लेख
15-Jan-2026
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- यूरोपीय देशों में निराशा, बेरोजगारी और महंगाई अमेरिका लंबे समय से स्वयं को दुनिया के सबसे मजबूत आर्थिक एवं लोकतांत्रिक देश के रूप में प्रस्तुत करता रहा है। डोनाल्ड ट्रंप के दूसरी बार अमेरिका के राष्ट्रपति बनने के बाद से उनकी छवि पर गंभीर सवाल सारी दुनिया में खड़े हो गए हैं। ट्रंप ने न सिर्फ अमेरिका की वरन अंतरराष्ट्रीय संस्थागत मर्यादाओं को चुनौती देने का काम किया है। अमेरिका की चुनावी प्रक्रिया, न्यायपालिका, मीडिया और लोकतांत्रिक परंपराओं, वैश्विक व्यापार संधि और वैश्विक संस्थाओं पर सीधा हमला किया है । 2020 का राष्ट्रपति चुनाव हारने के बाद अब वह एक तानाशाह की तरह व्यवहार कर रहे हैं। 6 जनवरी 2021 को कैपिटल हिल पर हुआ हमला इस बात का प्रमाण है। ट्रंप की सत्ता की लालसा उन्हें किस हद तक ले जाकर लोकतंत्र को कमजोर करने का काम कर रही है। उक्त घटना केवल अमेरिका की आंतरिक समस्या नहीं थी। वैश्विक लोकतांत्रिक मूल्यों के लिए भी यह एक चेतावनी थी। ट्रंप की राजनीति ने अमेरिकी समाज को गहरे अंधेरे में धकेल दिया है। नस्ल, धर्म, प्रवासियों और राष्ट्रवाद के मुद्दों पर उग्र बयानबाजी ने ट्रंप और अमेरिका की असहिष्णुता को बढ़ावा दिया है। अमेरिका फर्स्ट की नीति ने अंतरराष्ट्रीय सहयोग और व्यापार को लेकर अमेरिका को सारी दुनिया में कमजोर करने का काम किया है। बहुपक्षीय और अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं पर अमेरिका की विश्वसनीयता लगभग खत्म हो गई है। जब दुनिया का सबसे शक्तिशाली देश ही लोकतांत्रिक मूल्यों को मानने से इंकार करे, तो उसका असर स्वाभाविक रूप से दुनिया के अन्य देशों पर भी पड़ता है। अब इसका प्रभाव यूरोप में भी नजर आने लगा है। कई यूरोपीय देशों में दक्षिणपंथी और राष्ट्रवादी ताकतें मजबूत होना शुरू हो गई हैं। जिसके कारण लोकतंत्र और मानव अधिकार को लेकर भरोसा कमजोर हो रहा है। युवा पीढ़ी भविष्य को लेकर गहरी निराशा में है। बेरोजगारी, महंगाई और आर्थिक असमानता ने युवाओं को असुरक्षा की भावना से भर दिया है। कोविड महामारी, रूस-यूक्रेन युद्ध, ऊर्जा संकट ने यूरोप की अर्थव्यवस्था को झकझोर दिया है। इस कारण जीवन-यापन की मुश्किलें बढ़ती चली जा रही हैं। रोजगार के अवसर भी बड़ी तेजी के साथ कम होते जा रहे हैं। यूरोप के युवा सवाल पूछ रहे हैं, क्या लोकतांत्रिक सरकारें उनकी समस्याओं का समाधान कर पाएंगी? आज विश्व के 60 से ज्यादा देशों में अपनी ही सरकार के खिलाफ लोग उग्र प्रदर्शन कर रहे हैं। सरकारें महंगाई रोकने, स्थायी रोजगार देने और सामाजिक सुरक्षा सुनिश्चित करने में असफल साबित हो रही हैं। ऐसी स्थिति में कट्टरपंथी विचार धाराओं का तेजी से विस्तार हो रहा है। यही स्थिति अमेरिका में भी देखी जा रही है। आर्थिक असुरक्षा और असंतोष को ट्रंप राजनीतिक ताकत से दबाने की कोशिश कर रहे हैं। वर्तमान में आवश्यकता है, अमेरिका और यूरोप जैसे देश अपने लोकतांत्रिक संस्थानों को मजबूत करें। आम जनता के प्रति पारदर्शिता और जवाबदेही बढ़ाएं। आम लोगों की तथा युवाओं की आर्थिक चिंताओं को प्राथमिकता देकर उनका निराकरण करें। लोकतंत्र केवल चुनाव जीतने का माध्यम नहीं है। नागरिकों को सम्मान, सुरक्षा और भविष्य की उम्मीद की व्यवस्था लोकतांत्रिक शासन प्रणाली है। यदि यह भरोसा टूटता है, तो खतरे में सिर्फ अमेरिका नहीं, बल्कि पूरी वैश्विक लोकतांत्रिक व्यवस्था खतरे में पड़ सकती है। 1995 में आर्थिक व्यापार संधि के बाद वैश्विक स्तर पर दुनिया के सारे देश एक दूसरे के बहुत करीब आए थे। पूरी सोच बदल गई थी। पिछले दो दशक में दुनिया के सभी देशों में कर्ज को लेकर आर्थिक ज़रूरतें पूरी करने की जो मुहिम चल रही थी वह अब कर्ज के बोझ से बुरी तरह से दब चुकी है। सारी दुनिया में आर्थिक मंदी का खतरा बड़ी तेजी के साथ फैलता हुआ नजर आ रहा है। ऐसी स्थिति में अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप जिस तरह से अमेरिका फर्स्ट और अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं की उपेक्षा करते हुए मनमानी कर रहे हैं, सारी दुनिया के देशों को टैरिफ के भय तथा अमेरिका की ताकत के आगे झुकाने का प्रयास कर रहे हैं। इसका खामीयाजा अमेरिका को भुगतना पड़ सकता है। यही गलती एक समय पर सोवियत रूस ने की थी। वही गलती अब अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप करते हुए दिख रहे हैं। ईएमएस/15 जनवरी2026