नई दिल्ली(ईएमएस)। भारत की आध्यात्मिक चेतना के केंद्र और द्वादश ज्योतिर्लिंगों में प्रथम सोमनाथ मंदिर पर हुए पहले बड़े विदेशी आक्रमण के इस वर्ष 1000 वर्ष पूरे हो गए हैं। सन 1026 में महमूद गजनी ने इस पावन मंदिर को खंडित कर इसकी संपदा को लूटा था, लेकिन एक सहस्राब्दी बीत जाने के बाद भी सोमनाथ अपनी पूरी भव्यता के साथ खड़ा है। मंदिर की इसी ऐतिहासिक और गौरवशाली यात्रा पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक विशेष लेख के माध्यम से देश के साथ अपने विचार साझा किए हैं। उन्होंने स्पष्ट किया कि सोमनाथ का इतिहास केवल विध्वंस की कहानी नहीं है, बल्कि यह उस भारतीय संकल्प की गाथा है जो हर बार राख से उठ खड़ा होने का सामर्थ्य रखती है। प्रधानमंत्री ने अपने लेख में मंदिर के आधुनिक पुनर्निर्माण का श्रेय भारत के लौह पुरुष सरदार वल्लभभाई पटेल को दिया है। उन्होंने उल्लेख किया कि 1947 में दिवाली के अवसर पर जब सरदार पटेल ने सोमनाथ की यात्रा की, तो वहां के खंडहरों ने उन्हें भीतर तक झकझोर दिया था। उसी क्षण उन्होंने संकल्प लिया था कि सोमनाथ का भव्य मंदिर फिर से उसी स्थान पर बनेगा। अंततः 11 मई 1951 को जब मंदिर के द्वार श्रद्धालुओं के लिए खुले, तो वह आधुनिक भारत के सांस्कृतिक पुनर्जागरण का एक बड़ा क्षण था। हालांकि, प्रधानमंत्री ने इतिहास के एक विवादित पक्ष को भी सामने रखा कि तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू इस पुनरुत्थान को लेकर अधिक उत्साहित नहीं थे। नेहरू का मानना था कि सरकारी प्रतिनिधियों का ऐसे समारोहों में शामिल होना भारत की छवि को प्रभावित कर सकता है, लेकिन तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने अपने अडिग विश्वास से यह सुनिश्चित किया कि भारत की सांस्कृतिक अस्मिता को उसका उचित स्थान मिले। लेख में के.एम. मुंशी के योगदान को भी प्रमुखता से याद किया गया है, जिन्होंने सरदार पटेल के विजन को धरातल पर उतारने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। मुंशी की कृति सोमनाथ, द श्राइन इटरनल का संदर्भ देते हुए प्रधानमंत्री ने कहा कि हमारी सभ्यता आत्मा और विचारों की अमरता में विश्वास रखती है। सोमनाथ का भौतिक ढांचा भले ही बार-बार नष्ट किया गया हो, लेकिन इसकी चेतना को कोई शस्त्र या अग्नि समाप्त नहीं कर सकी। यही वह शक्ति है जिसने भारत को हर कालखंड में चुनौतियों से लड़कर आगे बढ़ने का साहस दिया है। आज जब दुनिया भारत की ओर एक नई उम्मीद और विश्वास के साथ देख रही है, तो सोमनाथ के ये मूल्य और भी प्रासंगिक हो जाते हैं। प्रधानमंत्री के अनुसार, भारत के युवाओं का इनोवेशन, हमारी कला, संस्कृति, योग और आयुर्वेद आज वैश्विक पहचान बना रहे हैं क्योंकि हमारे संकल्प की जड़ें सोमनाथ जैसी सांस्कृतिक विरासत में गहरी हैं। उन्होंने लिखा कि 1026 के उस आक्रमण के एक हजार साल बाद आज 2026 में भी सोमनाथ के समुद्र की लहरें उसी तीव्रता से गर्जना करती हैं और मंदिर की विजयगाथा सुनाती हैं। अतीत के वे आक्रमणकारी जिन्होंने विनाश का मार्ग चुना था, आज इतिहास के धूल भरे पन्नों में सिमट कर रह गए हैं, जबकि सोमनाथ आज भी पूरी दुनिया को शांति और आस्था का प्रकाश दे रहा है। यह स्थल हमें सिखाता है कि घृणा और कट्टरता अस्थायी हो सकती है, लेकिन सृजन और आस्था की शक्ति शाश्वत होती है। वीरेंद्र/ईएमएस/05जनवरी2026