लेख
05-Jan-2026
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राष्ट्रपति बंधक, वेनेजुएला में तख्तापलट अमेरिका ने एक बार फिर साबित कर दिया है। वैश्विक व्यवस्था में अंतरराष्ट्रीय कानूनों में नैतिकता और न्याय का कोई स्थान नहीं है। हर देश की ताकत निर्णायक है। जिस तरह एक संप्रभु देश के राष्ट्रपति पर हमला करके कथित तौर पर पति-पत्नी का अपहरण कर बंदी बनाया गया है। उसने सारी दुनिया को हतप्रभ कर दिया है। यह घटना किसी एक व्यक्ति या संगठन तक सीमित नहीं है । यह घटना अंतरराष्ट्रीय कानून, कूटनीतिक सबंधों और राष्ट्रों की संप्रभुता पर सीधा हमला है। संयुक्त राष्ट्र संघ सुरक्षा परिषद एवं अन्य अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं के लिए भी यह घटना एक बड़ी चुनौती है । अमेरिका स्वयं को मानवाधिकार एवं लोकतांत्रिक कानून का सबसे बड़ा संरक्षक बताता है । इस घटना ने उसके दोहरे मापदंडों को उजागर कर दिया है। अमेरिका के खाने वाले दांत अलग और दिखाने वाले दांत अलग हैं । अंतरराष्ट्रीय कानून कहता है, किसी देश की राजनीतिक नेतृत्व संरचना में इस तरह का कृत्य पूर्ण रूप से अवैध है। इसके बावजूद अमेरिका ने “राष्ट्रीय सुरक्षा” और “आतंकवाद के विरोध” जैसे तर्कों की आड़ में राष्ट्रपति और उनकी पत्नी का ऐसे समय पर अपहरण किया है। जब 1 घंटे पहले ही चीन का एक प्रतिनिधि मंडल उनके साथ चर्चा कर रहा था । संदेश साफ है,शक्ति है, तो नियम अपने आप बन जाते हैं। रूस और चीन जैसे शक्तिशाली देश इस घटनाक्रम पर असहज हो गये हैं। यूरोप, एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका के कई देशों में इस घटना के बाद यह आशंका पैदा हो गई है। इस तरह की घटना समर्थ देश किसी भी अन्य देश के साथ कर सकते हैं। वर्तमान में यह घटना वेनेजुएला के राष्ट्रपति के साथ घटी है । भविष्य मे किसी अन्य देश मे ताकत के बल पर यह घटना हो सकती है । ऐसी स्थिति में अंतरराष्ट्रीय कानूनो और अंराराष्ट्रीय संस्थाओं का कोई महत्व नहीं रह जाएगा । सबकी अपनी ढपली और अपना राग होगा। यह घटना वैश्विक राजनीति में भय एवं तोड़फोड़ का नया अध्याय है । छोटे और मध्यम देश अपने आप को अधिक असुरक्षित महसूस करेंगे। इस पूरे घटनाक्रम में भारत की खामोशी सबसे ज्यादा चर्चा का विषय बन गई है। भारत, दुनिया का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक और धर्मनिरपेक्ष देश के रूप में पहचाना जाता है । पिछले कुछ वर्षों से इसे “विश्व गुरु” के रूप में प्रचारित किया जा रहा है । भारत आर्थिक दृष्टि से सबसे तेजी के साथ बढ़ता हुआ देश है ।उसकी ओर से इतनी बड़ी घटना पर कोई स्पष्ट और सशक्त प्रतिक्रिया नही आना भारत सहित वैश्विक मंच पर कई सवाल खड़े करता है। क्या भारत अमेरिका से इतना डरता है? रणनीतिक एवं व्यापारिक साझेदारी के नाम पर लोकतांत्रिक मूल्यों और अंतरराष्ट्रीय कानूनो की अनदेखी पर भारत सरकार चुप रह सकती है? प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की विदेश नीति की आलोचना अब देश के अंदर बड़े पैमाने पर होने लगी है । मोदी सरकार कब तक चुप्पी साध कर इस तरह की घटनाओं से बच सकती है। दुनिया के देशों में जिस तरीके की स्थितियां देखने को मिल रही हैं। उसमें भारत सरकार की चुप्पी राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चर्चा का विषय बन गई है। वेनेजुएला की यह घटना इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। यदि किसी देश के राष्ट्रपति और उसकी पत्नी को इस तरह से अपहरण कर बंदी बनाया जा सकता है। भारत इतनी बड़ी घटना पर चुप रह जाता है । इस स्थिति पर दुनिया के देश भारत और भारत सरकार पर किस तरह से विश्वास करेंगे। इस तरह की घटना आम नागरिकों, पत्रकारों शीर्ष पदों पर बैठे हुए लोगों की असहमति की आवाजों को क्या भारत में भी इसी तरह से दबाया जाएगा, तो आगे चलकर क्या होगा? भारत के पूर्व उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ का जिस तरह से इस्तीफा कराया गया । अमेरिका द्वारा वेनेजुएला के राष्ट्रपति का अपहरण और गिरफ्तारी पर अब लोग भारत में ही चर्चा एवं तुलना करने लगे हैं। यह घटना केवल अमेरिका की दादागिरी और ताकत का प्रदर्शन मात्र नहीं है। बल्कि वैश्विक व्यवस्था को आपस में जोड़े रखने के लिए जो अंतरराष्ट्रीय कानून बनाए गए थे। जिन अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं के ऊपर नियमों का पालन कराने की जिम्मेदारी थी । अंतरराष्ट्रीय जगत में उन संस्थाओं की कमजोरी और दयनीय स्थिति का यह एक आईना है। आज दुनिया को यह सोचने की जरूरत है, क्या अंतरराष्ट्रीय कानून सिर्फ कमजोर देशों पर लागू होंगे । शक्तिशाली देशों के लिए अंतरराष्ट्रीय कानून कागज की किताबों पर लिखे शब्द बनकर रह जाएंगे? अमेरिका द्वारा जिस तरीके से प्रतिबंधों का गलत इस्तेमाल किया जा रहा है । विभिन्न देशों की पूंजी और संपत्ति को अमेरिका द्वारा मनमाने तरीके से जप्त किया जा रहा है । वेनेजुएला जैसे देश के तेल भंडार और उसकी संपत्ति पर दादागिरी के बल पर गेंगस्टार की तरह कब्जा किया जा रहा है । कई देशों की सरकारों को योजनाबद्ध तरीके से गिराया जा रहा है । यदि ऐसा ही चलता रहा । तो “वैश्विक व्यवस्था” का विचार केवल भाषणों तक सीमित होकर रह जाएगा । प्रथम एवं द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान जिस तरह से दुनिया के देश आपस में बटे हुए थे । सबके पास अपनी लाठी और अपनी भैंस थी । ठीक उसी तरह की स्थिति अब देखने को मिलने लगी है । संयुक्त राष्ट्र संघ, सुरक्षा परिषद तथा वैश्विक वित्तीय संस्थान अमेरिका के इशारे पर काम कर रहे हैं । इजराइल और गाजा युद्ध को लेकर जिस तरह से संयूक्त राष्ट्र की किरकिरी हुई है। उसके कारण वैश्विक संस्थाएं भी दिन प्रतिदिन कमजोर होती चली जा रही हैं । अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने सारी हदें पार कर दी हैं । इसको देखते हुए यह कहा जा सकता है जिन व्यवस्थाओं को बनने में 90 साल लगे थे ।अब उनका अस्तित्व में बने रहना भविष्य में शायद संभव नहीं होगा । वर्तमान में जिसके पास लाठी होगी,भैंस भी वही ले जाएगा। ईएमएस/05/01/2026