नई दिल्ली,(ईएमएस)। देश की राजनीति के लिहाज से साल 2026 बेहद अहम माना जा रहा है। यह साल जहां बीजेपी के लिए अपने राजनीतिक विस्तार और मौजूदा राज्यों में सत्ता बचाने की कसौटी बनने जा रहा, वहीं कांग्रेस के लिए दोबारा सियासी पटरी पर लौटने का बड़ा इम्तिहान होगा। इसके साथ ही वामदलों के सामने अपने आखिरी गढ़ को बचाने की चुनौती है और पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी के लिए भी सत्ता में बने रहना आसान नहीं होगा। साल 2026 में पश्चिम बंगाल, असम, तमिलनाडु, केरल और पुडुचेरी में विधानसभा चुनाव प्रस्तावित हैं। इसके अलावा महाराष्ट्र में बीएमसी समेत 29 महानगरपालिकाओं के चुनाव भी होने हैं। इन चुनावों के नतीजे न केवल राज्यों की राजनीति बल्कि राष्ट्रीय सियासी दिशा भी तय करेंगे। बीजेपी के नेतृत्व वाले एनडीए और कांग्रेस के अगुवाई वाले इंडिया ब्लॉक—दोनों के सामने अलग-अलग लेकिन गंभीर चुनौतियां हैं। बीजेपी के सामने असम में सत्ता बरकरार रखने के साथ-साथ दक्षिण भारत में अपनी पकड़ मजबूत करने की चुनौती है। असम में लगातार तीसरी बार जीत की उम्मीद लगाए बीजेपी को इस बार कांग्रेस के मजबूत होते संगठन से कड़ी टक्कर मिल सकती है। पुडुचेरी में भी गठबंधन सरकार को दोहराना आसान नहीं माना जा रहा। वहीं केरल और तमिलनाडु जैसे राज्यों में बीजेपी अब तक सीमित प्रभाव ही छोड़ पाई है। पश्चिम बंगाल में तमाम प्रयासों के बावजूद पार्टी अभी भी दूसरे नंबर पर है और ममता बनर्जी की मजबूत पकड़ उसके लिए बड़ी बाधा बनी हुई है। कांग्रेस के लिए डगर है कठिन कांग्रेस के लिए 2026 और भी कठिन माना जा रहा है। जिन पांच राज्यों में चुनाव होने हैं, उनमें कांग्रेस सिर्फ तमिलनाडु में सत्ता गठबंधन का हिस्सा है। असम और केरल में उसे वापसी की उम्मीद है, लेकिन आंतरिक गुटबाजी और नेतृत्व को लेकर असमंजस उसकी राह कठिन बना रहा है। केरल में कांग्रेस नीत यूडीएफ और वामपंथी एलडीएफ के बीच सीधा मुकाबला होगा, जहां लेफ्ट पूरी ताकत झोंकने की तैयारी में है। वामदलों के लिए अस्तित्व की लड़ाई वामदलों के लिए 2026 अस्तित्व की लड़ाई जैसा है। बंगाल और त्रिपुरा में सत्ता गंवाने के बाद अब केवल केरल ही उनका आखिरी मजबूत किला बचा है। यदि यहां भी हार मिली तो राष्ट्रीय राजनीति में उनकी भूमिका और सिमट सकती है। वहीं पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी को सत्ता विरोधी माहौल, बीजेपी के आक्रामक अभियान और कांग्रेस-लेफ्ट की चुनौती से जूझना होगा। तमिलनाडु में डीएमके की स्थिति मजबूत दिखती है, लेकिन सत्ता विरोधी रुझान और विपक्षी गठजोड़ उसे सतर्क रहने को मजबूर कर रहे हैं। कुल मिलाकर 2026 का चुनावी साल हर बड़े दल के लिए निर्णायक साबित हो सकता है। अब देखना यह होगा कि कौन अपनी चुनौतियों पर खरा उतरता है और किसकी सियासी गाड़ी पटरी से उतरती है। हिदायत/ईएमएस 13जनवरी26