वॉशिंगटन,(ईएमएस)। ईरान में जारी भीषण जन-आक्रोश और सरकार विरोधी प्रदर्शनों के बीच अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने प्रदर्शनकारियों के समर्थन में बड़े और निर्णायक कदम उठाने के स्पष्ट संकेत दिए हैं। हालांकि, व्हाइट हाउस और पेंटागन के भीतर इस मुद्दे पर बहुत गंभीर और गोपनीय मंथन चल रहा है। सवाल अब यह नहीं रह गया है कि अमेरिका कोई कदम उठाएगा या नहीं, बल्कि मुख्य चुनौती यह है कि वह कदम कब और किस हद तक उठाया जाए। इस बीच, अमेरिकी सैन्य नेतृत्व ने राष्ट्रपति ट्रंप को वही रणनीतिक जवाब दिया है जो कभी भारतीय जनरल सैम मानेकशॉ ने 1971 के संकट के दौरान तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को दिया था। यह ऐतिहासिक संदर्भ आज के शिया बहुल देश ईरान की स्थिति में बेहद प्रासंगिक हो गया है। विभिन्न रिपोर्टों के अनुसार, राष्ट्रपति ट्रंप ने मन बना लिया है कि अमेरिका ईरान की सड़कों पर उतरे उन प्रदर्शनकारियों की हर संभव मदद करेगा जो आजादी की मांग कर रहे हैं। हालांकि, यह मदद किस रूप में दी जाएगी, इसे लेकर ट्रंप प्रशासन के भीतर बैठकों का दौर जारी है। शनिवार को ट्रंप ने सोशल मीडिया पर लिखा कि ईरान की जनता आजादी की ओर देख रही है और अमेरिका उनकी पुकार सुनने के लिए तैयार है। इसके बाद से ही वाशिंगटन के गलियारों में हलचल तेज हो गई है। विकल्पों के तौर पर सीधे सैन्य हमले से लेकर साइबर अटैक, इंटरनेट ब्लैकआउट को तोड़ने के लिए एलन मस्क की स्टारलिंक सैटेलाइट सेवा और सुरक्षा एजेंसियों के नेताओं को निशाना बनाने जैसे सुझावों पर विचार किया जा रहा है। ट्रंप प्रशासन का मानना है कि पिछले एक हफ्ते में ईरानी शासन के भीतर ऐसी दरारें नजर आई हैं जो पिछले कई दशकों में नहीं देखी गई थीं। प्रदर्शनकारियों की भारी संख्या और सुरक्षा बलों द्वारा की गई हिंसक कार्रवाई, जिसमें 500 से ज्यादा लोगों की मौत की खबरें हैं, ने अमेरिका पर कार्रवाई के लिए दबाव बढ़ा दिया है। इसी बीच, सैन्य अधिकारियों ने ट्रंप के सामने वही तर्क रखे हैं जो इतिहास में सैम मानेकशॉ ने रखे थे। 1971 में जब पूर्वी पाकिस्तान में मानवीय संकट चरम पर था, तब इंदिरा गांधी चाहती थीं कि सेना तुरंत हमला करे। लेकिन मानेकशॉ ने स्पष्ट कर दिया था कि बिना पूरी तैयारी और सही समय के युद्ध में उतरना जोखिम भरा होगा। ठीक इसी तरह, अमेरिकी रक्षा अधिकारियों ने ट्रंप को आगाह किया है कि ईरान पर किसी भी तरह की सैन्य कार्रवाई से पहले अतिरिक्त समय और पुख्ता सुरक्षा व्यवस्था की जरूरत है। सैन्य कमांडरों का तर्क है कि अगर अमेरिकी ठिकानों को सुरक्षित किए बिना कोई हमला किया जाता है, तो ईरान की जवाबी कार्रवाई बहुत विनाशकारी हो सकती है। दूसरी ओर, इजरायल ने भी इस स्थिति पर अपनी उच्च स्तरीय बैठक की है। प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने फैसला किया है कि इजरायल फिलहाल सार्वजनिक तौर पर इस मामले में हस्तक्षेप नहीं करेगा और अमेरिका को कमान संभालने देगा। हालांकि, इजरायल ने अपनी मिसाइल डिफेंस प्रणाली को हाई अलर्ट पर रखा है क्योंकि उसे डर है कि ईरान अपनी जनता का ध्यान भटकाने के लिए बाहरी हमला कर सकता है। अमेरिका के भीतर भी इस पर दो फाड़ हैं। कुछ सांसदों को डर है कि सैन्य हस्तक्षेप से ईरानी जनता के मन में अमेरिका के प्रति गुस्सा भड़क सकता है और वे अपनी सरकार के साथ खड़े हो सकते हैं। वहीं, ईरान ने भी खुले तौर पर धमकी दी है कि किसी भी अमेरिकी हमले का जवाब वहां के सैन्य ठिकानों को तबाह करके दिया जाएगा। अब गेंद ट्रंप के पाले में है कि वे सैन्य सलाह मानकर रुकते हैं या तत्काल कार्रवाई का फैसला लेते हैं। वीरेंद्र/ईएमएस/12जनवरी2026