- बैंक में गिरवी रखी क्रेन खरीदने के नाम पर जालसाजी कर सेंट्रल बैंक से लिया लोन - कंपनी संचालक, बैंक मैनेजर और लोन प्रभारी ने मिलकर रची थी साजिश - ईओडब्ल्यू ने तीनो के खिलाफ दर्ज की एफआईआर, कई और राडार पर भोपाल(ईएमएस)। मुख्यमंत्री युवा उद्यमी योजना में 72 लाख के बैंक लोन फर्जीवाड़ा की शिकायत पर ईओडब्ल्यू ने जॉच के बाद बैंक अधिकारी, निजी फर्म संचालक और लाभार्थी सहित तीन आरोपियो के खिलाफ प्रकरण दर्ज किया है। आरोपियो ने मिलीभगत कर पुरानी क्रेन की खरीद के नाम पर सरकारी योजना का दुरुपयोग करते हुए सेंट्रल बैंक से लोन लिया था। - रीजनल मैनेजर ने की थी शिकायत विभाग द्वारा साझा की गई जानकारी के अनुसार यह मामला उस समय प्रकाश में आया जब इसकी लिखित शिकायत सेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया के वरिष्ठ क्षेत्रीय प्रबंधक रवि चंद्र गोयल ने 22 अक्टूबर 2021 को ईओडब्ल्यू, भोपाल में की। अपनी शिकायत में उन्होनें आरोप लगाया गया कि विजय पाल सिंह परिहार, प्रोपराइटर एस.बी./एस.वी. इंटरप्राइजेस, मंडीदीप, ने मुख्यमंत्री युवा उद्यमी योजना के अंतर्गत बैंक से लोन लेते समय समय तथ्य छिपाकर और भ्रामक जानकारी देकर धोखाधड़ी की है। शुरुआती जांच के दौरान ही दिये गये दस्तावेजी साक्ष्यों के आधार पर अपराध किया जाना पाये जाने पर आर्थिक अपराध प्रकोष्ठ द्वारा आपराधिक प्रकरण दर्ज किया गया। - पहले से गिरवी रखी क्रेन को दोबारा गिरवी रख लिया 72 लाख का लोन विभाग की आगे की जांच में सामने आया योजना के तहत एस.बी./एस.वी. इंटरप्राइजेस फर्म के नाम पर 72 लाख रुपये का बैंक लोन स्वीकृत किया गया था। इस फर्म के प्रोपराइटर और लाभार्थी के रूप में विजय पाल सिंह परिहार (उर्फ विजय सिंह परिहार) को दर्शाया गया था। यह लोन एक पुरानी ट्रक-माउंटेड क्रेन की खरीद के लिये लिया गया था। बैंक रिकॉर्ड में लोन की स्वीकृति और तिथि 30 मार्च 2017 दर्ज है। इस परियोजना की लागत एक करोड़ रुपये निर्धारित की गई थी, जिसमें से 72 लाख रुपये बैंक लोन के रूप में और शेष 28 लाख रुपये मार्जिन मनी के रूप में लाभार्थी पक्ष द्वारा वहन किया जाना दर्शाया गया। इसी आधार पर बैंक से लोन स्वीकृत किया गया और बाद में शासन की योजना के अंतर्गत सब्सिडी का लाभ भी लिया गया। बैंक ट्रांजैक्शन से पता चला कि क्रेन खरीद के नाम पर सेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया द्वारा लोन की रकम ऑल कार्गो समूह से जुड़े खाते में ट्रांसफर की गई। बैंक रिकॉर्ड के अनुसार 29 मार्च 2017 को 10 लाख, 30 मार्च 2017 को 5 लाख और 18 अप्रैल 2017 को 85 लाख रुपये का भुगतान किया गया, जिससे कागजों में क्रेन की कीमत 1 करोड़ रुपये दर्शाई गई। - अन्य खाते में किया गया पैमेंट,लोन हुआ एनपीए घोषित जांच में सामने आया कि क्रेन का रजिस्ट्रेशन ऑल कार्गो मूवर्स इंडिया लिमिटेड के नाम पर था, जबकि भुगतान ऑल कार्गो लॉजिस्टिक लिमिटेड के खाते में किया गया। इस लोन खाते में सरकारी योजना का सीधा लाभ लिया गया। बैंक रिकॉर्ड के अनुसार जिला व्यापार एवं उद्योग केंद्र के माध्यम से 12 लाख रुपये मार्जिन सहायता के रूप में जमा किए गए, जबकि ब्याज सब्सिडी के रूप में 90-90 हजार रुपये की 10 किस्तों में कुल 9 लाख रुपये खाते में डाले गए। इस प्रकार लोन खाते को कुल 21 लाख रुपये का सरकारी लाभ प्राप्त हुआ। बाद में जब बैंक को लोन की ईएमआई मिलना बंद हो गई और साल 2020 के अंत में ऋण खाता एनपीए घोषित करना पड़ा। जब बैंक ने वाहन पोर्टल और आरटीओ रिकॉर्ड की जांच की, तब चौंकाने वाली बात यह सामने आई की जिस क्रेन को बैंक के पास गिरवी माना जा रहा था, वह अब एस.बी./एस.वी. इंटरप्राइजेस के नाम पर न होकर लियो इंजीनियरिंग सर्विस के नाम पर दर्ज थी। और वही क्रेन आगे चलकर टाटा फाइनेंस के पास बंधक रखी गई है। यानि जिस संपत्ति के आधार पर बैंक ने लोन दिया था, वही संपत्ति बैंक के नियंत्रण से बाहर होकर तीसरे फाइनेंसर के पास पहुँच चुकी थी। - इस तरह किया लाखो का फर्जीवाड़ा ईओडब्ल्यू की आगे की जांच में खुलासा हुआ की सेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया की मंडीदीप शाखा के तत्कालीन अधिकारियों ने लोन की मंजूरी और निगरानी में गंभीर लापरवाही बरती। विजय पाल सिंह परिहार पहले लियो इंजीनियरिंग सर्विस के संचालक ज्ञानेन्द्र असवाल के यहां कर्मचारी के रूप में काम करता था। ज्ञानेन्द्र द्वारा सरकारी योजना का लाभ लेने के लिये अपने कर्मचारी के नाम पर एस.बी./एस.वी. इंटरप्राइजेस नामक फर्म बनाई। इस फर्म के नाम से पुरानी क्रेन खरीदने के लिए सेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया, मंडीदीप शाखा से 72 लाख रुपये का लोन स्वीकृत कराया गया। लोन की मंजूरी के समय 28 लाख रुपये की मार्जिन मनी ज्ञानेन्द्र असवाल द्वारा अपने खाते से जमा कराई गई। इस खाते में बाद में 21 लाख रुपये की सरकारी सब्सिडी भी प्राप्त की गई। जिस क्रेन को खरीदा दिखाया गया, वह पहले से एक्सिस बैंक में बंधक थी, लेकिन उसकी एनओसी प्राप्त नहीं की गई। वहीं बंधक रखे जाने वाले वाहन का मूल्यांकन भी नियमानुसार नहीं किया गया। बैंक के तत्कालीन मैनेजर और लोन प्रभारी ने बिना रीजनल ऑफिस की अनुमति के लोन मंजूर कर दिया। सबसे चौकांने वाली बात यह सामने आई की जिस क्रेन को बैंक के पास गिरवी होना चाहिए था, वह लियो इंजीनियरिंग सर्विस के नाम पर पंजीकृत पाई गई। लोन की ईएमआई समय पर जमा न होने के कारण यह खाता साल 2020 के अंत में एनपीए घोषित हो गया। बाद में इस क्रेन को टाटा फाइनेंस के पास गिरवी रख दिया गया। लोन लेने के प्रक्रिया के दौरान गुमाश्ता लाइसेंस बदले गए। इतना ही नहीं, उसी दिन प्रोजेक्ट पर काम का वर्कऑर्डर दिखाकर वाहन को चलती हालत में बताया गया। यानी वाहन का वास्तविक क्रय-विक्रय न होकर केवल कागज़ों में लेन-देन दिखाकर लोन और सब्सिडी लेने का प्रयास किया गया। - इनके खिलाफ दर्ज हुआ मामला दिए गए बैंक ऋण में बड़े फर्जीवाड़े का खुलासा होने पर ईओडब्ल्यू ने विजय पाल सिंह परिहार (प्रोपराइटर एस.बी./एस.वी. इंटरप्राइजेस), ज्ञानेन्द्र सिंह असवाल (संचालक, लियो इंजीनियरिंग सर्विस), ऑल कार्गो लॉजिस्टिक लिमिटेड के संचालक, सेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया के तत्कालीन शाखा प्रबंधक वी.वी. अय्यैर सहित तत्कालीन लोन प्रभारी बी.एस. रावत के खिलाफ धारा 420, धोखाधड़ी 409, अमानत में खयानत 120-बी आपराधिक षड्यंत्र तथा भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 7, 13 (1) (क) सहपठित 13 (2) भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धाराओ के तहत प्ररकण दर्ज किया है। जुनेद / 1 जनवरी