लेख
05-Jan-2026
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मानव धनलिप्सा की मृगतृष्णा में फंसता जा रहा है वह अपनी सोचने की शक्ति खो चुका है। इस मृगमरीचिका का परिणाम क्या होगा इसके पीछे मानव वैसे ही भाग रहा है जैसे हिरन पानी के पीछे भागता है। रिश्तों में बिखराव बेहद घातक है। रिश्तों की दीवारें दरकने लगी हैं इन दीवारों को बचाना होगा क्योंकि यदि दीवार का एक भी पत्थर निकल जाए तो दीवार कभी भी धराशायी हो सकती है। बढती महत्वकाक्षाएं भी रिश्तों के विघटन का कारक बन रही हैं। संपति के कारण आज न जाने कितने परिवार खत्म हो गये, और कितने ही सलाखों के पीछे है। आज रहे है। एक समय था कि रिश्तों में मिठास होती थी लेकिन आज खटास आती जा रही है। आज जमीन के एक छोटे से टुकडे के लिए हत्या की जा रही है। खूनी रिश्तों को अटूट बनाना होगा। एक उदारवादी दृष्टिकोण अपनाना चाहिए। और खूनी रिश्तों में मिठास घुल सके। रिश्तों पर जमी नफरत की इस बर्फ को पिघलाना होगाऐसे दिल दहला देने वाले कृत्यों पर विराम लगाना होगा। ताकि समाज में आ रहे इस तरह के संकंट से मुक्ति मिल सकें। रिश्तों में सामजस्य स्थापित करना होगा आने वाली पीढियां नफरत की इस आग में झुलसने से बच सके और भाईचारा बना रहे और एक नये युग का सूत्रपात हो सके। रिश्तों के रूप बदलते जा रहे है ,रिश्तों में छल -कपट घर करता जा रहा है। मानव अपनी सभ्यता और संस्कृति को भूलकर राक्षसों जैसा आचरण कर रहा है। आज संपति के लिए जो कुछ हो रहा है बहुत ही त्रासद है। आखिर इंसान को क्या हो गया है कि अपनों को ही मौत की नींद सुला रहा है ऐसे मामले प्रलय की इबारत लिख रहे है अगर इन बढते मामलों पर संज्ञान न लिया तो आने वाले दिनों में घातक परिणाम भुगतने पडेगें। कि विश्व गुरु के नाम से विख्यात भारत में रिश्तों में नफरत गहरी होती जा रही है रिश्तों में आ रही इस नफरत की आग को बूझाना होगा हर भारतीय को मंथन करना होगा। इस पर मंथन करना होगा इसके कारण ढूंढने होगें, देश में ऐसी बारदातों के आंकडों में बेतहासा वृद्वि हो रही है आज से कुछ दशक पहले ऐसी स्थिति नहीं थी छोटे-छोटे स्वार्थो के लिए खूनी रिश्तों की बलि चढाई जा रही है। ईएमएस / 05 जनवरी 26