(प्रसंग वश आलेख- विश्व हिंदी दिवस 10 जनवरी) भारत की सांस्कृतिक चेतना की समृद्ध विरासत हिंदी न केवल हमारी अस्मिता की पहचान है वरन हमारे राष्ट्र की आत्मा भी है।अब हिंदी केवल परस्पर संवाद और संपर्क का माध्यम ही नहीं है वरन वैश्विक स्तर पर भी अपनी सर्जनात्मकता, जिजीविषा और समावेशिता के कारण अपने प्रभुत्व का निरंतर विस्तार कर रही है। विश्व में ऐसे भी स्थान है जहां भारतीय मूल के लोग नहीं है तब भी वहां पर हिंदी बोली समझी और पढ़ी जा रही है। आज विश्व के सभी महाद्वीपों के लगभग 140 से अधिक देशों में हिंदी की स्वीकार्यता में वृद्धि हो रही है। इसीलिए विश्व में हिंदी प्रयोक्ताओं की संख्या लगभग 100 करोड़ से अधिक हो गई है जो संयुक्त राष्ट्र संघ की 6 आधिकारिक भाषाओं के बोलने वालों की संख्या से बहुत अधिक है। अब विश्व का मानचित्र बदल गया है। पहले अंग्रेजों के साम्राज्य में सूर्य कभी अस्त नहीं होने का मिथक था जो इतिहास बन गया है किंतु अब हिंदी के लिए यह गर्व का विषय है कि उसके बोलने, समझने और लिखने वालों का संसार इतना विराट हो गया है कि वहां कभी भी सूर्य अस्त नहीं होता। भारतीय प्रतीकों और राष्ट्रवाद की प्रखरता को मुखरता के साथ प्रस्फुटित करने वाली हिंदी को अंतर्राष्ट्रीय भाषा के रूप में स्थापित करने, हिंदी के प्रति प्रवासी भारतीयों में भावनात्मक रिश्ता कायम करने और विश्व में सकारात्मक वातावरण निर्मित करने के उद्देश्य से 10 जनवरी 1975 को नागपुर में प्रथम विश्व हिंदी सम्मेलन संपन्न हुआ। जिसमें 30 देशों के 122 प्रतिनिधि सम्मिलित हुए थे। यह सम्मेलन हिंदी के वैश्विक प्रसार की दिशा में एक मील का पत्थर सिद्ध हुआ। इस सम्मेलन के बाद अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हिंदी को प्रतिष्ठित करने के लिए विश्व के विभिन्न देशों में अब तक 12 विश्व हिंदी सम्मेलन आयोजित किया जा चुके हैं। प्रथम विश्व हिंदी सम्मेलन की वर्षगांठ अर्थात 10 जनवरी 2006 से प्रधानमंत्री डॉ मनमोहन सिंह की पहल पर संयुक्त राष्ट्र संघ में हिंदी को आधिकारिक भाषा के रूप में अधिकृत करने के भारतीय प्रस्ताव को मजबूत करने, हिंदी को विश्व भाषा के रूप में प्रस्तुत करने तथा हिंदी के प्रचार-प्रसार हेतु जागरूकता और अनुराग सृजित करने के उद्देश्य से विश्व हिंदी दिवस मनाने की परंपरा प्रारंभ हुई है। अब तक विश्व के विभिन्न देशों में 12 विश्व हिंदी सम्मेलन आयोजित किया जा चुके हैं। फलस्वरूप हिंदी न केवल राष्ट्रीय आत्माभिमान का प्रतीक बनी है वरन अंतरराष्ट्रीय मंचों पर सांस्कृतिक संवाद, बौद्धिक विमर्श और भारतीय ज्ञान परंपरा का सशक्त माध्यम भी बनी है। वैश्विक स्तर पर हिंदी की उपादेयता उसकी सरलता, सहजता, तकनीकी सटीकता, संवादों की आत्मीयता और समावेशी प्रकृति के कारण निरंतर बढ़ रही है। 90 के दशक में भारत में जब उदारीकरण,वैश्वीकरण और ओधौगिकिकरण की प्रक्रिया प्रारंभ हुई तब विश्व की अनेक बहुराष्ट्रीय कंपनियां भारत में आईं। मीडिया नायक रुपर्ट मर्डोक स्टार चैनल और इसी तर्ज पर सोनी जैसे अन्य चैनलों ने भी अंग्रेजी कार्यक्रमों के साथ धूमधाम से भारत में पदार्पण किया जिससे हिंदी के लिए संकट निर्मित होता दिखाई दे रहा था किंतु शीघ्र ही उन्हें यह ब्रह्म ज्ञान प्राप्त हुआ कि भारतीय बाजार तंत्र में अपनी दर्शक संख्या बढ़ाने, अंतर्राष्ट्रीय उत्पाद बेचने,व्यावसायिक, व्यापारिक लाभ में वृद्धि हेतु उपभोक्ताओं को अपनी ओर आकर्षित करने के लिए हिंदी का इस्तेमाल अनिवार्य है। अतः विवश होकर उन्हें हिंदी की ओर मुड़ना ही पड़ा। अब अमेरिका,ऑस्ट्रेलिया, दक्षिण अफ्रीका सहित यूरोप के अन्य देशों में बहुराष्ट्रीय कंपनियां हिंदी सीखाने का व्यवसाय कर रही हैं। अपने उत्पादों के तकनीकी महत्व, जरूरी सूचनाएं, विज्ञापन आदि हिंदी में प्रस्तुत किए जा रहे हैं। इसके अतिरिक्त पर्यटन, विज्ञान, वाणिज्य, व्यवसाय, सूचना प्रणाली, डिजिटल मीडिया आदि अन्य क्षेत्रों में हिंदी का प्रयोग वैश्विक स्तर पर हिंदी भाषा की महत्ता को रेखांकित करता है। अतः हिंदी केवल साहित्य की भाषा ही नहीं है अपितु यह पूंजी, बाजार, संचार, तकनीक, विज्ञान, कूटनीति राजनय तथा अंतरराष्ट्रीय महत्व के मुद्दों का भी प्रतिनिधित्व करती है। भारतीय जनमानस में सहिष्णुता, समरसता और स्व का भाव उत्पन्न करने वाली हिंदी वैश्विक फलक पर अपनी महत्ता का परचम लहरा रही है। हिंदी न केवल संख्या बल वरन भू विस्तार की दृष्टि से भी विश्व की प्रधान भाषाओं में से एक है। विश्व के मानचित्र पर तीसरी सबसे बड़ी संवाद शक्ति बनकर उभर रही हिंदी गूगल, मेटा, माइक्रोसॉफ्ट की रिपोर्ट के अनुसार भारत के 50% से अधिक इंटरनेट उपभोक्ता हिंदी में सामग्री का उपभोग कर रहे हैं। सोशल मीडिया, फेसबुक, इंस्टाग्राम और यूट्यूब और विकिपीडिया पर हिंदी कंटेंट रचनाकारों की संख्या करोड़ों में हो गई है। डिजिटल मीडिया के युग में हिंदी सिनेमा,संगीत,गीतों, उपग्रह से प्रसारित कार्यक्रमों, धारावाहिकों, भारतीय संस्कृति, कला, साहित्य, खानपान, योग, अध्यात्म, लोकतांत्रिक मूल्यों और ओटीटी प्लेटफॉर्म ने हिंदी को वैश्विक सौम्य शक्ति सॉफ्ट पावर के रूप में स्थापित कर दिया है। बहुराष्ट्रीय कंपनियां अब हिंदी को अपनी रणनीति का अनिवार्य हिस्सा मान रही है। हमारी राष्ट्रीय शिक्षा नीति ने भी हिंदी को ज्ञान विज्ञान की भाषा के रूप में नए आयाम दिए हैं। विज्ञान, चिकित्सा, इंजीनियरिंग, प्रौद्योगिकी आदि विषयों की पाठ्य सामग्री भी अब हिंदी में सहजता से उपलब्ध होने के कारण शिक्षा का लोकतांत्रिकरण हो रहा है। विश्व के 180 से अधिक विश्वविद्यालयों में हिंदी का पठन-पाठन प्रशिक्षण और शोध कार्य हो रहा है। इस प्रकार हिंदी विश्व भाषा बनने की दिशा में निरंतर आगे बढ़ रही है। वैश्वीकरण के इस युग में हिंदी भाषा के प्रयोग में परिवर्तन परिलक्षित हुआ है। साहित्य की दृष्टि से हिंदी में गुणात्मक और मात्रात्मक दृष्टि से उच्चतम साहित्य सृजित किया जा रहा है। हिंदी विभिन्न भाषाओं में अनुवाद का सशक्त माध्यम बन गई है। आज विश्व में पढ़े जाने वाले समाचार पत्रों में आधे से अधिक हिंदी के हैं। हिंदी को संयुक्त राष्ट्र संघ में यद्यपि पूर्ण सम्मान नहीं मिला किंतु हिंदी में संयुक्त राष्ट्र के न्यूज़ पोर्टल चल रहे हैं। प्रवासी भारतीयों का हिंदी को जीवंत बनाए रखने में अद्भुत योगदान है। समय-समय पर संयुक्त राष्ट्र संघ के अधिवेशनों व जी 20 जैसे अंतरराष्ट्रीय मंचों पर हिंदी के उद्घोष तथा विदेशों से हिंदी में प्रकाशित पत्र पत्रिकाओं व सोशल मीडिया के व्यापक प्रयोग से विश्व में संपर्क भाषा के रूप में हिंदी की स्वीकार्यता में सुखद वृद्धि हो रही है।आज जन भाषा, संपर्क भाषा, वैश्वीकरण और बाजारवाद के अनूठे दौर में विश्व फलक पर हिंदी के कदम निरंतर बढ़ रहे हैं और समग्र संसार में हिंदी को नए आयाम मिल रहे हैं। यद्यपि हिंदी की वैश्विक स्तर पर प्रतिष्ठा बढ़ने के बाद भी हिंदी राष्ट्रभाषा के गौरव से वंचित है। सबसे बड़ी संवैधानिक कठिनाई यह है कि यदि भारत का एक भी प्रांत हिंदी को राष्ट्रभाषा के रूप में प्रतिष्ठापित नहीं करना चाहेगा तो वह राष्ट्रभाषा नहीं बन सकती। इसके साथ ही राजनीतिक नेतृत्व की तदर्थ वादी नीति, हिंदी समाज के मध्यम वर्ग का अपनी मातृभाषा के प्रति न्याय न करने नौकरशाही प्रशासनिक तंत्र और अभिजात्य वर्ग की हिंदी के प्रति उपेक्षा तथा हिंदी के साथ अंग्रेजी की प्रतिष्ठा बनाए रखने के कारण हिंदी अपने ही घर में दासी की स्थिति में रह रही है। पता नहीं राष्ट्रभाषा हिंदी का वनवास कब समाप्त होगा। हमें फादर कामिल बुल्के के इन विचारों को नहीं भूलना चाहिए जो उन्होंने द्वितीय विश्व हिंदी सम्मेलन के अवसर पर मॉरीशस में अभिव्यक्त किए थे द्वितीय विश्व हिंदी सम्मेलन की सबसे बड़ी उपलब्धि यह होगी कि मॉरीशस के हिंदी भाषी नागरिकों से भारत के नागरिक प्रेरणा लेंगे और भारत में हिंदी को पूर्ण रूप से प्रतिष्ठित करेंगे।ऐसा हो जाने पर ही हिंदी को विश्व भाषा का गौरव प्राप्त होगा। आजादी के अमृत काल में पंच प्रण के बिंदु विकसित भारत, गुलामी की हर सोच से मुक्ति,विरासत पर गर्व, एकता और एकजुटता, नागरिकों द्वारा अपने कर्तव्यों का पालन ऐसे महत्वपूर्ण आयाम है जिनके प्रति हमारी प्रतिबद्धता होनी चाहिए। पंच प्रण का दूसरा संकल्प गुलामी की हर सोच से मुक्ति में एक महत्वपूर्ण क्षेत्र है भाषा। दुर्भाग्यवश भारत को उस औपनिवेशिक शक्तिशाली मानसिकता से मुक्त करना संभव नहीं हो सका जिसमें अंग्रेजी को जानना ही विद्वता की निशानी माना जाता है। इसे अंग्रेजी के प्रति हमारी विवशता कहें या आकर्षण या अंधमोह कि आज अंग्रेजी हिंदी से अधिक सशक्त बन गई है। जन सामान्य को यह लगता है कि उनका बच्चा यदि अंग्रेजी नहीं जानता तो वह कितना भी मेघावी और प्रतिभाशाली क्यों ना हो सफल नहीं हो सकता। शिक्षा के पूंजीवादी चरित्र ने अंग्रेजी स्कूलों की भरमार लगा दी है। कभी-कभी तो हिंदी की उपेक्षा से मुझे ऐसा प्रतीत होता है कि क्या सचमुच हम हिंदी के समर्थक हैं या हम ऐसा होने का मात्र आडंबर कर रहे हैं। अतः हम सबको अपनी भाषा की ओर लौटने, उसे महत्व देने और दुनिया के लिए उसकी उपादेयता सिद्ध करने की की सख्त जरूरत है। हमें गैर हिंदी भाषियों के प्रति भी सम्मान का भाव रखना होगा। उत्तर दक्षिण के मध्य सेतु बनाए रखने के लिए हमें एक दूसरे की कम से कम एक भाषा को जरूर सीखना चाहिए। यदि हम ऐसा कर सके तो जैसे 19 वीं सदी फ्रेंच भाषा की और 20 वीं सदी अंग्रेजी की थी तो 21वीं सदी हमारी होगी हिंदी की होगी। सृजन का उत्स है संधान भी है, तरक्की का यही उन्वान भी है। ज़ुबां कहते हैं हिंदी आप जिसको,फकत भाषा नहीं पहचान भी है। (पूर्व आई.ए.एस. मोटिवेशनल स्पीकर, इंदौर) ईएमएस / 09 जनवरी 26