिणपंथी समूह ने निशाना बनाया है। इसी उथल-पुथल की राख से 20 फ़रवरी 1975 को रेडिकल स्टूडेंट्स यूनियन का जन्म हुआ। सरकार ने 1992 में इस संगठन पर बैन लगा दिया था, लेकिन आरएसयू की विचारधारा और उसका प्रभाव आज भी भारत की आंतरिक सुरक्षा में एक गहरी छाप छोड़ता है, क्योंकि आरएसयू सिर्फ़ एक छात्र संगठन नहीं था, यह माओवादियों की वैचारिक फैक्ट्री था। भारत के दो सबसे ख़तरनाक माओवादी शीर्ष कमांडर– नंबाला केशव राव उर्फ़ बसवराजु जो हाल ही में मारा गया है और थिप्पिरी तिरुपति उर्फ़ देवूजी दूसरे नंबर का टॉप कमांडर था- दोनों इसी आरएसयू की पैदाइश हैं। यहां तक कि सीपीआई माओवादी के प्रमुख विचारक और प्रवक्ता मल्लोजुला वेणुगोपाल राव उर्फ़ सोनू और किशनलाल भी इसी संगठन से निकले हैं। सरकार ने ऐलान किया है कि नक्सलवाद को 31 मार्च 2026 तक पूरी तरह समाप्त कर दिया जाएगा। ऐसे समय आरएसयू की भूमिका का पुनर्मूल्यांकन बहुत अहम है। माओवादियों की वर्तमान नेतृत्व संरचना में, सबसे ज़्यादा प्रभाव आरएसयू के ही पुराने कैडरों का है। जंगलों में सशस्त्र संघर्ष चलाने वाले शीर्ष नेता शहरी छात्र राजनीति से निकले हैं। यह तथ्य बताता है कि आरएसयू लंबे समय तक नक्सलवाद का बौद्धिक नर्सरी रहा है। संगठन का औपचारिक ढांचा टूट चुका है, लेकिन सुरक्षा एजेंसियों के मुताबिक इसके कई लोग एक्टिविस्ट नेटवर्क, शहरी ‘फ्रंट ऑर्गनाइजेशन और वैचारिक मंच के रूप में अब भी सक्रिय हैं। इसलिए आरएसयू सिर्फ़ इतिहास का हिस्सा नहीं, भारत की आंतरिक सुरक्षा की मौजूदा कहानी का छिपा हुआ अध्याय है। सिराज/ईएमएस 30नवंबर25