लेख
02-Jan-2026
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चिकित्सा विज्ञान के इतिहास में कुछ क्षण ऐसे होते हैं जो सिर्फ एक सफल उपचार भर नहीं होते, बल्कि भविष्य की दिशा तय करते हैं। मुंबई के कोकिलाबेन धीरूभाई अंबानी अस्पताल में हाल ही में हुई रिमोट कंट्रोल रोबोटिक सर्जरी भी ऐसा ही एक क्षण है, जिसने यह साबित कर दिया कि अब इलाज की सीमाएं भूगोल से बंधी नहीं रहीं। चीन के शहर शंघाई में बैठे सर्जन ने मुंबई में मौजूद मरीजों पर सफलतापूर्वक दो जटिल ऑपरेशन किए। करीब पाँच हजार किलोमीटर की दूरी, अलग देश, अलग समय क्षेत्र और फिर भी सर्जरी में महज 132 मिलीसेकेंड की देरी। यह आंकड़ा अपने आप में आधुनिक तकनीक की विश्वसनीयता और सटीकता का प्रमाण है। इस ऐतिहासिक सर्जरी में एक प्रोस्टेट कैंसर से पीड़ित मरीज और दूसरा किडनी रोग से जूझ रहा मरीज शामिल था। दोनों ही मामलों में टौमाई रोबोटिक सर्जरी सिस्टम का उपयोग किया गया, जिसने सर्जन के हाथों की बारीक से बारीक मूवमेंट को बिना किसी कंपकंपी या भ्रम के मुंबई के ऑपरेशन थिएटर में मौजूद रोबोटिक आर्म्स तक पहुंचाया। शंघाई में बैठे सर्जन के हाथ जैसे हिले, वैसे ही मुंबई में रोबोट ने प्रतिक्रिया दी। यह तालमेल किसी विज्ञान कथा जैसा लगता है, लेकिन यह आज की हकीकत बन चुका है। इस सर्जरी से पहले भारत सरकार के सेंट्रल ड्रग्स स्टैंडर्ड कंट्रोल ऑर्गनाइजेशन से विशेष अनुमति ली गई थी, क्योंकि यह न केवल तकनीकी दृष्टि से बल्कि नियामकीय और नैतिक दृष्टि से भी एक नया प्रयोग था। स्वास्थ्य सेवाओं में तकनीक के बढ़ते हस्तक्षेप के बीच सुरक्षा, डेटा ट्रांसमिशन और मरीज की गोपनीयता जैसे सवाल बेहद अहम होते हैं। कोकिलाबेन अस्पताल ने इन सभी पहलुओं पर पूरी तैयारी के साथ यह कदम उठाया और परिणाम ने यह साबित कर दिया कि भारत अब वैश्विक हेल्थकेयर इनोवेशन में अग्रणी भूमिका निभाने को तैयार है। कोकिलाबेन धीरूभाई अंबानी अस्पताल के डायरेक्टर डॉ. टी. बी. युवराज के अनुसार, इस सफलता ने स्पेशलाइज्ड सर्जरी के क्षेत्र में बड़े बदलाव के द्वार खोल दिए हैं। उनका कहना है कि हाई क्वालिटी हेल्थकेयर में रिमोट रोबोटिक सर्जरी भविष्य की रीढ़ बन सकती है। मरीज कहां है, इससे अब फर्क नहीं पड़ेगा। अगर कहीं विशेषज्ञ सर्जन उपलब्ध नहीं है, तो वह दुनिया के किसी भी कोने से अपनी विशेषज्ञता का लाभ मरीज तक पहुंचा सकेगा। यह सोच न केवल इलाज को सुलभ बनाएगी, बल्कि चिकित्सा असमानताओं को भी कम करेगी। अस्पताल के सीईओ डॉ. संतोष शेट्टी मानते हैं कि यह उपलब्धि एडवांस्ड और सुरक्षित डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर के बिना संभव नहीं थी। हाई-स्पीड कनेक्टिविटी, अल्ट्रा-लो लेटेंसी नेटवर्क और रियल टाइम डेटा प्रोसेसिंग ने इस सर्जरी को सुरक्षित और प्रभावी बनाया। उन्होंने कहा कि तकनीक तभी सार्थक होती है जब वह मानव जीवन को बेहतर बनाए और यह सर्जरी उसी दिशा में एक मजबूत कदम है। भारत जैसे विशाल और विविधता भरे देश में इस तकनीक की उपयोगिता और भी बढ़ जाती है। आज भी कई ग्रामीण और दूरदराज के इलाकों में सुपर स्पेशलिस्ट डॉक्टरों की भारी कमी है। ऐसे में अगर किसी गंभीर मरीज को बड़े शहर तक लाने में समय लगता है, तो उसकी जान जोखिम में पड़ सकती है। रिमोट रोबोटिक सर्जरी इस चुनौती का समाधान बन सकती है। विशेषज्ञ डॉक्टर महानगरों या यहां तक कि विदेशों में बैठकर भी मरीज का इलाज कर सकेंगे। यह सोच स्वास्थ्य सेवाओं के लोकतंत्रीकरण की दिशा में एक बड़ा कदम है। रोबोटिक सर्जरी अपने आप में कोई नई अवधारणा नहीं है, लेकिन रिमोट कंट्रोल के जरिए इतने लंबे फासले से सर्जरी करना अब तक दुर्लभ रहा है। इससे पहले भी दुनिया के कुछ देशों में सीमित दूरी पर टेली-सर्जरी के प्रयोग हुए हैं, लेकिन पाँच हजार किलोमीटर की दूरी और वह भी कैंसर जैसी जटिल बीमारी में, इसे वैश्विक स्तर पर खास बना देती है। इसमें सर्जन की कुशलता के साथ-साथ मशीन की विश्वसनीयता और नेटवर्क की स्थिरता भी बराबर की भागीदार होती है। मरीजों के नजरिए से देखें तो यह अनुभव किसी चमत्कार से कम नहीं। एक ऐसा मरीज, जो ऑपरेशन टेबल पर लेटा है और जानता है कि उसे ऑपरेट करने वाला डॉक्टर उसी शहर में नहीं, बल्कि हजारों किलोमीटर दूर किसी दूसरे देश में है, उसके लिए यह भरोसे की परीक्षा भी है। लेकिन जब ऑपरेशन सफल होता है और मरीज सुरक्षित रिकवरी की ओर बढ़ता है, तो तकनीक पर विश्वास और गहरा हो जाता है। यह विश्वास ही भविष्य में ऐसी सर्जरी को व्यापक स्वीकृति दिलाएगा। डॉक्टरों को लंबे समय से ‘नेक्स्ट टू गॉड’ कहा जाता रहा है, क्योंकि वे जीवन और मृत्यु के बीच खड़े होकर फैसले लेते हैं। अब इस समीकरण में रोबोट भी शामिल हो गया है। मशीन, जो न थकती है, न घबराती है और न ही उसकी हाथों की स्थिरता में कमी आती है। हालांकि निर्णय आज भी इंसान ही लेता है, लेकिन उसे अंजाम देने में रोबोट की सटीकता नई ऊंचाइयों को छू रही है। यह सहयोग चिकित्सा विज्ञान को एक नए युग में ले जा रहा है। इस उपलब्धि के साथ कुछ सवाल भी स्वाभाविक रूप से सामने आते हैं। क्या भविष्य में मशीनें डॉक्टरों की जगह ले लेंगी। क्या तकनीकी खराबी की स्थिति में मरीज की सुरक्षा सुनिश्चित होगी। क्या हर अस्पताल इस तरह के महंगे सिस्टम को वहन कर पाएगा। विशेषज्ञ मानते हैं कि ये सभी सवाल जायज हैं, लेकिन हर नई तकनीक के साथ ऐसी आशंकाएं जुड़ी होती हैं। समय के साथ जैसे-जैसे तकनीक सस्ती और सुलभ होगी, इन चुनौतियों का समाधान भी निकलता जाएगा। शिक्षा और प्रशिक्षण के क्षेत्र में भी इसका असर पड़ेगा। आने वाले समय में सर्जनों को न केवल पारंपरिक सर्जरी बल्कि रोबोटिक और टेली-सर्जरी में भी दक्ष होना पड़ेगा। मेडिकल कॉलेजों और ट्रेनिंग संस्थानों को अपने पाठ्यक्रम में इन तकनीकों को शामिल करना होगा। इससे एक नई पीढ़ी के डॉक्टर तैयार होंगे, जो तकनीक और मानवीय संवेदना के संतुलन के साथ इलाज कर सकेंगे। वैश्विक स्तर पर देखें तो भारत की यह उपलब्धि उसकी सॉफ्ट पावर को भी मजबूत करती है। जब भारतीय अस्पताल और डॉक्टर इस तरह की उन्नत सर्जरी को सफलतापूर्वक अंजाम देते हैं, तो दुनिया का ध्यान स्वाभाविक रूप से भारत की ओर जाता है। यह न केवल मेडिकल टूरिज्म को बढ़ावा देगा, बल्कि रिसर्च और टेक्नोलॉजी में अंतरराष्ट्रीय सहयोग के नए रास्ते भी खोलेगा। अंततः यह कहा जा सकता है कि कोकिलाबेन धीरूभाई अंबानी अस्पताल में हुई यह रिमोट रोबोटिक सर्जरी सिर्फ दो मरीजों का सफल इलाज नहीं है, बल्कि भविष्य की झलक है। एक ऐसा भविष्य जहां दूरी मायने नहीं रखेगी, विशेषज्ञता सीमाओं में नहीं बंधी होगी और तकनीक मानवता के साथ कंधे से कंधा मिलाकर चलेगी। यह उपलब्धि हमें यह सोचने पर मजबूर करती है कि अगर आज पाँच हजार किलोमीटर दूर से सर्जरी संभव है, तो कल चिकित्सा विज्ञान हमें और किन चमत्कारों से रूबरू कराएगा। (वरिष्ठ पत्रकार, साहित्यकार,स्तम्भकार) (यह लेखक के व्य‎‎‎क्तिगत ‎विचार हैं इससे संपादक का सहमत होना अ‎निवार्य नहीं है) .../ 2 जनवरी /2026