लंदन (ईएमएस)। जरूरत से ज्यादा नींद यानी ओवरस्लीपिंग कई बार मानसिक स्थिति, जीवनशैली, दवाइयों के साइड-इफेक्ट या गंभीर मेडिकल कंडीशंस का संकेत होती है। विशेषज्ञों के अनुसार, इसका सही कारण जानना बेहद जरूरी है, ताकि समय रहते समस्या को रोका जा सके। बीमारी के दौरान शरीर ज्यादा आराम मांगता है। फ्लू, वायरल या कोविड जैसे संक्रमण से लड़ते समय इम्यून सिस्टम कुछ ऐसे रसायन रिलीज करता है जो नींद बढ़ाने का काम करते हैं। इसलिए लंबी नींद लेने के बाद भी कमजोरी बनी रहती है, क्योंकि शरीर अपनी ऊर्जा बीमारी से लड़ने में खर्च कर देता है। वहीं शराब और नशे वाले पदार्थ दिमाग के उन कैमिकल्स को धीमा कर देते हैं जो जागे रहने में मदद करते हैं और नींद की गुणवत्ता खराब कर देते हैं, जिससे दिनभर सुस्ती और चक्कर रह सकते हैं। नींद खराब होने का एक बड़ा कारण बिगड़ी हुई लाइफस्टाइल भी है। देर रात फोन चलाना, नाइट शिफ्ट, बार-बार नींद टूटना या परिवार की जिम्मेदारियों के कारण पर्याप्त नींद न मिलना शरीर को ‘स्लीप डेट’ में धकेल देता है। ऐसे में मौका मिलते ही शरीर लंबे समय तक सोने की कोशिश करता है और धीरे-धीरे नींद का पूरा पैटर्न बिगड़ जाता है। कई दवाइयां जैसे एंटीहिस्टामिन, एंटीडिप्रेसेंट, पेनकिलर और मसल रिलैक्सेंट सिडेशन बढ़ाती हैं, जिससे जरूरत से ज्यादा नींद आती है। यदि नई दवा शुरू करने के बाद ऐसी समस्या बढ़ जाए तो तुरंत डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए। इसके अलावा, हाइपोथायराइड, डायबिटीज, फाइब्रोमायल्जिया, क्रॉनिक पेन, और क्रॉनिक फैटीग सिंड्रोम जैसी बीमारियां भी शरीर की एनर्जी का स्तर गिरा देती हैं, जिससे शरीर ज्यादा आराम मांगता है। मानसिक स्वास्थ्य भी नींद को बहुत प्रभावित करता है। डिप्रेशन या एंग्जायटी के मरीज अक्सर सामान्य से ज्यादा सोते हैं, जिसे ‘हाइपरसोम्निया’ कहा जाता है, लेकिन फिर भी तरोताज़ा महसूस नहीं करते क्योंकि दिमाग लगातार भावनात्मक तनाव में रहता है। अगर आप रोज 9–10 घंटे या उससे ज्यादा सोकर भी थकान, भारीपन, नींद और ऊर्जा की कमी महसूस करते हैं, तो इसे नजरअंदाज न करें। यह ओवरस्लीपिंग का गंभीर संकेत हो सकता है। सुदामा/ईएमएस 05 दिसंबर 2025