भारतीय लोकतंत्र में न्यायपालिका को संविधान एवं नागरिकों के मौलिक अधिकारों का संरक्षक की मान्यता है। नागरिकों के अंतिम भरोसे के रूप में न्यायालयों की मान्यता है। सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट से अपेक्षा होती है, वह कार्यपालिका और विधायिका पर अंकुश रखें। कार्यपालिका और विधायिका नागरिकों पर शासन करती है। जो शासन और प्रशासन से प्रताड़ित होते हैं, वह कमजोर होते हैं। उनके अधिकारों की रक्षा न्यायपालिका के माध्यम से ही संभव है। हाल के वर्षों में जिस तरह सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट में सरकार के लिए अलग और आम जनता के लिए अलग नियम लागू किए जा रहे हैं। जिस तरह से न्यायपालिका के फैसले बार-बार बदले जा रहे हैं। संवैधानिक पीठों और बड़ी बेंचों के पूर्व निर्णयों की अनदेखी की जा रही है। उसने न्यायपालिका की विश्वसनीयता पर गंभीर प्रश्नचिह्न खड़े कर दिए हैं। एक ही मुद्दे पर अलग-अलग बेंचों की विरोधाभासी टिप्पणियाँ, निर्णय और पूर्व निर्णयों को पलटने से ना केवल कानूनी अस्थिरता पैदा हो रही है, बल्कि नागरिकों तथा विधि व्यवसाय से जुड़े हुए लोगों के मन में भी न्यायपालिका के प्रति अविश्वास जन्म ले रहा है। न्याय अब संविधान और कानून नियम के सिद्धांतों से नहीं, वरन खुली आंख से देखकर न्यायालयों द्वारा परिस्थितिवश फैसले दिए जा रहे हैं। जब संवैधानिक पीठों के फैसलों को सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट के न्यायाधीशों द्वारा अपेक्षित सम्मान नहीं दिया जाएगा, ऐसी स्थिति में न्यायिक अनुशासन और न्याय व्यवस्था का कमजोर पड़ना तय है। पिछले कुछ वर्षों में सरकार के खिलाफ मामलों में न्यायालयों द्वारा सुनवाई और फैसला देने में देरी की जा रही है। कई संवैधानिक मामले ऒर जनहित याचिकाओं की वर्षों तक सुनवाई नही होती है। लंबे समय के बाद जो फैसले आते हैं वह भी आधे अधूरे होते हैं। जमानत और अन्य फैसलों में सरकार की ईच्छा- अनिच्छा, न्यायधीशों के मन में धार्मिक आधार पर गुण-दोषों को दरकिनार करते हुए पूर्वाग्रहों के आधार पर निर्णय करने के कई मामले सामने आए हैं। नागरिकता, चुनाव, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और संघीय ढांचे से जुड़े कई मामलों में न्याय में देरी, वस्तुतः न्याय से इनकार किये जाने के समान है। इससे यह धारणा मजबूत हो रही है। न्याय पालिका अब केंद्र सरकार की इच्छा के विपरीत निर्णय देने से हिचक रही है। देश के विभिन्न राज्यों के हाईकोर्ट में भी यही स्थिति देखने को मिल रही है। हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के जजों में पदोन्नति, ट्रांसफर, पोस्टिंग को लेकर यही डर दिखता है। जिसके कारण ना तो समय पर सुनवाई हो रही है, ना ही उन पर त्वरित निर्णय आ पा रहे हैं। कई बार कठोर संवैधानिक प्रश्नों से बचने की प्रवृत्ति भी हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के जजों में दिखने लगी है। कई बार तो सुनवाई के दौरान यह लगने लगता है, जज सरकार की ओर से अपना पक्ष रख रहे हैं। आम आदमी के लिए यह स्थिति बेहद भयावह है। जब अदालतें समय पर न्याय नहीं देंगी। ऐसी स्थिति में लोग वैकल्पिक न्याय के रास्ते खोजेंगे। अपराधियों और नेताओं के पास जाकर न्याय पाने की कोशिश करेंगे। जिसके कारण न्यायपालिका और कानून व्यवस्था की छवि दोनों का ही नुकसान होना तय है। हालिया घटनाओं में, जैसे पश्चिम बंगाल में न्यायिक प्रक्रिया के प्रति अविश्वास, भीड़तंत्र की प्रवृत्ति, इसी टूटते भरोसे का परिणाम मानी जा सकती हैं। पिछले कुछ वर्षों में श्रीलंका, बांग्लादेश, नेपाल इत्यादि में जिस तरह की घटनाएं भीड़तंत्र के रुप में देखने को मिली हैं। चुनाव आयोग, एसआईआर के मामले में जिस तरह से सुप्रीम कोर्ट में तारीख पर तारीख मिलती रही। उसी बीच बिहार में चुनाव भी हो गए। इसी तरह कई अन्य याचिकाओं पर भी लंबे समय सुनवाई नहीं हो पाई। जब सुनवाई हुई, तब उस निर्णय का कोई औचित्य नहीं रहा। इलेक्शन बांड का मामला सबसे बड़ा उदाहरण है। महाराष्ट्र में कई वर्षों तक असंवैधानिक सरकार चलती रही। ऐसी स्थिति पर आम जनता का न्यायपालिका पर विश्वास डगमगा रहा है। इससे कानून का शासन कमजोर पड़ने लगा है। कॉलेजियम प्रणाली पर लगातार सवाल उठ रहे हैं। हाल ही में 56 जजों की वरिष्ठता क्रम को दरकिनार करते हुए सुप्रीम कोर्ट में जिस जज की नियुक्ति की गई है, उसने भी न्यायपालिका के विश्वास के संकट को बढ़ाने का काम किया हैं। जजों की नियुक्ति में पारदर्शिता की कमी, सरकार का बढ़ता हस्तक्षेप, पक्षपात और भाई-भतीजावाद के आरोप लंबे समय से लग रहे हैं। न्यायपालिका की नियुक्तियाँ सीमित दायरे में, बंद दरवाजों के पीछे होती हैं। ऐसी स्थिति में न्याय पालिका की निष्पक्षता पर संदेह होना स्वाभाविक है। हाल ही में कॉलेजियम की एक सदस्य ने जिस तरह से उनकी आपत्ति को दर्ज नहीं करने की बात कही। हाईकोर्ट के जज यशवंत वर्मा के मामले में भी जिस तरह की चर्चा हो रही है। उसको देखते हुए न्यायपालिका को आत्मावलोकन की जरूरत है। न्याय पालिका की स्वतंत्रता केवल सरकार से दूरी दिखाने मे नहीं, बल्कि सुसंगत फैसलों, समयबद्ध सुनवाई, पारदर्शी नियुक्तियों और संवैधानिक फैसलों से सुनिश्चित होती है। सुप्रीम कोर्ट स्वयं अपने फैसलों का सम्मान नहीं करेगा। संविधान की स्थिरता और न्यायपालिका की वर्तमान कार्य प्रणाली और फैसले विश्वसनीयता की परिधि में नहीं रहेंगे। ऐसी स्थिति में लोकतंत्र का सबसे मजबूत न्यायपालिका का सर्वोच्च स्तंभ खड़ा रहेगा, इसमें संदेह होने लगा है। न्यायपालिका को इस स्थिति में त्वरित सुधार और लोंगो का भरोसा बना रहे इस दिशा में काम करने की जरुरत है। ईएमएस/18/01/2026