रमजान के पवित्र महीने में जिस तरह से अमेरिका और इजरायल ने मिलकर ईरान के ऊपर हमला किया इस हमले में सेकड़ो बच्चियों की मौत हो गई, ईरान के सुप्रीमो अयातुल्लाह खामेनेई सहित प्रथम पंक्ति के सैकड़ों नेताओं को मारकर जिस तरह से ईरान में तख्ता पलट कराने का जो प्रयास था वह पूरी तरह से विफल हो गया है। ईरान में मोसाद की उपस्थिति ने ईरान के नेताओं को मौत के घाट जरूर उतारा है, लेकिन इसकी प्रतिक्रिया अब दूसरे रूप में देखने को मिल रही है। ईरान में लोग एकजुट होकर इसका विरोध कर रहे हैं। पहली बार यह समझ आ रहा है, ईरान ने अपनी क्रीमी लेयर की जो सुरक्षा व्यवस्था और प्रशासनिक व्यवस्था तैयार की थी इतनी बड़ी संख्या में महत्वपूर्ण व्यक्तियों की मौत हो जाने के बाद भी ईरान कहीं से भी कमजोर नहीं पड़ा है। उल्टे उसके ड्रोन और मिसाइलों ने जिस तरह से अमेरिका और इजरायल के सुरक्षा तंत्र को नुकसान पहुंचाया है इसकी कल्पना अमेरिका और इजरायल ने कभी नहीं की थी। ड्रोन और ईरान के मिसाइल इतने बड़े पैमाने पर नुकसान पहुंचा सकते हैं या इतनी बड़ी संख्या में ईरान के पास सैन्य हथियार तकनीकी के साथ उपलब्ध हो सकते हैं इसकी जरा भी जानकारी अमेरिका और इजरायल को होती तो वह ईरान के साथ इस तरह का पंगा नहीं लेते। ईरान ने प्रतिक्रिया स्वरूप पश्चिम एशिया के जिन देशों में अमेरिका के सैन्य अड्डे थे उन्हें नष्ट करने में सफलता हासिल की है। जहां-जहां अमेरिकी सैनिक और दूतावास से उनको नष्ट किया है जिसके कारण अमेरिका को अपने सभी दूतावास बंद करने पड़े। अमेरिकी नौसेना भी कोई कमाल नहीं दिखा सकी उल्टे उनके बड़े-बड़े जहाज पीछे हटने को विवश हुए। अब एक और सबसे बड़ी गलती अमेरिका और इजरायल ने की है। उसने ईरान के गैस एवं पेट्रोल के ठिकानों पर हमला किया है, जिसका जवाब अब ईरान ने देना शुरू कर दिया है। जिसके कारण यह युद्ध अब एक ऐसी दशा में बदल रहा है जिसकी आग में सारी दुनिया के देशों को झुलसना पड़ सकता है। अमेरिका के मित्र देश और नाटो संगठन ने इस युद्ध में उतरने से साफ इनकार कर दिया है। रूस, चीन और उत्तर कोरिया खुलकर ईरान के समर्थन में आकर खड़े हो गए हैं। ईरान अभी तक इस युद्ध में नैतिकता के साथ लड़ाई लड़ रहा था लेकिन अब इस लड़ाई में ईरान भी अपनी नैतिकता छोड़कर अब युद्ध जीतने की लड़ाई लड़ेगा, जिसके कारण यह युद्ध किस रूप में और कहां तक जाएगा इसको लेकर अब तरह-तरह की आशंकाएं सामने आने लगी हैं। दुनिया के सभी देश अपने-अपने क्षेत्रीय हितों को ध्यान में रखते हुए इस युद्ध से दूर रहते हुए अपनी कूटनीतिक संबंधों को बढ़ाने की दिशा में काम कर रहे हैं। अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने टैरिफ को लेकर सारी दुनिया के देशों को अपने विरोध में खड़ा कर लिया है। जिस तरह से अमेरिका अपना साम्राज्यवाद सारी दुनिया में स्थापित करने का प्रयास कर रहा था उसकी सारी दुनिया के देश विरोध कर रहे हैं। डोनाल्ड ट्रंप बेहतर राजनेता साबित नहीं हो रहे हैं। उनकी इमेज सारी दुनिया में एक गुंडे के रूप में बन गई है, जिसका खामियाजा अब अमेरिका को भुगतना पड़ेगा। इससे इनकार नहीं किया जा सकता है। इस युद्ध में अमेरिका को जहां आर्थिक रूप से भारी नुकसान हुआ है वहीं सारी दुनिया के देशों से जो संबंध खराब हुए हैं, अमेरिका की विश्वसनीयता खत्म हुई है, उसके दूरगामी परिणाम जल्द ही अमेरिका को भोगने पड सकते हैं। अमेरिका में तो यह चर्चा चल पड़ी है जिस तरह से एपस्टीन फाइल में उनका नाम आ रहा है। जिस तरीके से वह निर्णय ले रहे हैं इतना बड़ा युद्ध उन्होंने बिना कांग्रेस की अनुमति से छेड़ दिया। इसका खामियाजा सबसे पहले डोनाल्ड ट्रंप को ही भुगतना पड़ेगा। इस युद्ध में अमेरिका-इजरायल और ईरान तीनों ही बेलगाम हो चुके हैं। इस युद्ध के परिणाम क्या होंगे इसको लेकर कुछ भी कहना आज की तारीख में बहुत मुश्किल है। ऊर्जा संकट में सारी दुनिया को बड़े संकट में डाल दिया है वहीं आर्थिक मंदी की आशंका से पूरी दुनिया भयाक्रांत है। ईएमएस / 19 मार्च 26