लेख
09-Jan-2026
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कोलकाता में ममता बनर्जी के बगावती तेवर केवल एक राजनीतिक प्रतिक्रिया नहीं है। बल्कि उस असंतोष की अभिव्यक्ति है, जो पिछले कुछ वर्षों से विपक्ष के भीतर लगातार पनप रही है। प्रवर्तन निदेशालय की कार्रवाई के दौरान जिस तरह से मुख्यमंत्री ममता बनर्जी स्वयं मौके पर पहुंचीं। अधिकारियों के सामने खड़ी हुईं , उन्होंने पार्टी से जुड़े दस्तावेज ईडी के अधिकारियों से छीनकर अपने साथ ले आईं। उसने देश की राजनीति में एक नई और असहज स्थिति में लाकर खड़ा कर दिया है। क्या जांच एजेंसियां कानून का निष्पक्ष पालन कर रही हैं ? या वह सत्ता की राजनीतिक रणनीति का हिस्सा और मोहरा बनती जा रही हैं? ममता बनर्जी का आरोप सीधा और गंभीर है। उनका कहना है कि आईपैक और पार्टी से जुड़े लोगों के यहां पड़े छापों का मकसद किसी आर्थिक अपराध की जांच नहीं, बल्कि तृणमूल कांग्रेस की चुनावी रणनीति, उम्मीदवारों की सूची और आईटी सेल का डेटा हासिल करना था। चुनाव के ठीक पहले यदि जांच एजेंसियां सचमुच किसी पार्टी के राजनीतिक दस्तावेजों और डिजिटल डेटा को निशाना बना रही हैं। किसी भी पार्टी के आंतरिक लोकतंत्र की आत्मा पर हमला ही माना जाएगा। चुनावी मुकाबला विचारों और जनसमर्थन से होना चाहिए, नाकि एजेंसियों के सहारे राजनीतिक लड़ाई लड़नी चाहिए। ईडी का पक्ष है, सर्च कानूनी प्रक्रिया के तहत और पुराने मामलों के आधार पर की गई है। सवाल यह है कि पिछले कुछ वर्षों में ऐसे मामलों में जांच एजेंसियों की सक्रियता अक्सर चुनावों के आसपास ही क्यों दिखाई देती है। झारखंड में हेमंत सोरेन, महाराष्ट्र में शरद पवार और कांग्रेस के बैंक खातों को फ्रीज किए जाने छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री दिल्ली के मुख्यमंत्री और मंत्री सभी के खिलाफ एक जैसी घटनाएं यह धारणा मजबूत करती हैं। केंद्रीय एजेंसियों का इस्तेमाल राजनीतिक दबाव बनाने के लिए किया जा रहा है। उन्हें चुनाव में पराजित करने के लिए इस तरह से जांच एजेंसी केंद्र सरकार के सारे पर काम करती है। अब तो यह आप न्यायपालिका पर भी लगने लगा है। न्यायपालिका के निर्णय अब खुली आंख से हो रहे हैं सत्ता पक्ष के लोगों के लिए अलग तरीके से निर्णय आते हैं विपक्ष के लिए अलग तरह से निर्णय देखने को मिलते हैं। जांच एजेंसियों की जांच लंबी चलती है। इसे विपक्षी दलों को बदनाम करने तथा उन्हें चुनाव लड़ने से रोकने के लिए इस तरह की कार्रवाई की जाती है जांच एजेंसी के नतीजे कई वर्षों तक दुर्लभ होते हैं। २जी ३जी और कोल घोटाले का क्या असर हुआ, अजीत पवार के ऊपर 70000 करोड रुपए के घोटाले के आरोप लगाए गए थे। उसका क्या हुआ ,यह सभी जानते हैं। जांच एजेंसियां चुनाव आयोग की कार्यवाही तथा न्याय पालिका के जो निर्णय हो रहे हैं। उसे विपक्षी राजनीतिक दलों को चुनाव में भारी नुकसान उठाना पड़ता है। पश्चिम बंगाल उच्च न्यायालय के न्यायाधीश इस्तीफा देकर भाजपा की सदस्यता लेने और पश्चिम बंगाल की सरकार के खिलाफ समय-समय पर जो निर्णय देखने को मिले हैं उसमें पक्षपात होता हुआ दिखता है जिसके कारण अब ममता दीदी पूरे बगावती तेवर में है और वह आर पार की लड़ाई लड़ने के लिए सड़कों पर उतर गई हैं। ममता बनर्जी का यह आक्रामक रुख इस मायने में अलग है, उन्होंने डर की राजनीति को खुली चुनौती दी है। उन्होंने यह संकेत दिया कि विपक्ष केवल बयानबाजी तक सीमित नहीं रहेगा। सत्ता की पक्षपात पूर्ण कार्रवाई जांच एजेंसियों और न्यायपालिका के पक्षपात का सड़कों पर आकर विरोध करेंगी। यह कदम कानूनी जोखिम से भरा हो सकता है। राजनीतिक रूप से उन्होंने खुद को एक आक्रामक नेता के रूप में स्थापित किया है। जो केंद्रीय सत्ता के आगे झुकने को किसी भी कीमत में तैयार नहीं है। यह विवाद केवल बंगाल या तृणमूल कांग्रेस तक सीमित नहीं रहेगा। जांच एजेंसियों, चुनाव आयोग और न्याय पालिका द्वारा जिस तरह से विपक्षी दलों के लिए अलग और सत्ता पक्ष के लिए अलग तरह से काम किया जा रहा है। यह पूरे देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था से जुड़ा सवाल और विपक्ष के अस्तित्व से जुड़ा हुआ प्रश्न है। जांच एजेंसियों की विश्वसनीयता पर बार-बार सवाल उठ रहे है। न्यायिक और संवैधानिक संस्थाओं की जिम्मेदारी बढ़ जाती है। वह अपने कार्य को निष्पक्ष तरीके से करें। लोकतंत्र की मजबूती इसी में है। जांच निष्पक्ष हो, चुनाव बराबरी के मैदान में हो। सत्ता तथा विपक्ष दोनों के लिए कानून समान हों। ममता दीदी के बगावती तेवर वर्तमान समय की राजनीति का आईना हैं। केंद्र सरकार और संवैधानिक संस्थाओं के लिए यह एक चेतावनी और चुनौती है। अगर लोकतांत्रिक संस्थाओं द्वारा अपने कर्तव्यों का सही तरीके से पालन नहीं किया गया। सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच भेदभाव किया गया। इसका संतुलन पूरी तरह से बिगड़ चुका है। न्याय पालिका की विश्वसनीयता भी धीरे-धीरे खत्म होती चली जा रही है। न्यायपालिका के निर्णय या तो टाल दिए जाते हैं या वह सत्ता पक्ष को फायदा पहुंचाते हैं। जिसके कारण अब विपक्ष के पास सड़कों पर आने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचा। जिस तरह से चुनाव आयोग का केंद्रीकरण हो गया है मतदाता सूची से लेकर मतदान तक की सारी प्रक्रिया केंद्रीय चुनाव आयोग के पोर्टल से तय हो रही है। जांच एजेंसियां चुनाव के पहले विभिन्न राजनीतिक दलों के खिलाफ इस तरह की कार्रवाई शुरू करती हैं न्यायपालिका चुपचाप तमाशा देखती रह जाती है ऐसी स्थिति में भारत की लोकतांत्रिक व्यवस्था एवं संवैधानिक संस्थाओं की विश्वसनीयता दोनों ही खतरे में पड़ गई हैं। इसको बनाए रखने की जिम्मेदारी संवैधानिक संस्थाओं और केंद्र सरकार की है। पश्चिम बंगाल में जो बगावती तेवर ममता दीदी ने दिखाए हैं। इसका असर अब संपूर्ण देश में देखने को मिल सकता है। विपक्षी दल लड़कर ही अपने आप को जिंदा रख सकते हैं। यदि वह डर गए तो उनका खत्म होना तय है। ममता दीदी का स्वभाव डरने वाला नहीं है इसलिए उन्होंने अपनी आक्रामकता दिखने में अब कोई कोर कसर नहीं छोड़ी है। देश की राजनीति और लोकतांत्रिक संघीय व्यवस्था में इसका व्यापक असर पढ़ना तय है। ईएमएस / 09 जनवरी 26