लेख
12-Jan-2026
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मध्य-पूर्व एक बार फिर वैश्विक राजनीति के सबसे विस्फोटक केंद्र के रूप में उभर आया है। ईरान में जिस तरह के प्रदर्शन सत्ता परिवर्तन के लिए हो रहे हैं इसमें अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप सीधे हस्तक्षेप कर रहे हैं। उसके बाद ईरान सरकार द्वारा परमाणु बम को लेकर जो धमकी दी जा रही है, परोक्ष–अपरोक्ष धमकियाँ, अमेरिका का ईरान में सत्ता परिवर्तन के संकेतों वाला हस्तक्षेपकारी रवैया और इज़राइल में प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के खिलाफ तेज़ होता आंतरिक विरोध। यह सभी घटनाएँ अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था को गंभीर अस्थिरता की ओर धकेलती दिख रही हैं। इसका असर सारी दुनिया के देशों में आर्थिक मंदी और सामरिक युद्ध के रूप में देखा जा रहा है। सवाल यह है, क्या मौजूदा हालात दुनिया को तीसरे विश्व युद्ध की ओर ले जा रहे हैं? क्या सारी दुनिया को आर्थिक मंदी का सामना करना पड़ सकता है। ईरान का परमाणु कार्यक्रम लंबे समय से पश्चिमी देशों की चिंता का विषय रहा है। अमेरिका और उसके सहयोगी क्षेत्रीय सुरक्षा के लिए खतरा मानते हैं, जबकि ईरान परमाणु कार्यक्रम को अपनी संप्रभुता और आत्मरक्षा से जोड़ता है। यदि अमेरिका सीधे ईरान पर सैन्य हमला करता है तो यह सिर्फ दो देशों के बीच का टकराव नहीं रहेगा। इसके वैश्विक नतीजे देखने को मिलेंगे। ईरान को चीन और रूस खुलकर मदद कर रहे हैं। मध्य-पूर्व में पहले से ही अस्थिरता चरम पर है। एक चिंगारी पूरे क्षेत्र को युद्ध की आग में झोंक सकती है। ऐसी स्थिति में रूस और चीन की भूमिका निर्णायक मानी जा रही है। रूस, जो पहले से ही यूक्रेन युद्ध के कारण पश्चिम से टकराव में है, ईरान को वह रणनीतिक साझेदार मानता है। अमेरिका के एक तरफा सैन्य हस्तक्षेप का कड़ा विरोध रूस करेगा, इसमें कोई संदेह नहीं है। कूटनीतिक मंचों पर हो या अप्रत्यक्ष सैन्य सहयोग के रूप में चीन भी हर हालत में ईरान के साथ रहेगा। चीन ऊर्जा आपूर्ति और वैश्विक व्यापार संतुलन को लेकर सजग रहता है। अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप जिस तरह से टैरिफ लगाकर सारी दुनिया के देशों को भयाक्रांत किए हुए हैं, उसके बाद चीन युद्ध को खुलकर समर्थन भले ना दे, अमेरिका-विरोधी ध्रुवीकरण में वह ईरान के पक्ष में ही मजबूती के साथ खड़ा होगा। इससे स्पष्ट रूप से दुनिया के देश बहुध्रुवीय संघर्ष की ओर बढ़ेंगे। इज़राइल के भीतर नेतन्याहू सरकार के खिलाफ बढ़ता जनआक्रोश भी इस संकट को जटिल बनाता है। आंतरिक राजनीतिक दबाव कई बार सरकारों को बाहरी दुश्मन के खिलाफ आक्रामक रुख अपनाने के लिए प्रेरित करता है। ताकि घरेलू असंतोष से ध्यान हटाया जा सके। दुनिया कई देशों में महंगाई और बेरोजगारी को लेकर वहां की सरकारों के खिलाफ उग्र प्रदर्शन देखने को मिल रहे हैं, जिसके कारण वर्तमान स्थिति में यह प्रवृत्ति क्षेत्रीय शांति के लिए घातक हो सकती है। दूसरी ओर, अमेरिका के भीतर डोनाल्ड ट्रंप के खिलाफ बढ़ते प्रदर्शन, यूरोपीय देशों विशेषकर कनाडा और ग्रीनलैंड से जुड़े विवाद, अमेरिकी नेतृत्व की वैश्विक विश्वसनीयता पर सवाल खड़े कर रहे हैं। यूरोप अब पहले की तरह बिना सवाल किए वाशिंगटन की राह पर चलने को तैयार नहीं दिख रहा है। इन सभी घटनाओं का सम्मिलित प्रभाव यह संकेत देता है, दुनिया एक खतरनाक मोड़ पर आकर खड़ी हो गई है। जिस तरह की आर्थिक चुनौतियां तथा कर्ज की समस्या से सभी देशों को महंगाई और बेरोजगारी जैसे मामलों में अपने ही देश की जनता का विरोध झेलना पड़ रहा है। आर्थिक स्थिति दिनों दिन खराब हो रही है। वर्तमान तनाव को देखते हुए सीधे तीसरे विश्व युद्ध की शुरुआत कहना फिलहाल जल्दबाज़ी होगी। लेकिन इतना स्पष्ट है, यदि कूटनीति का स्थान सैन्य ताकत के रूप में इस्तेमाल किया जाएगा, तो परिणाम विश्व के लिए विनाशकारी होंगे। वर्तमान में आवश्यकता शक्ति-प्रदर्शन की नहीं, बल्कि संवाद, संयम और अंतरराष्ट्रीय सहयोग की है। जिस तरह से वैश्विक व्यापार संधि का पालन अमेरिका सहित समर्थ देशों द्वारा नहीं किया जा रहा है। उसके कारण भी स्थिति दिन प्रति दिन यह आशंका बनने लगी है क्या एक बार फिर प्रथम और द्वितीय विश्व युद्ध का इतिहास दोहराया जा सकता है। ईएमएस / 12 जनवरी 26