राष्ट्रीय
03-Dec-2025
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इतिहास में कई मौके आए तब रुस ने दुनिया के देशों को आंख दिखाकर भारत की मदद की नई दिल्ली (ईएमएस)। रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन, इसी सप्ताह भारत के दौरे पर आ रहे हैं। ये भारत-रूस के उस ऐतिहासिक संबंध को दिखाता है, जो आजादी के बाद से ही रहा है। जब भी भारत को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सपोर्ट की जरूरत हुई, हमेशा रूस उसके साथ खड़ा था आज हम आपकों एक किस्सा बात रहे हैं, जब भारत अपनी सुरक्षा मजबूत कर रहा था और दुनिया उस पर प्रतिबंध लगा रही थी। इसके बाद भी पुतिन भारत के साथ सच्चे दोस्त की तरह खड़े रहे। सोवियत संघ के पतन के बावजूद रूस ने भारत को अपना खास विशेष साझेदार माना। यह नीति सालों बाद भी आज भी यूएनएससी में दिखती है। साल 2019 में आर्टिकल 370 पर रूस ने इंटरनेशनल जमात के सामने खुलकर कहा था कि ये भारत का आंतरिक मामला है। दरअसल 11 और 13 मई 1998 को भारत ने पोखरण में 5 परमाणु परीक्षण किए। इस निर्णय ने पूरी दुनिया को चौंका दिया। अमेरिका, जापान और कई यूरोपीय देशों ने भारत पर कड़े प्रतिबंध लगाए और राजनयिक दबाव बढ़ा। लेकिन इस उथल-पुथल भरे समय में एक देश ऐसा था, जिसने भारत के सुरक्षा हितों को समझकर फैसले में भारत का साथ दिया। वहां और कोई नहीं भारत का सच्चा दोस्त रुस था। तब रूस की कमान संभाल रहे थे बोरिस येल्तसिन और प्रधानमंत्री थे विक्टर चेर्नोमिर्दिन, बाद में सेर्गेई किरियेंको ने मार्च, 1998 में ये पद संभाला। यह वह दौर था जब रूस सोवियत संघ के टूटने के बाद राजनीतिक और आर्थिक कमजोरियों से गुजर रहा था, लेकिन भारत के साथ उसकी रणनीतिक दोस्ती तब भी मजबूत थी। सोवियत काल से ही रूस, भारत की रक्षा, विज्ञान, ऊर्जा और अंतरिक्ष तकनीक का सबसे बड़ा साझेदार रहा था। पोखरण परीक्षण के बाद यह ऐतिहासिक रिश्ता और महत्वपूर्ण हो गया। जब पूरी दुनिया भारत को कठघरे में खड़ा कर रही थी और अमेरिका सैन्य-तकनीकी प्रतिबंध लगा रहा था, तब रूस ने बिल्कुल अलग रास्ता अपनाया। रूस उन गिने-चुने देशों में था जिसने परीक्षण पर कोई कठोर बयान नहीं दिया। 12 मई 1998 को येल्तसिन ने कहा कि ये परीक्षण एनपीटी (नॉन-प्रोलिफरेशन ट्रीटी) के खिलाफ हैं, लेकिन हम कूटनीति से इसे सुधार सकते हैं। येल्तसिन सरकार ने आधिकारिक रूप से कहा कि वह भारत के साथ रणनीतिक साझेदारी बनाए रखेगी और बातचीत जारी रहेगी। अमेरिका और जी-8 देशों ने रूस पर दबाव डाला कि वह भारत पर आर्थिक–तकनीकी प्रतिबंध लगाए। लेकिन रुस ने साफ कह दिया कि भारत हमारा पुराना मित्र है, प्रतिबंध समाधान नहीं हैं। जबकि अमेरिका ने इस मुद्दे पर भारत को रक्षा तकनीक देना बंद कर दिया, वहीं रूस ने रक्षा डील पर बात जारी रखी। रुस ने मिग-29, सुखोई-30, क्रायोजेनिक इंजन तकनीक और किलो वर्ग पनडुब्बियों पर बात की और भारत पर परमाणु कार्यक्रम रोकने के लिए कोई दबाव नहीं बनाया। रूसी नेतृत्व ने यह स्वीकार किया कि चीन और पाकिस्तान के संदर्भ भारत की सुरक्षा चिंता वाजिब है और भारत को अपनी सुरक्षा नीति निर्धारित करने का अधिकार है। जब यूएन में भारत के खिलाफ निंदा प्रस्ताव लाने की कोशिश हुई, तब रूस ने उसका समर्थन नहीं किया। ये वहां समय था जब यूएन की सुरक्षा परिषद में शामिल अमेरिका, चीन और यूरोप उस पर बहुत आक्रामक थे, लेकिन सुरक्षा परिषद के स्थायी सदस्य के तौर पर रूस उसकी बड़ी ताकत बना रहा। अगर रूस भी अमेरिका की लाइन पर चल जाता, तब भारत पर आर्थिक-रक्षा-तकनीकी प्रतिबंध और कड़े हो जाते। भारत की रक्षा सप्लाई चेन टूट सकती थी और स्पेस प्रोग्राम पर भी ब्रेक लग सकता था। पर्दे के पीछे भारत के साथ रूस का सहयोग जारी रहा। आशीष/ईएमएस 03 दिसंबर 2025