वेनेजुएला को लेकर डोनाल्ड ट्रंप की हालिया आक्रामक कार्रवाई ने एक बार फिर वैश्विक राजनीति एवं सामरिक तनाव को तेज कर दिया है। प्रतिबंधों को सख्ती से लागू करना, समुद्री मार्गों पर निगरानी बढ़ाना और कथित तौर पर रूस से जुड़े जहाज की जप्ती जैसे कदम केवल वेनेजुएला तक सीमित नहीं हैं। इनके दूरगामी अंतरराष्ट्रीय प्रभाव जल्द ही देखने को मिल सकते हैं। यह घटनाक्रम स्पष्ट संकेत देता है, अमेरिका, लैटिन अमेरिका क्षेत्र में अपने वर्चस्व को आर्थिक एवं सामरिक दृष्टिकोण अपनाते हुए ट्रम्प कब्जा करना चाहते हैं। भले ही इसके लिए रूस और चीन के साथ सीधा टकराव लेने की ट्रंप की सोच है। अमेरिका और वैश्विक स्तर पर आर्थिक मंदी और अर्थव्यवस्था पर जो संकट देखने को मिल रहे हैं उसके बाद यह कहने में कोई संकोच नहीं हो रहा है, आने वाले दिनों में अमेरिका अपनी डॉलर मुद्रा तथा वैश्विक व्यापार के वर्चस्वको बनाए रखना चाहता है। उसके लिए ट्रंप अंतिम लड़ाई लड़ रहे हैं। ट्रम्प ने टेरिफ के बहाने जो नया खेल खेला था। उसमें वह असफल हो गए है। अमेरिका में मंहगाई और आर्थिक स्थिति पर इसके दुष्परिणाम दिखने लगे है। इससे बचने के लिये अब ट्रम्प ने वेनेजुएला का मुद्दा खड़ा करके अमेरिका में अपनी स्थिति को मजबूत करना चाहते है? वेनेजुएला लंबे समय से रूस और चीन का रणनीतिक साझेदार है। रूस ने वहां ऊर्जा, हथियार और सैन्य सहयोग किया है। जबकि चीन ने कर्ज, बुनियादी ढांचा और तेल समझौतों के जरिए अपनी गहरी पैठ बनाई है। रूस और चीन के हथियार भी वेनेजुएला में है। ऐसे में किसी रूसी जहाज की जप्ति केवल एक कानूनी या तकनीकी कार्रवाई के रूप में नहीं देखी जा सकती है। इस कार्रवाई को रूस के प्रभाव को खुली चुनौती के रूप में ही देखा जाएगा। मॉस्को ट्रंप की इस कार्रवाई को अपनी संप्रभुता और अंतरराष्ट्रीय व्यापार स्वतंत्रता पर हमला बताकर कूटनीतिक विरोध, जवाबी प्रतिबंध या समुद्री सुरक्षा को बढ़ाने जैसे कदम उठा सकता है। हालांकि रूस सीधे सैन्य टकराव से बचता हुआ दिख रहा है। समय आने पर इसकी प्रतिक्रिया बड़े रूप में हो सकती है। इससे इनकार नहीं किया जा सकता है। दुनिया के देशों में अमेरिका, विरोधी मंचों पर इस मुद्दे का जोर-शोर से उठना तय है। चीन का रुख अपेक्षाकृत संतुलित होते हुए भी व्यापारिक दृष्टिकोण से दीर्घकालिक होगा। बीजिंग आमतौर पर प्रत्यक्ष टकराव से बचते हुए अंतरराष्ट्रीय कानून, बहुपक्षवाद और संप्रभुता के सिद्धांतों की बात करते हुये इस समस्या के समाधान की कोशिश करेगा, ऐसी संभावना देखने को मिलती है। अमेरिका की कार्रवाई को चीन “एकतरफा दबाव नीति” करार देकर वैश्विक मंच पर अमेरिका को अलग-थलग करने की कोशिश करेगा। संयुक्त राष्ट्र के विभिन्न मंचों तथा वैश्विक व्यापार संधिकरण की नीति को लेकर अपना विरोध दर्ज करा सकता है। इसके साथ चीन वेनेजुएला में अपने आर्थिक हितों की रक्षा के लिए वैकल्पिक भुगतान प्रणालियों, गुप्त या अप्रत्यक्ष रूप से वेनेजुएला की मदद रूस के साथ तालमेल कर ट्रंप की दादागिरी को चुनौती देने का काम कर सकता है। इस पूरे घटनाक्रम का वैश्विक प्रभाव तेल बाजारों,समुद्री व्यापार, वैश्विक व्यापार और विकासशील देशों की आर्थिक एवं विदेश नीति पर पड़ना तय है। वह देश जो अमेरिकी प्रतिबंधों से असहमत हैं। वह चीन-रूस खेमे की नीतियों की ऒर झुक सकते हैं। अमेरिका समर्थक देश भी ट्रंप की इस तरह की कार्यवाही के खुले समर्थक नहीं है। इसका असर नाटो देश और यूरोपियन संगठन में भी देखने को मिल रहा है। वह ट्रंप की इन नीतियों का कितना समर्थन करेंगे, वर्तमान में कहना मुश्किल है। अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की जिस तरह की नीतियां आ रही हैं। उसके बाद दुनिया एक बार फिर आर्थिक एवं सामरिक ध्रुवीकरण की ओर बढ़ती हुई दिख रही है। विकासशील देश एवं वेनेजुएला जैसे देश महाशक्तियों की रस्साकशी का मैदान बन रहे हैं। यह स्थिति वैश्विक शांति के लिए सबसे बड़ा खतरा बनकर सारी दुनिया के सामने है। अमेरिका की इस कार्रवाई से वैश्विक व्यापार संधि के बाद जो आर्थिक परिवर्तन सारी दुनिया के देशों में देखने को मिला था। निश्चित रूप से वह तेजी के साथ सिमटने लगेगा। जिसका दुष्प्रभाव आर्थिक मंदी के रूप में जल्द ही सामने आ सकता है। इसको लेकर तरह-तरह की वैश्विक चिंताएं सामने आने लगी हैं। ईएमएस / 08 जनवरी 26