डोनाल्ड ट्रम्प की राजनीति टकराव पर टिकी रही है। राष्ट्रपति बनने के बाद उन्होंने सहयोग की जगह दबाव को चुना। व्यापार को हथियार बनाया गया। टैरिफ को कूटनीति का विकल्प बना दिया गया। अब रूस पर प्रतिबंध वाला नया बिल उसी सोच का विस्तार है। यह केवल रूस के खिलाफ कदम नहीं है। यह पूरी वैश्विक अर्थव्यवस्था को अस्थिर करने की कोशिश है। रूस से तेल खरीदने वाले देशों पर पांच सौ प्रतिशत टैरिफ का प्रस्ताव अभूतपूर्व है। यह अंतरराष्ट्रीय व्यापार के सिद्धांतों के खिलाफ है। विश्व व्यापार संगठन की भावना को कमजोर करता है। भारत जैसे देशों को सीधे निशाना बनाता है। भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए विविध स्रोत अपनाता रहा है। सस्ता तेल खरीदना कोई अपराध नहीं है। यह एक जिम्मेदार अर्थव्यवस्था का स्वाभाविक निर्णय है। ट्रम्प यूक्रेन युद्ध को रोक पाने में असफल रहे हैं। इस विफलता की खीझ अब पूरी दुनिया पर निकाली जा रही है। प्रतिबंधों की राजनीति से युद्ध नहीं रुकते। इतिहास इसका गवाह है। क्यूबा से ईरान तक प्रतिबंधों ने आम जनता को नुकसान पहुंचाया। सत्ता संरचनाएं और कठोर हुईं। यही खतरा रूस के मामले में भी है।अमेरिकी संसद में पेश होने वाला यह बिल साधारण बहुमत से पारित हो सकता है। इसका मतलब है कि अमेरिका वैश्विक व्यापार को अपने घरेलू राजनीतिक एजेंडे के अनुसार मोड़ना चाहता है। यह भरोसे का संकट पैदा करता है। अमेरिका जो खुद को मुक्त बाजार का संरक्षक कहता था। अब वही सबसे बड़ा बाधक बनता दिख रहा है। अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट में टैरिफ से जुड़े मामलों पर फैसला आना है। यह फैसला केवल कानूनी नहीं होगा। यह वैश्विक संकेत देगा। अगर अदालत भी कार्यपालिका की मनमानी को रोक नहीं पाती। तो यह अमेरिकी लोकतंत्र की सीमाओं को उजागर करेगा। भारत पर संभावित असर गंभीर है। यदि ऐसा टैरिफ लागू होता है। तो वैश्विक बाजारों में अनिश्चितता बढ़ेगी। कच्चे तेल की कीमतों में उछाल आ सकता है। सोने और चांदी के दाम बढ़ सकते हैं। शेयर बाजार में उतार चढ़ाव तेज होगा। आम आदमी पर महंगाई का दबाव बढ़ेगा। इसके बावजूद भारत की स्थिति मजबूत है। भारत नए बाजारों की ओर बढ़ रहा है। मुक्त व्यापार समझौतों का दायरा फैल रहा है। यूरोपीय संघ से लेकर पश्चिम एशिया तक बातचीत चल रही है। निर्यात में उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई है। अमेरिका अब भी भारत का बड़ा बाजार है। ट्रम्प का पिछला टैरिफ प्रयास भी भारत की रफ्तार नहीं रोक सका। यही भारत की असली ताकत है। विविधीकरण। आत्मनिर्भरता। और बहुपक्षीय सहयोग। भारत किसी एक देश पर निर्भर नहीं है। यही कारण है कि भारत पर दबाव बनाना आसान नहीं होगा। ट्रम्प की नीति ने अमेरिका को भी नुकसान पहुंचाया है। वहां की मध्यवर्गीय आबादी महंगाई से जूझ रही है। आयात महंगा हुआ है। रोजमर्रा की वस्तुएं पहुंच से दूर हो रही हैं। व्यापार युद्ध का बोझ अंततः उपभोक्ता उठाता है। यह सच्चाई ट्रम्प अनदेखी कर रहे हैं। अमेरिका का अंतरराष्ट्रीय संस्थानों से हटना भी इसी प्रवृत्ति का हिस्सा है। अंतरराष्ट्रीय सोलर अलायंस से बाहर होना प्रतीकात्मक नहीं है। यह दुनिया को संदेश देता है कि अमेरिका अब साझा भविष्य में विश्वास नहीं करता। जलवायु परिवर्तन जैसे वैश्विक संकट में सहयोग जरूरी है। भारत और फ्रांस की पहल से बना यह मंच विकासशील देशों की उम्मीद है। अमेरिका का हटना दबाव की रणनीति है। यह भारत को झुकाने का संकेत है। लेकिन भारत अब वह देश नहीं रहा जो आसानी से दब जाए। भारत ने बहुपक्षीय मंचों पर नेतृत्व दिखाया है। जी ट्वेंटी की अध्यक्षता इसका उदाहरण है। यह समय वर्ल्ड माइनस वन का है। यानी ऐसी दुनिया जहां अमेरिका अकेला निर्णायक न हो। मजबूत अर्थव्यवस्थाएं मिलकर नया संतुलन बना सकती हैं। भारत इसमें केंद्रीय भूमिका निभा सकता है। एशिया। अफ्रीका। लैटिन अमेरिका। और यूरोप के साथ नए गठजोड़ संभव हैं। चीन भी अमेरिकी टैरिफ से प्रभावित है। ब्राजील भी। इन देशों के हित कई जगह मिलते हैं। प्रतिस्पर्धा के बावजूद सहयोग की जमीन मौजूद है। नया आर्थिक आदेश टकराव से नहीं बनेगा। साझेदारी से बनेगा। ट्रम्प की राजनीति अल्पकालिक लाभ पर केंद्रित है। लेकिन वैश्विक अर्थव्यवस्था दीर्घकालिक भरोसे पर चलती है। जब भरोसा टूटता है। तो पूंजी डरती है। निवेश रुकता है। विकास धीमा होता है। यही स्थिति आज बन रही है। भारत को सतर्क रहना होगा। कूटनीति में संतुलन जरूरी है। अमेरिका के साथ संवाद बना रहना चाहिए। लेकिन आत्मसम्मान से समझौता नहीं होना चाहिए। ऊर्जा सुरक्षा भारत की प्राथमिकता है। इसे कोई बाहरी ताकत तय नहीं कर सकती। आज दुनिया के कई देश अमेरिका की नीति से असहज हैं। यूरोप में भी सवाल उठ रहे हैं। विकासशील देशों में असंतोष है। यह ट्रम्प की एकतरफा सोच का परिणाम है। अखिरकार यह ट्रेड वॉर किसी को विजेता नहीं बनाएगा। हार सभी की होगी। सबसे ज्यादा नुकसान आम लोगों का होगा। इतिहास ऐसे प्रयोगों को खारिज करता रहा है। भारत के सामने अवसर भी है और चुनौती भी। अवसर नेतृत्व का है। चुनौती दबाव का। अगर भारत संयम और साहस से आगे बढ़ता है। तो यह दौर भारत की वैश्विक भूमिका को और मजबूत करेगा। दुनिया को सहयोग चाहिए। दीवारें नहीं। व्यापार पुल बनाता है। हथियार नहीं। यह संदेश भारत को आगे बढ़कर देना होगा। यही समय की मांग है। (यह लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं इससे संपादक का सहमत होना अनिवार्य नहीं है) ईएमएस/10/01/26