हाल ही में एक हिंदी न्यूज़ एजेंसी के हवाले से एक प्रतिष्ठित हिंदी दैनिक में यह खबर आई है कि (पर्यावरणीय संस्था ऑक्सफैम की नई रिपोर्ट के अनुसार) दुनिया के सबसे अमीर एक फीसदी लोगों ने 2026 के पहले 10 दिनों में ही अपने हिस्से का पूरे साल का कार्बन बजट खर्च कर दिया। वास्तव में यह बहुत ही संवेदनशील और चिंताजनक बात है। चिंताजनक इसलिए क्यों कि कार्बन बजट खर्च करने का सीधा सा मतलब यह है कि हम कहीं न कहीं पृथ्वी के भविष्य को जोखिम में डाल रहे हैं। यहां पाठकों को बताता चलूं कि कार्बन बजट वह अधिकतम मात्रा है, जितनी कार्बन डाइऑक्साइड मानवता वातावरण में छोड़ सकती है, ताकि वैश्विक तापमान वृद्धि को 1.5 डिग्री सेल्सियस या 2 डिग्री सेल्सियस की सीमा में रखा जा सके। यदि यह कार्बन बजट पूरी तरह खर्च हो जाता है, तो इसके गंभीर परिणाम होंगे।मसलन, इससे धरती के तापमान में तेज़ बढ़ोतरी होगी। दूसरे शब्दों में कहें तो कार्बन बजट खर्च करने से पृथ्वी का औसत तापमान तय सीमा से ऊपर चला जाएगा, जिससे जलवायु असंतुलन बढ़ेगा। इससे अत्यधिक मौसमीय घटनाएँ होंगी। मसलन, धरती पर भीषण गर्मी और हीटवेव, अनियमित व अत्यधिक वर्षा के साथ ही साथ बाढ़, सूखा और चक्रवातों की तीव्रता में भी अभूतपूर्व वृद्धि होगी।हिमनद और ध्रुवीय बर्फ पिघलने से समुद्र स्तर बढ़ेगा, तथा इसके परिणामस्वरूप विभिन्न तटीय शहरों और द्वीपीय देशों पर अस्तित्व का संकट आएगा। इससे धरती पर कृषि और खाद्य सुरक्षा पर भी संकट खड़ा हो जाएगा। वास्तव में इससे विभिन्न फसलों की उत्पादकता घटेगी, धरती पर पानी की कमी बढ़ेगी और खाद्य संकट गहराएगा।जैव-विविधता को गहरा नुकसान पहुंचेगा तथा कई प्रजातियाँ विलुप्त होंगी और जब ऐसा होगा तो इससे धरती का पारिस्थितिक संतुलन बिगड़ जाएगा।मानव स्वास्थ्य पर भी इसका(बजट खर्च का) प्रभाव पड़ेगा और गर्मी से मृत्यु दर में वृद्धि, नई बीमारियों का प्रसार तथा धरती पर स्वच्छ जल और हवा की कमी हो जाएगी। यह सब होने से आर्थिक व सामाजिक अस्थिरता पर बहुत गहरा प्रभाव पड़ेगा।दरअसल, प्राकृतिक आपदाओं से आर्थिक नुकसान होगा, और परिणामस्वरूप पलायन और सामाजिक तनाव बढ़ेंगे। निष्कर्ष यह है कि यदि कार्बन बजट समय रहते नियंत्रित नहीं किया गया, तो जलवायु परिवर्तन अपरिवर्तनीय स्तर तक पहुँच सकता है। इसलिए नवीकरणीय ऊर्जा, ऊर्जा दक्षता, हरित परिवहन और टिकाऊ जीवनशैली अपनाना अत्यंत आवश्यक है। बहरहाल, यहां पाठकों को बताता चलूं कि संस्था ने 10 जनवरी को प्रदूषक दिवस के तौर पर माना है। यह वह दिन है, जब अमीरों का कार्बन उत्सर्जन उस सीमा को पार कर गया, जिसे ग्लोबल वार्मिंग को 1.5 डिग्री सेल्सियस तक सीमित रखने के लिए पूरे साल भर के लिए निर्धारित किया गया था। गौरतलब है कि हाल ही में ऑक्सफैम ने यह रिपोर्ट क्लाइमेट प्लंडरः हाउ अ पावरफुल फ्यू आर लॉकिंग द वर्ल्ड इन डिजास्टर नाम से जारी की है। वास्तव में, इस रिपोर्ट में यह बात कही गई है कि दुनिया के सबसे अमीर 0.1% लोगों ने तो साल के शुरुआती 3 दिनों में ही अपना कोटा खत्म कर दिया। दरअसल, 0.1% श्रेणी का एक व्यक्ति एक दिन में औसतन 800 किलोग्राम कार्बन डाई ऑक्साइड उत्सर्जित करता है, जबकि एक गरीब व्यक्ति दिनभर में मात्र 2 किलोग्राम कार्बन पैदा करता है। ऑक्सफैम ने सरकारों से मांग की है कि निजी जेट, सुपर यॉट और प्रदूषण फैलाने वाले उद्योगों में निवेश पर भारी टैक्स लगाया जाए। वहीं 1.5 डिग्री के लक्ष्य को बचाने के लिए सबसे अमीर 1% को 2030 तक अपने उत्सर्जन में 97% की कटौती करनी होगी। दूसरे शब्दों में कहें तो आज दुनिया के सबसे अमीर लोग धरती के संसाधनों और कार्बन बजट को बेहद असमान रूप से खर्च कर रहे हैं। जहां अमीरों का छोटा-सा वर्ग कुछ ही दिनों में पूरे साल जितना प्रदूषण फैला देता है, वहीं गरीब व्यक्ति का योगदान इसमें नगण्य होता है। अगर जलवायु संकट को 1.5 डिग्री सेल्सियस की सीमा में रोकना है, तो सबसे अधिक प्रदूषण करने वालों खासतौर पर शीर्ष 1% लोगों को अपनी जीवनशैली और निवेश दोनों में भारी कटौती करनी होगी, और सरकारों को उनके अत्यधिक प्रदूषण पर कड़ा कर लगाना होगा।अब यहां प्रश्न यह उठता है कि आखिर अमीर लोग किस प्रकार से कार्बन उत्सर्जन में अधिक योगदान देते हैं ? तो इस प्रश्न का सीधा सा उत्तर यह है कि अमीर लोग आम लोगों की तुलना में जीवनशैली और उपभोग के स्तर के कारण कई तरीकों से अधिक कार्बन उत्सर्जन करते हैं। मुख्य कारणों और तरीकों में क्रमशः लग्ज़री यात्रा और परिवहन,बड़े और ऊर्जा-खपत वाले घर,अत्यधिक उपभोग और विलासिता,मांसाहार और लग्ज़री भोजन,निवेश और उद्योगों में भागीदारी,निजी सेवाएं और स्टाफ आदि को शामिल किया जा सकता है। दरअसल,अमीर लोग निजी जेट और चार्टर्ड विमान का अधिक उपयोग करते हैं। गौरतलब है कि एक घंटे की उड़ान में ही हजारों किलोग्राम कार्बन-डाई-ऑक्साइड का उत्सर्जन हो जाता है। न केवल निजी जेट और चार्टर्ड विमान बल्कि अमीर लोग लग्ज़री कारों, एसयूवीज और सुपरकार का भी अपने दैनिक जीवन में अधिक उपयोग करते हैं जो अधिक ईंधन खपत और उच्च उत्सर्जन के लिए जिम्मेदार हैं।क्रूज़ शिप और यॉट अन्य साधन हैं । पाठकों को बताता चलूं कि एक यॉट प्रतिदिन सैकड़ों लोगों जितना प्रदूषण करता है। अमीरों के पास विशाल एसी युक्त कोठियां, स्विमिंग पूल, निजी थिएटर होते हैं और हीटिंग, कूलिंग, लिफ्ट, गार्डन लाइटिंग से भारी ऊर्जा उपयोग होता है। उनके पास कई शहरों/देशों में एक से अधिक घर होते हैं,जो उच्च कार्बन-डाई-ऑक्साइड उत्सर्जन के लिए जिम्मेदार हैं। इसके अलावा,महंगे फैशन ब्रांड, फास्ट फैशन, बार-बार खरीदारी, इलेक्ट्रॉनिक गैजेट्स का तेज़ी से बदलना तथा विलासितापूर्ण जीवनशैली से जुड़े संसाधनों का अधिक दोहन अन्य कुछ कारण हैं।बीफ, डेयरी और आयातित भोजन का अधिक सेवन तथा एयरफ्रेट से लाया गया भोजन (फूड माइल्स) भी धरती पर कार्बन फुटप्रिंट में इजाफा करता है।अमीर लोग कोयला, तेल, गैस, सीमेंट, स्टील जैसे प्रदूषणकारी उद्योगों में निवेश करते हैं। भले ही अमीर व्यक्ति स्वयं कम उपभोग करे, पर उसके निवेश से उत्सर्जन बढ़ता है। इतना ही नहीं,अमीर लोगों के ड्राइवर, सुरक्षा, घरेलू कर्मचारी-लगातार परिवहन और ऊर्जा उपयोग करते हैं,जो कार्बन फुटप्रिंट के लिए कहीं न कहीं जिम्मेदार हैं। अंत: निष्कर्ष के तौर पर यहां यह बात कही जा सकती है कि अमीर लोग सीधे (यात्रा, घर, भोजन) और अप्रत्यक्ष रूप से (निवेश, उद्योग) दोनों तरीकों से अधिक कार्बन उत्सर्जन करते हैं। यही कारण है कि दुनिया के सबसे अमीर 1% या 0.1% लोगों का कार्बन फुटप्रिंट करोड़ों गरीब लोगों के बराबर होता है। हाल फिलहाल, पाठकों को बताता चलूं कि कार्बन उत्सर्जन करने वाले सबसे अमीर 1% लोगों में से लगभग एक-तिहाई के लिए अकेले अमेरिका जिम्मेदार हैं। इसके बाद चीन का नंबर आता है, जो सालाना प्रति व्यक्ति लगभग 30 टन उत्सर्जित करते हैं। यहां यह उल्लेखनीय है कि पिछले एक दशक में इसमें 30% की भारी वृद्धि हुई है। वहीं यूरोपीय संघ देशों में ब्रिटेन, जर्मनी, इटली, फ्रांस, भी स्पेन और स्वीडन के अमीर जिम्मेदार हैं। हालांकि, इनकी संख्या अन्य देशों के मुकाबले कम है। हाल ही में जो रिपोर्ट सामने आई है, उस रिपोर्ट के अनुसार, भारत में अरबपतियों की संख्या दुनिया में तीसरी सबसे ज्यादा है, लेकिन यहां के सबसे अमीर 10% लोग औसतन प्रति व्यक्ति केवल 7 टन कार्बन उत्सर्जित करते हैं। यह अमेरिका या चीन के अमीरों की तुलना में कम है। हाल फिलहाल, यदि हम यहां पर भारत पर असर की बात करें तो इस उत्सर्जन का सबसे बुरा प्रभाव उन लोगों पर पड़ेगा, जिन्होंने जलवायु संकट में सबसे कम योगदान दिया है। भारत उन देशों में शामिल है, जिन्हें 2050 तक जलवायु संकट से 44 खरब डॉलर के वैश्विक नुकसान का हिस्सा सहना पड़ सकता है। इस अत्यधिक उत्सर्जन से सदी के अंत तक गर्मी से संबंधित 13 लाख अतिरिक्त मौतें होने की आशंका है। ऑक्सफैम की रिपोर्ट के अनुसार दुनिया के सबसे अमीर 0.1 प्रतिशत लोगों ने वर्ष के केवल शुरुआती तीन दिनों में ही अपना वार्षिक कार्बन बजट समाप्त कर दिया। कार्बन बजट वह अधिकतम सीमा है, जिसके भीतर रहकर वैश्विक तापमान वृद्धि को 1.5 डिग्री सेल्सियस तक सीमित रखा जा सकता है। रिपोर्ट बताती है कि अमीर वर्ग की अत्यधिक खपत, निजी जेट, सुपर यॉट और प्रदूषणकारी उद्योगों में निवेश के कारण 10 जनवरी तक ही कार्बन उत्सर्जन का वह लक्ष्य खत्म हो गया, जो पूरे वर्ष के लिए निर्धारित था, जबकि एक गरीब व्यक्ति प्रतिदिन औसतन केवल 2 किलोग्राम कार्बन उत्सर्जित करता है, वहीं सबसे अमीर 0.1 प्रतिशत लोग एक दिन में करीब 800 किलोग्राम कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन करते हैं। इसी गहरी असमानता को जलवायु संकट का मूल कारण बताते हुए ऑक्सफैम ने मांग की है कि अमीरों की प्रदूषणकारी जीवनशैली और उद्योगों पर भारी कर लगाया जाए, ताकि उस धन का उपयोग जलवायु संरक्षण और कमजोर वर्गों की मदद में किया जा सके। अंत में यही कहूंगा कि अमीरों की प्रदूषणकारी जीवनशैली और बड़े उद्योगों पर अंकुश लगाने के लिए सख्त और न्यायसंगत नीतियाँ आवश्यक हैं। इसके तहत निजी जेट, लग्ज़री वाहन, अत्यधिक ऊर्जा खपत वाले भवनों पर प्रगतिशील कार्बन टैक्स लगाया जाना चाहिए, ताकि अनावश्यक उपभोग हतोत्साहित हो। साथ ही, प्रदूषण फैलाने वाले उद्योगों के लिए कड़े उत्सर्जन मानक, नियमित निगरानी और भारी जुर्माने की व्यवस्था होनी चाहिए। नवीकरणीय ऊर्जा के उपयोग को उद्योगों और उच्च आय वर्ग के लिए अनिवार्य बनाकर, हरित निवेश को बढ़ावा दिया जा सकता है। इसके अलावा, कंपनियों और अमीर वर्ग की कार्बन फुटप्रिंट रिपोर्ट को सार्वजनिक करने से पारदर्शिता और जवाबदेही बढ़ेगी। इस प्रकार सख्त कानून, प्रभावी क्रियान्वयन और स्वच्छ विकल्पों को प्रोत्साहन देकर पर्यावरण संरक्षण को मजबूत किया जा सकता है। (फ्रीलांस राइटर, कॉलमिस्ट व युवा साहित्यकार) (यह लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं इससे संपादक का सहमत होना अनिवार्य नहीं है) .../ 14 जनवरी /2026