नई दिल्ली(ईएमएस)। भारतीय वायुसेना (आईएएफ) की युद्धक क्षमता को नई ऊंचाइयों पर ले जाने के लिए भारत और फ्रांस एक ऐतिहासिक रक्षा समझौते के बेहद करीब पहुंच गए हैं। वायुसेना के बेड़े में लड़ाकू विमानों की लगातार होती कमी को पूरा करने के लिए अतिरिक्त राफेल विमानों के ऑर्डर दिए जाने की प्रबल संभावना है। रक्षा गलियारों में यह चर्चा अगले महीने फ्रांसीसी राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों की भारत यात्रा के दौरान और अधिक तेज होने वाली है। भारतीय वायुसेना ने पहले ही सरकार-से-सरकार (जी2जी) समझौते के तहत बड़ी संख्या में आधुनिक जेट विमानों के अधिग्रहण का विस्तृत प्रस्ताव सरकार के समक्ष पेश किया है। इस मेगा प्रोजेक्ट के तहत वायुसेना को अपनी सामरिक बढ़त बनाए रखने के लिए कम से कम 114 आधुनिक लड़ाकू विमानों की तत्काल आवश्यकता है। इस विशाल अधिग्रहण प्रक्रिया के लिए सबसे पहले रक्षा अधिग्रहण परिषद (डीएसी) से औपचारिक सैद्धांतिक मंजूरी ली जाएगी। इसके बाद दोनों देशों के बीच कीमतों और तकनीकी बारीकियों पर विस्तृत बातचीत होगी। अंत में, सुरक्षा मामलों की मंत्रिमंडलीय समिति (सीसीएस) की अंतिम मुहर के बाद यह सौदा धरातल पर उतरेगा। पिछले साल भारतीय नौसेना के लिए 26 राफेल (समुद्री संस्करण) विमानों के सौदे के बाद, अब वायुसेना के लिए होने वाली इस नई डील की कीमत कई अरब यूरो होने का अनुमान लगाया जा रहा है। यह सौदा न केवल सैन्य दृष्टि से बल्कि आर्थिक और कूटनीतिक रूप से भी अत्यंत महत्वपूर्ण माना जा रहा है। इस आगामी सौदे की सबसे बड़ी और क्रांतिकारी खासियत यह है कि इन विमानों का निर्माण मुख्य रूप से भारत में ही किया जाएगा। यह कदम भारतीय औद्योगिक पारिस्थितिकी तंत्र में महत्वपूर्ण और संवेदनशील सैन्य तकनीकों के हस्तांतरण का मार्ग प्रशस्त करेगा। पिछले साल जून में टाटा एडवांस्ड सिस्टम्स लिमिटेड और फ्रांस की दिग्गज कंपनी डसॉल्ट एविएशन के बीच राफेल का फ्यूजलेज (विमान का मुख्य ढांचा) भारत में बनाने को लेकर एक महत्वपूर्ण समझौता हुआ था। इसके तहत हैदराबाद में एक अत्याधुनिक निर्माण इकाई स्थापित की जा रही है। यह इकाई न केवल भारतीय वायुसेना की जरूरतों को पूरा करेगी, बल्कि वैश्विक ऑर्डरों के लिए भी राफेल फ्यूजलेज के चार मुख्य हिस्सों का निर्माण करेगी। उम्मीद है कि वित्तीय वर्ष 2028 तक इस सुविधा से पहली यूनिट तैयार होकर निकलेगी। इस कारखाने की क्षमता सालाना 24 फ्यूजलेज बनाने की होगी, जो वैश्विक मानकों के अनुरूप है।रक्षा सूत्रों के अनुसार, इस बार सहयोग का दायरा केवल विमान के ढांचे तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि इंजन निर्माण और रखरखाव की उच्च सुविधाओं को भी पूरी तरह भारत में स्थानांतरित किया जा रहा है। हैदराबाद में एक समर्पित इंजन उत्पादन संयंत्र स्थापित करने की योजना है, जो विमानों को स्वदेशी शक्ति प्रदान करेगा। इसके अतिरिक्त, उत्तर प्रदेश के जेवर में एक विशाल मेंटेनेंस, रिपेयर्स और ओवरहॉल हब विकसित किया जा रहा है। इन सभी परियोजनाओं के सफल होने पर राफेल विमान के निर्माण का लगभग 60 प्रतिशत मूल्य भारत में ही रहने की उम्मीद है। यह पहल आत्मनिर्भर भारत और मेक इन इंडिया की दिशा में अब तक का सबसे बड़ा कदम साबित होगी। तकनीकी रूप से राफेल एक ओमनी-रोल विमान है, जो इसे दुनिया के अन्य लड़ाकू विमानों से अलग बनाता है। इसका अर्थ है कि यह एक ही मिशन के दौरान हमला करने, जासूसी करने और रक्षात्मक कार्रवाई करने जैसे कई काम एक साथ कर सकता है। वीरेंद्र/ईएमएस/10जनवरी2026