राष्ट्रीय
15-Jan-2026


* कोविड-19 जैसे खतरनाक वायरस से सबक लेकर, भविष्य की महामारियों से निपटने के लिए गुजरात में अत्याधुनिक बायो-कंटेनमेंट सुविधा का निर्माण अहमदाबाद (ईएमएस)| पिछले कुछ वर्षों में दुनिया ने पशुओं से मनुष्यों में फैलने वाली अनेक संक्रामक बीमारियों का सामना किया है। कोविड-19 महामारी इसका सबसे बड़ा उदाहरण रही। कोरोना काल के दौरान देशभर से आए नमूनों की जांच के लिए भारत की एकमात्र बीएसएल-4 प्रयोगशाला, पुणे स्थित नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ वायरोलॉजी (एनआईवी) पर निर्भर रहना पड़ा था। कोविड-19 महामारी ने यह स्पष्ट कर दिया कि ऐसे खतरनाक रोगजनक सूक्ष्मजीवों को समझने और उन पर शोध के लिए देश में उच्च स्तरीय बायो-सेफ्टी कंटेनमेंट सुविधाओं की अत्यंत आवश्यकता है, जिनके लिए न तो कोई वैक्सीन उपलब्ध होती है और न ही सुनिश्चित उपचार। कोविड-19 के अलावा गुजरात में हाल के वर्षों में चांदीपुरा वायरस (मनुष्यों में) और लम्पी स्किन डिज़ीज़ वायरस (पशुओं में) जैसे मामलों ने चिंता बढ़ाई है। इन रोगों के अध्ययन और नियंत्रण के लिए बायो-सेफ्टी लेवल-3 (बीएसएल-3) या उससे उच्च स्तरीय प्रयोगशालाओं की आवश्यकता होती है। क्रिमियन-कांगो हैमरेजिक फीवर (सीसीएचएफ), लम्पी, चांदीपुरा और निपाह जैसे अत्यंत घातक वायरसों के खतरे को देखते हुए देश में उन्नत प्रयोगशालाओं की आवश्यकता और भी गंभीर हो गई है। इसी दिशा में गुजरात ने अग्रणी भूमिका निभाते हुए देश की दूसरी और राज्य की पहली BSL-4 सुविधा के निर्माण की ओर तेज़ी से कदम बढ़ाए हैं। गुजरात में पहली बार अत्याधुनिक बायो-कंटेनमेंट सुविधा के अंतर्गत एनिमल बायो-सेफ्टी लेवल (एबीएसएल) और बायो-सेफ्टी लेवल-4 (बीएसएल-4) प्रयोगशालाओं का निर्माण किया जा रहा है। बीएसएल-4 क्या है? बायो-सेफ्टी लेवल-4 (बीएसएल-4) जैविक सुरक्षा का सर्वोच्च स्तर है। इस प्रयोगशाला में ऐसे अत्यधिक संक्रामक और जानलेवा वायरस या बैक्टीरिया पर काम किया जाता है, जो हवा के माध्यम से आसानी से फैल सकते हैं और जिनके लिए कोई वैक्सीन या निश्चित इलाज उपलब्ध नहीं होता। गुजरात में बीएसएल-4 लैब गांधीनगर के सेक्टर-28 में, एनिमल वैक्सीन इंस्टीट्यूट के समीप, 14.21 एकड़ भूमि पर गुजरात सरकार के अधीन गुजरात बायोटेक्नोलॉजी रिसर्च सेंटर (जीबीआरसी) द्वारा इस अत्याधुनिक प्रयोगशाला का विकास किया जा रहा है। इस परियोजना के अंतर्गत 271.90 वर्ग मीटर में बीएसएल-4 और एबीएसएल-4 प्रयोगशालाएं, 304.63 वर्ग मीटर में बीएसएल-3 और बीएसएल-3 आईएसओ-7 प्रयोगशालाएं, 407.91 वर्ग मीटर में एबीएसएल-3, 898.19 वर्ग मीटर में बीएसएल-2 और बीएसएल-2 आईएसओ-7 प्रयोगशालाएं, साथ ही इफ्लुएंट डी-कंटैमिनेशन सिस्टम और अन्य सहायक सुविधाओं का निर्माण किया जाएगा। लैब की प्रमुख विशेषताएं बीएसएल-4 प्रयोगशाला में सुरक्षा के कई स्तर होते हैं। पूर्णतः एयर-टाइट सिस्टम: प्रयोगशाला से बाहर जाने वाली हवा एचईपीए फिल्टरों से गुजरती है, जिससे वायरस बाहर न फैल सके। पॉजिटिव प्रेशर सूट: वैज्ञानिक विशेष ‘स्पेस सूट’ जैसे परिधान पहनकर काम करते हैं, जिनमें अलग से ऑक्सीजन की आपूर्ति होती है। डी-कंटैमिनेशन शावर: प्रवेश और निकास के समय वैज्ञानिकों को रासायनिक शावर से गुजरना अनिवार्य होता है। कचरा निष्क्रियकरण प्रणाली: तरल कचरे को इफ्लुएंट डी-कंटैमिनेशन सिस्टम (ईडीएस) द्वारा उच्च तापमान पर निष्क्रिय किया जाता है, जबकि ठोस कचरे को डबल-डोर ऑटोक्लेव मशीन में भाप और दबाव से पूरी तरह सुरक्षित किया जाता है। भविष्य के लिए बड़ी उपलब्धि इस प्रयोगशाला में वायरस का आइसोलेशन, सीक्वेंसिंग, परीक्षण और वैक्सीन स्तर तक अनुसंधान किया जाएगा। इसके चालू होने से तेज़ और सटीक निदान संभव होगा। किसी नए वायरस के प्रकोप के समय नमूनों को पुणे भेजने के बजाय गुजरात में ही त्वरित जांच की जा सकेगी। नई वैक्सीन और एंटी-वायरल दवाओं के विकास में यह लैब एक मजबूत आधार बनेगी। साथ ही पशुओं से मनुष्यों में फैलने वाले ज़ूनोटिक रोगों पर प्रभावी निगरानी रखी जा सकेगी। बीएसएल-4 सुविधा के साथ गुजरात न केवल भारत में बल्कि वैश्विक स्तर पर बायो-मेडिकल रिसर्च का एक प्रमुख केंद्र बनने की ओर अग्रसर होगा। भविष्य की महामारियों से लड़ने में यह प्रयोगशाला देश के लिए एक सशक्त हथियार सिद्ध होगी। साथ ही, जैव-आतंकवाद जैसी गंभीर चुनौतियों से निपटने में भी यह भारत की बायो-सिक्योरिटी को मज़बूती प्रदान करेगी। सतीश/15 जनवरी