लेख
12-Jan-2026
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लोहड़ी पर्व यूं तो मुख्य रूप से पंजाब ,हरियाणा व हिमाचल में मनाया जाता है, लेकिन अब शायद ही ऐसा कोई राज्य या देश हो जहां यह पर्व न मनाया जाता हो।वस्तुतः लोहड़ी का पर्व किसानों के लिए नये साल के रूप में भी मानाया जाता है।लोहड़ी को सर्दियों के जाने और बसंत के आने का संकेत भी कहा जाता है। कई जगहों पर लोहड़ी को तिलोड़ी भी कहते है।लोहड़ी पर शाम के समय आग का अलाव जलाया जाता है,इस अलाव में गेहूं की बालियों को अर्पित किया जाता है।इस अवसर पर विशेष रूप से पंजाबी समुदाय के लोग भांगड़ा और गिद्दा नृत्य कर उत्सव मनाते हैं।लोहड़ी का पर्व फसल की कटाई और बुआई के तौर पर भी मनाये जाने की परंपरा है।इस दिन लोग आग जलाकर इसके इर्द-गिर्द नाचते-गाते और खुशियां मनाते हैं।आग में गुड़, तिल, रेवड़ी, गजक डालने और इसके बाद इसे एक-दूसरे में बांटने की परंपरा है।इस दिन पॉपकॉर्न और तिल के लड्डू भी बांटे जाते हैं। यह पर्व पंजाब व हरियाणा में फसल काटने के दौरान मनाया जाता है।इस दिन रबी की फसल को आग में समर्पित कर सूर्य देव और अग्नि का आभार प्रकट किया जाता है। आज के दिन किसान अच्छी फसल की कामना करते हैं।लोहड़ी में लोकगीतों का बड़ा महत्व माना जाता है।लोहड़ी से जुड़े लोकगीतों से लोगों के दिल में नई ऊर्जा एवं नई ख़ुशी की अनुभूति होती है।लोहड़ी लोकगीत के साथ नृत्य करके इस पर्व को मनाया जाता है। इन सांस्कृतिक लोक गीतों में ख़ुशहाल फसलों व अच्छे रिश्तों के बारे में वर्णन होता है।हास परिहास भी होता है। लोकगीत के द्वारा पंजाबी योद्धा दुल्ला भाटी को भी याद किया जाता है।इस दिन अलाव के पास घेरा बनाकर दुल्ला भट्टी की कहानी सुनी जाती है। लोहड़ी पर दुल्ला भट्टी की कहानी सुनने का खास महत्व है। कहा जाता है कि मुगल काल में अकबर शासन के समय में दुल्ला भट्टी नाम का एक शख्स पंजाब में रहता था।उस समय कुछ अमीर व्यापारी सामान की जगह शहर की लड़कियों को बेचा करते थे, तब दुल्ला भट्टी ने उन लड़कियों को बचाकर उनकी शादी करवाई थी। कहते हैं तभी से हर साल लोहड़ी के पर्व पर दुल्ला भट्टी की याद में उनकी कहानी सुनने व सुनाने की पंरापरा चली आ रही है। लोहड़ी के दिन मित्रो और रिश्तेदारों को बधाइयां और मिठाई भेजे जाती है लेकिन इस बार भीड़ से बचकर और सामाजिक दूरी का ध्यान रखते हुए त्योहार को मनाना परिवार के लिए बेहद जरूरी है। इस त्योहार को मनाने के लिए खुली जगह पर अलाव रूपी लोहड़ी में आग लगाई जाती है और नृत्य करते हुए गीत गाए जाते हैं और फिर पवित्र अग्नि में मूंगफली, गजक, तिल आदि डालकर परिक्रमा की जाती है।लोहड़ी से जुड़ी एक कथा माता सती की भी है। जब माता सती के पिता राजा दक्ष ने महायज्ञ किया था, तब उन्होंने भगवान शिव और माता सती को आमंत्रित नहीं किया गया था। लेकिन माता सती अपने पिता के न बुलाने पर भी जिद्द करके यज्ञ में पहुंच गईं थी, जहां उनका और भगवान शिव का राजा दक्ष द्वारा अपमान किया गया। अपमान से क्रोधित देवी सती ने खुद को हवन कुंड के हवाले कर दिया था।सती के आत्मदाह के बाद भगवान शिव ने राजा दक्ष का घमंड से भरा हुआ सिर काट दिया था। दक्ष को जब अपनी गलती का अहसास हुआ और बाद में ब्रह्माजी द्वारा प्रार्थना किए जाने पर भगवान शंकर ने दक्ष प्रजापति को उसके सिर के बदले बकर सिर प्रदान करवाकर यज्ञ संपन्न करवाया। इसके बाद जब देवी सती ने पार्वती के रूप में जन्म लिया था, तब पार्वती के ससुराल में लोहड़ी के अवसर पर दक्ष प्रजापति ने उपहार भेजकर अपने किये पर क्षमा मांगी और भूल सुधारने का प्रयास किया। तभी से नवविवाहित कन्याओं के लिए मायके से वस्त्र व उपहार भेजा जाता है।लोहड़ी का पर्व मनाने के पीछे लोहड़ी और होलिका दोनों बहनों की कथा मिलती है। लोहड़ी की प्रवृति अच्छी थी और लोगों की मदद करती थी। वहीं होलिका का व्यवहार अच्छा नहीं था। होलिका को भगवान शंकर से वरदान के तौर पर एक चादर मिली थी, जिसे ओढ़ने पर अग्नि उसे जला नहीं सकती थी। लेकिन जब होलिका प्रहलाद को अपनी गोद में लेकर अग्नि में बैठ गई तब प्रहलाद तो बच गया लेकिन होलिका जल गई। इसके बाद से लोहड़ी की पंजाब में पूजा होने लगी और उन्हीं के नाम पर यह पर्व भी मनाया जाने लगा।लोहड़ी पर्व का संबंध भगवान श्रीकृष्ण से भी जुड़ा हुआ है। कंस ने भगवान श्रीकृष्ण को मारने के लिए नंदगांव में लोहिता नाम की राक्षसी को भेजा था। उस समय सभी लोग मकर संक्रांति के पर्व को लेकर तैयारी कर रहे थे। अवसर का लाभ उठाकर लोहिता ने श्रीकृष्ण को मारना चाहा लेकिन कृष्ण ने लोहिता का ही वध कर दिया। इस वजह से भी मकर संक्रांति से एक दिन पहले लोहड़ी का पर्व मनाया जाता है। (लेखक वरिष्ठ साहित्यकार एवं विक्रमशिला हिंदी विद्यापीठ के उपकुलपति है) ईएमएस / 12 जनवरी 26