पिछले सत्रह से अठारह दिनों से ईरान की सड़कों पर जो दृश्य दिखाई दे रहे हैं, वे केवल किसी एक देश की आंतरिक अशांति की कहानी नहीं हैं बल्कि मध्य एशिया की राजनीति अर्थव्यवस्था और वैश्विक शक्ति संतुलन को झकझोर देने वाली घटना के संकेत भी हैं। राजधानी तेहरान से शुरू हुआ महंगाई विरोधी आंदोलन आज हिंसक विद्रोह का रूप ले चुका है। सरकारी इमारतें जल रही हैं बाजार बंद हैं इंटरनेट और फोन सेवाएं ठप हैं और अस्पतालों के बाहर शवों की कतारें उस मानवीय त्रासदी की गवाही दे रही हैं जिसे दुनिया दूर बैठकर देख रही है। अंतरराष्ट्रीय मीडिया के अनुसार हालात इतने भयावह हैं कि लोग अस्पतालों के बाहर अपने परिजनों की लाशें तलाश रहे हैं। रॉयटर्स के मुताबिक अब तक दो हजार से अधिक लोगों की मौत हो चुकी है जबकि ईरान इंटरनेशनल जैसी वेबसाइटें यह संख्या बारह हजार तक बता रही हैं। मौतों के आंकड़ों में भारी अंतर इस बात का प्रमाण है कि ईरान में सूचना पर कितना कड़ा नियंत्रण है और सच्चाई तक पहुंचना कितना कठिन हो गया है। ईरान में विरोध प्रदर्शन का तात्कालिक कारण महंगाई और आर्थिक बदहाली है लेकिन इसके पीछे वर्षों से जमा होता असंतोष साफ दिखाई देता है। तेल और प्राकृतिक गैस से समृद्ध यह देश लंबे समय से अमेरिकी प्रतिबंधों के कारण आर्थिक दबाव में है। रियाल की कीमत लगभग शून्य के बराबर पहुंच जाना आम नागरिक की जिंदगी को नरक बना चुका है। रोजमर्रा की जरूरतों की चीजें आम आदमी की पहुंच से बाहर हो चुकी हैं। बेरोजगारी बढ़ रही है युवाओं के सामने भविष्य का कोई स्पष्ट रास्ता नहीं दिख रहा। ऐसे में जब राजधानी तेहरान के ग्रैंड बाजार से व्यापारियों ने हड़ताल शुरू की तो यह चिंगारी कुछ ही दिनों में पूरे देश में फैल गई। देखते ही देखते छात्र आंदोलन से जुड़े विश्वविद्यालयों के परिसर उबलने लगे और फिर यह असंतोष सड़कों पर उतर आया। ईरान का इतिहास बताता है कि यह देश आंदोलनों और क्रांतियों से अछूता नहीं रहा है। फारस के नाम से पहचाना जाने वाला यह क्षेत्र प्राचीन काल से ही सत्ता और संस्कृति का केंद्र रहा है। साइरस महान से लेकर सिकंदर के आक्रमण और फिर सासानी और पहलवी शासनों तक ईरान ने कई उतार चढ़ाव देखे हैं। 1953 के तख्तापलट और 1979 की इस्लामी क्रांति ने इस देश की राजनीति को पूरी तरह बदल दिया। इस्लामी गणराज्य की स्थापना के बाद सत्ता का केंद्र सुप्रीम लीडर के हाथों में सिमट गया। अयातुल्ला खामेनेई पिछले कई दशकों से ईरान की राजनीति के सबसे ताकतवर चेहरे रहे हैं। लेकिन आज उन्हीं के खिलाफ सड़कों पर नारे लग रहे हैं और उनकी सत्ता को खुली चुनौती दी जा रही है। सरकार का रुख इस आंदोलन के प्रति बेहद सख्त रहा है। सुप्रीम लीडर ने प्रदर्शनकारियों को दंगाई करार देते हुए कठोर कार्रवाई की चेतावनी दी। सुरक्षाबलों और प्रदर्शनकारियों के बीच झड़पों में हिंसा लगातार बढ़ती गई। पुलिस थानों पर हमले हुए सुरक्षा अधिकारियों की हत्याएं हुईं और जवाब में सेना तथा रिवोल्यूशनरी गार्ड्स को मैदान में उतार दिया गया। इंटरनेट बंद कर दिया गया ताकि सूचनाओं का प्रवाह रोका जा सके। तेहरान एयरपोर्ट बंद किया गया और राजधानी को लगभग कर्फ्यू जैसी स्थिति में डाल दिया गया। यह सब दर्शाता है कि सत्ता किसी भी कीमत पर नियंत्रण बनाए रखना चाहती है। इस पूरे घटनाक्रम में अंतरराष्ट्रीय राजनीति की छाया भी साफ नजर आती है। निर्वासित क्राउन प्रिंस रजा पहलवी की सक्रियता और अमेरिकी प्रशासन के साथ उनकी कथित गुप्त मुलाकातों की खबरों ने हालात को और जटिल बना दिया है। रजा पहलवी खुले तौर पर सत्ता परिवर्तन की बात कर रहे हैं और खुद को इस प्रक्रिया का नेतृत्व करने के लिए तैयार बता रहे हैं। अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प द्वारा ईरान के साथ कारोबार करने वाले देशों पर अतिरिक्त टैरिफ लगाने की घोषणा ने यह संकेत दिया है कि वाशिंगटन ईरान पर दबाव बढ़ाने के मौके को हाथ से जाने नहीं देना चाहता। हालांकि ईरान हमेशा से अमेरिका और इजराइल का विरोधी रहा है और ऐसे में किसी भी बाहरी हस्तक्षेप को वह अपने खिलाफ साजिश के रूप में पेश करता रहा है। ईरान में जारी इस संकट का असर केवल वहां की सीमाओं तक सीमित नहीं है। भारत सहित कई देशों के नागरिक और छात्र ईरान में रह रहे हैं जिनकी सुरक्षा को लेकर चिंता बढ़ गई है। कश्मीरी छात्रों के परिवारों की बेचैनी इस बात का उदाहरण है कि यह संकट मानवीय स्तर पर कितनी दूर तक असर डाल रहा है। इसके अलावा ईरान से तेल और व्यापार करने वाले देशों के सामने भी असमंजस की स्थिति है। अगर हालात और बिगड़ते हैं तो वैश्विक ऊर्जा बाजार पर इसका असर पड़ सकता है। सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या यह आंदोलन किसी बड़े राजनीतिक बदलाव की ओर बढ़ रहा है या फिर सख्त दमन के बाद धीरे धीरे शांत हो जाएगा। ईरान का तंत्र अब तक विरोध को कुचलने में सक्षम रहा है लेकिन इस बार असंतोष की व्यापकता और तीव्रता कुछ अलग संकेत देती है। महंगाई और बेरोजगारी जैसे मुद्दे केवल नारों तक सीमित नहीं हैं बल्कि हर घर की हकीकत बन चुके हैं। जब आर्थिक संकट राजनीतिक असंतोष से जुड़ जाता है तो हालात को संभालना किसी भी सत्ता के लिए मुश्किल हो जाता है। ईरान आज एक ऐसे चौराहे पर खड़ा है जहां हर रास्ता जोखिम से भरा है। अगर दमन तेज किया गया तो अंतरराष्ट्रीय दबाव और आंतरिक विद्रोह दोनों बढ़ सकते हैं। अगर बातचीत और सुधारों की राह चुनी गई तो सत्ता संरचना में बदलाव की मांग उठ सकती है। मध्य एशिया की राजनीति में ईरान एक महत्वपूर्ण स्तंभ रहा है और वहां की अस्थिरता पूरे क्षेत्र को प्रभावित कर सकती है। ऐसे मंर आने वाले दिन न केवल ईरान के भविष्य को तय करेंगे बल्कि यह भी बताएंगे कि क्या इस्लामी गणराज्य अपने नागरिकों की आवाज सुनने को तैयार है या फिर इतिहास एक बार फिर खुद को दोहराने जा रहा है। त्रवरिष्ठ पत्रकार, साहित्यकार,स्तम्भकार) (यह लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं इससे संपादक का सहमत होना अनिवार्य नहीं है) .../ 16 जनवरी /2026