साल 2026 की शुरूआत के साथ ही भारत उम्मीदों और आकांक्षाओं के पंख फैलाकर विकास की निर्बाध उड़ान उडऩा चाहता है। लेकिन वैश्विक चुनौतियां उसकी राह में बड़ी बाधा बनकर खड़ी हो गई हैं। ऐसे में यह समय भारत के लिए फूंक-फूंककर कर कदम बढ़ाने की जरूरत है। यह भी तभी संभव है, जब भारत की कूटनीति और विदेश नीति सही दिशा में हो। विश्व राजनीति इस समय जिस दिशा में आगे बढ़ रही है, वह भविष्य में और भी जटिल, संघर्षपूर्ण और विकट होने जा रही है। अमेरिका अपनी वैश्विक प्रभुता को बनाए रखने के लिए हर संभव प्रयास कर रहा है। चाहे वह यूरोप की सत्ता समीकरणों के माध्यम से हो या दक्षिण एशिया में रणनीतिक हस्तक्षेप के जरिए। किंतु यह भी उतना ही सत्य है कि अब वह एकध्रुवीय विश्व का युग समाप्त हो चुका है। आज की दुनिया बहुध्रुवीय है, जहां भारत, चीन, रूस, और यूरोपीय संघ जैसे केंद्र अपनी स्वतंत्र और निर्णायक भूमिका निभा रहे हैं। अमेरिका की कोशिश है कि दक्षिण एशिया में वह अपनी पकड़ बनाए रखे, ताकि चीन को घेरा जा सके और भारत को अपने पाले में रखा जा सके। इसके लिए वह ताइवान, जापान, दक्षिण कोरिया, और फिलीपींस जैसे देशों के माध्यम से चीन पर रणनीतिक दबाव बना रहा है। किंतु भारत के लिए यह रास्ता उतना सरल नहीं है जितना दिखाई देता है। यदि भारत ताइवान के साथ मित्रता के सूत्रों को सार्वजनिक रूप से मजबूत करता है, तो निस्संदेह चीन भारत के विरुद्ध अप्रत्यक्ष मोर्चा खोल देगा। साल 2026 की शुरुआत भारत के पड़ोसी देशों के लिए बेहद निर्णायक साबित होने वाली है। बांग्लादेश, पाकिस्तान और नेपाल तीनों देश गहरे राजनीतिक और सामाजिक संकट से गुजर रहे हैं। कहीं चुनाव व्यवस्था सवालों के घेरे में है, कहीं सेना का वर्चस्व बढ़ रहा है और कहीं बेरोजगार और गुस्साई युवा पीढ़ी सडक़ों पर है। इन तीनों देशों की अस्थिरता का असर सिर्फ इनके भीतर नहीं, बल्कि सीधे भारत की सुरक्षा, कूटनीति और क्षेत्रीय भूमिका पर पड़ सकता है। ऐसे में भारत की नेबरहुड फस्र्ट पॉलिसी नीति अब तक की सबसे कठिन परीक्षा से गुजरने वाली है। बड़ा सवाल यह है कि भारत के तमाम सहयोग और राहत की नीतियों के बावजूद ये देश चीन और पाकिस्तान की तरफ क्यों झुके जाते हैं, जिनकी नीतियों की वजह से कर्ज और जिहादी आतंक के संकटों से घिर जाते हैं? चीन के अलावा अब ट्रंप और सऊदी का समर्थन मिलने से इतराए पाकिस्तान का उपाय करने के साथ-साथ इस सवाल का हल खोजना शायद भारतीय विदेश नीति की सबसे बड़ी चुनौती होगी। कहने को तो एक साल ही बदला है, पर डोनाल्ड ट्रंप ने जैसी उथल-पुथल मचाई है, उससे लगता है मानो एक युग बदल गया है। नए साल की शुरुआत में ही उन्होंने वेनेजुएला पर धावा बोल दिया। ट्रंप की दुनिया में किसी स्थापित कूटनीतिक परंपरा और अंतरराष्ट्रीय कायदे-कानून की कोई गारंटी नहीं है। यह द्वितीय महायुद्ध के बाद बनी नियमबद्ध व्यवस्था वाली दुनिया से नितांत भिन्न है, जिसके आधार पर भारत की विदेश और व्यापार नीति टिकी है। जिस गुटबाजी से भारत को परहेज था, वह सोवियत संघ के विघटन से टूटी और दुनिया एकध्रुवीय बन गई। भारत ने गुटनिरपेक्षता की जगह हितसापेक्ष स्वायत्तता की नीति अपनाई और खेमेबाजी से दूर रहते हुए अपनी सामरिक एवं आर्थिक शक्ति के विकास के लिए अमेरिका का रणनीतिक और व्यापारिक साझेदार बन गया। भारत से पहले चीन ने भी गुटबाजी छोडक़र अपने सामरिक हितों की रक्षा करते हुए अमेरिका के साथ व्यापारिक साझेदारी की, जिसकी बदौलत आज वह अमेरिका को हर क्षेत्र में चुनौती देने की स्थिति में आ गया है। ट्रंप खुद चीन को जी-2 का दूसरा जी यानी दूसरी महाशक्ति मान चुके हैं। रूस को वे सामरिक महाशक्ति मानते हैं, लेकिन वह वैश्विक शक्ति संतुलन की तीसरी धुरी बनने की स्थिति में नहीं है। यूक्रेन युद्ध और आर्थिक प्रतिबंधों ने उसे चीन के खेमे में पहुंचा दिया है। यानी दुनिया एक बार फिर दो खेमों में बंटती दिख रही है, जबकि भारत बहुपक्षीय व्यवस्था चाहता है। ट्रंप के यूनेस्को, विश्व स्वास्थ्य संगठन और पेरिस जलवायु संधि जैसी वैश्विक संस्थाओं और संधियों से हाथ खींच लेने के कारण उभरती शक्तियों के लिए विश्व मंच पर कुछ जगह जरूर बनी है। हालांकि नियमबद्ध व्यवस्था का स्थान महाशक्तियों की मनमानी ने ले लिया है। अमेरिका का वेनेजुएला पर हमला कर राष्ट्रपति मादुरो को बंधक बनाना, ईरान और नाइजीरिया पर हवाई हमले और ताइवान को डराने के लिए चीन के सैनिक अभ्यास इसके ताजा उदाहरण हैं। महाशक्तियों की मनमानी भारत के लिए चिंताजनक है। भारत चाहता जरूर है कि वैश्विक संस्थाएं अमेरिका और यूरोप के नियंत्रण से मुक्त हों, पर नियमबद्धता की कीमत पर नहीं। वह चाहता है कि वैश्विक संस्थाओं में भारत, ब्राजील, दक्षिण अफ्रीका और जापान जैसी शक्तियों को भी आनुपातिक प्रतिनिधित्व मिले। महाशक्तियों की मनमानी वाली अव्यवस्था में यदि भारत को सुरक्षा परिषद और विश्व बैंक जैसी संस्थाओं में उचित स्थान मिल भी जाए तो उसकी व्यावहारिक उपादेयता क्या रह जाएगी? हकीकत यह है कि भारत को इसी व्यवस्था के भीतर अपनी विदेश नीति के कौशल से अपनी जगह बनानी है। इस साल उसे ब्रिक्स देशों की अध्यक्षता करनी है, जहां उसे दक्षिणी देशों का नेतृत्व करने का अवसर तो मिलेगा, मगर उसके लिए उसे चीन का सामना भी करना पड़ेगा। ईएमएस / 07 जनवरी 26