लेख
18-Jan-2026
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अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प का व्यवहार लगातार दुनिया को हतप्रभ कर रहा है ट्रंप की हठधर्मिता दिनों दिन ने रूप में सामने आ रही है एक ताकतवर मुल्क किस तरह अराजकत व्यवहार कर अन्य देशों के लिए मुसीबत खड़ी कर सकता है यह उनके तमाम हरकतों से समझ सकते हैं। अब ताजा घटना चक्र में अमेरिका ने ईरान को हर तरफ से घेरना शुरू कर दिया है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान के साथ व्यापार करने वाले किसी भी देश पर 25 प्रतिशत टैरिफ लगाने की घोषणा की है। ट्रंप के इस फैसले से ईरान के अंदर विरोध प्रदर्शनों पर हिंसक कार्रवाई को लेकर खामेनेई सरकार पर दबाव बढ़ गया है, जिसमें कम से कम 648 लोग मारे गए हैं और पूरे देश में हजारों की गिरफ्तारियां हुई हैं। ट्रंप की यह टैरिफ कार्रवाई संभावित रूप से भारत और चीन सहित कई देशों को प्रभावित कर सकती है, जो ईरान और अमेरिका, दोनों के साथ व्यापार करते हैं। ट्रंप ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म दूथ सोशल पर लिखा, तुरंत प्रभाव से, इस्लामी गणराज्य ईरान के साथ व्यापार करने वाला कोई भी देश, संयुक्त राज्य अमेरिका के साथ होने वाले सभी व्यापार पर 25 प्रतिशत टैरिफ देगा। यह आदेश अंतिम और निर्णायक है। टैरिफ की घोषणा ऐसे समय हुई है जब ट्रंप ईरान के खिलाफ संभावित सैन्य कार्रवाई पर विचार कर रहे हैं। व्हाइट हाउस की प्रेस सेक्रेटरी कैरोलिन लेविट ने सोमवार को कहा था कि अमेरिका के पास एक विकल्प यह भी है कि वह ईरान पर हवाई हमला करे। लेकिन साथ ही उन्होंने कहा कि ईरान के पास ट्रंप के विशेष दूत स्टीव विठकॉफ से बात करने का एक राजनयिक चैनल भी खुला है। उन्होंने कहा कि ईरान अपने सार्वजनिक बयानों की तुलना में निजी तौर पर बहुत अलग बोली बोल रहा है। चीन को ईरान का सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार माना जाता है, लेकिन ट्रंप के इस कदम का असर भारत, संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) और तुर्की पर भी पड़ेगा, जो तेहरान के प्रमुख व्यापारिक साझेदारों में से हैं। तेहरान में मौजूद भारतीय दूतावास के अनुसार, भारत ने वित्तीय वर्ष 2024-25 में ईरान को 1.24 अरब डॉलर का सामान निर्यात किया, जबकि 0.44 अरब डॉलर का आयात किया, जिससे कुल व्यापार 1.68 अरब डॉलर (लगभग 14,000-15,000 करोड़ रुपये) हो गया। इनमें सबसे बड़ा हिस्सा 512.92 मिलियन डॉलर मूल्य के कार्बनिक केमिकल्स का था। इसके बाद फल, मेवे, खट्टे फलों के छिलके और खरबूजे 311.60 मिलियन डॉलर और खनिज ईंधन, तेल और आसवन उत्पाद 86.48 मिलियन डॉलर के थे। ध्यान रहे कि अमेरिका ने पहले ही रूप्सी तेल की खरीद के लिए भारतीय सामानों पर कुल 50 प्रतिशत तक का टैरिफ लगा दिया है। अगर ईरान से व्यापार के लिए भी भारत पर अतिरिक्त टैरिफ लगता है तो व्यापार में और बाधा आएगी। ईरान इस समय गंभीर राजनीतिक और आर्थिक संकट के दौर से गुजर रहा है। देशभर में भड़के विरोध प्रदर्शनों ने सरकार के सामने बड़ी चुनौती खड़ी कर दी है। हालात इतने बिगड़ चुके हैं कि ईरान में इंटरनेट और मोवाइल सेवाओं पर रोक लगा दी गई है। यह संकट केवल ईरान तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका असर भारत जैसे देशों पर भी पड़ सकता है, जिनके रणनीतिक और व्यापारिक हित ईरान से गहराई से जुड़े हुए हैं। ईरान भारत की विदेश और व्यापार नीति का एक बेहद महत्वपूर्ण हिस्सा है। आपको बता दें कि भारत ने मध्य एशिया, रूस और यूरोप तक अपनी पहुंच मजबूत करने के लिए जिन परियोजनाओं में निवेश किया है, उनमें ईरान एक प्रमुख ट्रांजिट हब की भूमिका निभाता है। खासतौर पर ईरान के दक्षिण पूर्वी तट पर स्थित चाबहार बंदरगाह भारत के लिए रणनीतिक रूप से बेहद अहम है। चाबहार पोर्ट भारत भारत को पाकिस्तान को बायपास करते हुए अफगानिस्तान, मध्य एशिया और यूरोप तक सीधा व्यापारिक रास्ता देता है। यही बंदरगाह इंटरनेशनल नॉर्थ साउथ ट्रांसपोर्ट कॉरिडोर यानी आईएनएसटीसी का भी अहम हिस्सा है। इस मार्ग से भारत को निर्यात आयात में करीब 40 प्रतिशत समय और लगभग 30 प्रतिशत लागत को बचत होती है। अगर ईरान में अस्थिरता बढ़‌ती है और चाबहार बंदरगाह प्रभावित होता है तो भारत की भू-आर्थिक रणनीति को बड़ा झटका लग सकता है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार वित्त वर्ष 2024-25 में भारत और ईरान के बीच द्विपक्षीय व्यापार करीब 1.68 अरब डॉलर रहा। इसमें भारत ने ईरान को 1.24 अरब डॉलर का निर्यात किया, जबकि 0.44 अरब डॉलर का आयात किया गया। इस तरह भारत को लगभग 0.80 अरब डॉलर का व्यापारिक लाभ हुआ। भारत से ईरान को भेजे जाने वाले प्रमुख सामानों में चावल, चाय, चीनी, दवाइयां, इलेक्ट्रिक मशीनरी और कृत्रिम फाइबर शामिल हैं। वहीं ईरान से भारत सूखे मेवे, रसायन और कांच से बने उत्पाद आयात करता है। अगर संकट गहराता है और चाबहार पोर्ट या आईएनएसटीसी मार्ग बाधित होता है तो भारत-ईराम व्यापार पर सीधा असर पड़ सकता है। ईरान दुनिया के बड़े तेल और गैस उत्पादक देशों में शामिल है। अगर ईरान संकट का असर होर्मुज जलडमरूमध्य तक पहुंचता है तो वैश्विक तेल आपूर्ति बुरी तरह प्रभावित हो सकती है। दुनिया के करीब 20 प्रतिशत कच्चे तेल की आपूर्ति इसी रास्ते से होती है। भारत अपनी जरूरत का 80 प्रतिशत से ज्यादा कच्चा तेल आयात करता है। ऐसे में तेल की कीमतों में बढ़ोतरी से भारत का आयात बिल बढ़ेगा। इसका सीधा असर परिवहन लागत, माल बुलाई और आम लोगों की महंगाई पर पड़ेगा। पेट्रोल-डीजल के दाम बढ़ने से देश में महंगाई का दबाव और तेज हो सकता है। ईरान में जारी संकट भारत के लिए केवल एक पड़ोसी देश को समस्या नहीं है, बल्कि यह भारत की व्यापारिक, ऊर्जा और रणनीतिक सुरक्षा से सीधे जुड़ा हुआ मामला है। आपको पता रहे कि चाबहार पोर्ट, आईएनएसटीसी कॉरिडोर और तेल आपूर्ति जैसे मुद्दे भारत की दीर्घकालिक आर्थिक योजनाओं से जुड़े हैं। अगर ईरान में हालात और बिगड़ते हैं, तो भारत को इसके दूरगामी प्रभावों के लिए तैयार रहना होगा। यहां यह भी ध्यान रहे कि अमेरिका और भारत, दोनों पक्ष एक व्यापार समझौते को अंतिम रूप देने के लिए महीनों से काम कर रहे हैं। अगर यह समझौता हो जाता है तो यह नई दिल्ली को लंबे समय से अपेक्षित टैरिफ राहत प्रदान करेगा। यहां यह भी बता दें अमेरिका की सामंतवाद की यह नीति कोई अचानक उपजी हुई नहीं है। शीत युद्ध के दौर से लेकर आज तक, लैटिन अमेरिका, पश्चिम एशिया और एशिया-अफ्रीका के कई देशों ने इसे झेला है। इराक, लीबिया, सीरिया और अब वेनेजुएला—सूची लंबी है। फर्क बस इतना है कि हर बार हस्तक्षेप को नया नाम दे दिया जाता है—कभी “लोकतंत्र की बहाली”, कभी “तानाशाही के खिलाफ लड़ाई” और कभी “मानवाधिकारों की रक्षा”। लेकिन इन सभी नारों के पीछे असली लक्ष्य संसाधन, प्रभाव और रणनीतिक नियंत्रण ही रहा है।यह स्थिति पूरी दुनिया के लिए चेतावनी है। खासकर विकासशील और मध्यम शक्ति वाले देशों के लिए। यह मान लेना कि अमेरिकी सहायता, व्यापार या रणनीतिक साझेदारी हमेशा निष्पक्ष और दीर्घकालिक होगी, अब एक खतरनाक भ्रम बन चुका है। इतिहास गवाह है कि अमेरिका दोस्ती भी अपने हित देखकर करता है और दुश्मनी भी। हालांकि इस मे कोई संदेह नहीं है कि अमेरिका अपनी ताकत का पूरी तरह दुरुपयोग कर विश्व भर में अपना प्रभुत्व कायम करना चाहता है और इसके लिए वह वैश्विक कानून और आचार संहिता को लगातार अनदेखा कर विपरित आचरण कर रहा है। (लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं) ईएमएस / 18 जनवरी 26