दुनिया में अजीबोगरीब खेल हो रहे हैं। लोग अपने अपने तरीकों से इस खेल की व्याख्या करते हैं। बांग्लादेश, नेपाल और श्रीलंका में विद्रोह हुए और शांत हुए। ईरान में यह विद्रोह जारी है। 1979 में इस्लामी क्रान्ति के बाद अयातुल्ला खुमैनी शासक बने और ईरान को इस्लामिक देश बना दिया। उनके जाने के बाद खामेन ई ईरान पर काबिज हुए और पिछले 46 वर्षों से वे शासक बने हुए हैं। ईरान का एक रक्तरंजित इतिहास रहा है। पहले यह देश फारस के नाम से जाना जाता था, जो सातवीं सदी में इस्लाम के प्रवेश के बदलने लगा। सातवीं सदी में ही इस्लाम से डर कर कुछ लोग गुजरात आये, जो पारसी के रूप में पहचाने जाते हैं। 1979 के बाद भी यहां विद्रोह होते रहे, लेकिन 2022 में महसा अमीनी की हत्या हिरासत में कर दी गई तो स्त्रियों ने ‘ औरत, आजादी और जिंदगी ‘ के नाम से आंदोलन किया। वे हिजाब और औरतों पर ढाये जा रहे जुल्म के खिलाफ थी। अभी जो आंदोलन चल रहा है, उसके पीछे ईरान की मुद्रा रियाल में भारी गिरावट, महंगाई और बेरोजगारी है। लोग यह भी चाहते हैं कि लोकतांत्रिक व्यवस्था देश में कायम हो। इस विद्रोह में अनेक लोग मारे गए हैं। 28 दिसंबर 25 से शुरू हुए इस आंदोलन को अमेरिका के राष्ट्रपति ट्रंप का पूरा समर्थन है। 1979 में जब ईरान को राजशाही से मुक्त किया गया तो जनता को बहुत सी उम्मीदें थीं। जिन्हें धार्मिक कट्टरता में विश्वास था, वे अतिरिक्त रूप से उत्साही थे। उन्हें लगता था कि इस्लाम सारी समस्याओं को खत्म कर देगा, लेकिन न ऐसा होना था, न हुआ। पाकिस्तान भी इस्लामिक देश है और समस्याओं से घिरा हुआ है। धर्म मनुष्य की एक कमजोर नस है, जिसे सहला कर सत्ता तो प्राप्त कर सकते हैं, लेकिन बुनियादी समस्याओं को सुलझा नहीं सकते। जो देश धार्मिक बन गये हैं, उस देश की जनता लोकतांत्रिक शासन चाहती है। और जो देश धार्मिक बन नहीं पाया, उस देश में धार्मिक कट्टरता सत्ता दिला रही है। उसके शासक धार्मिक चिह्न धारण कर जनता को भड़का रहे हैं। ईरान का विद्रोह एक चेतावनी भी है। सत्ता का काम जनता की बुनियादी आवश्यकताओं को पूरा करना है, न कि धर्म प्रचार करना। ईरान की मुद्रा रियाल में अंतर्राष्ट्रीय बाजार में भारी गिरावट आई। धार्मिक शासक कुछ नहीं कर पाया। स्त्रियां हिजाब नहीं पहनना चाहतीं, तो पुरुष सत्ता धर्म के नाम पर उसकी आजादी नहीं छीन सकती। अफगानिस्तान से भी इस तरह की डरावनी खबरें आती रहती हैं। आजादी के दौरान जिन्ना ने इस्लाम को हवा दी। उसे पाकिस्तान की सत्ता तो मिल गई, लेकिन आज भी न वहां शांति है, न यहां। जिन्ना को तो पाकिस्तान मिला, लेकिन सावरकरपंथी आज भी तरस रहे हैं। वे संविधान के दायरे में ही सत्ता पर काबिज हैं, लेकिन खुलेआम मनुस्मृति टाइप संविधान को लागू नहीं कर पा रहे। उनकी ख्वाहिश जरूर है। ऐसे लोग ईरान से सबक लें। ईरान में विद्रोह के जो कारण मौजूद हैं, वही कारण भारत में भी मौजूद हैं। बेरोजगारी, महंगाई, रूपए के मूल्य में भारी गिरावट, भ्रष्टाचार और पूंजीपतियों से सरकार का अनूठा गठबंधन। राष्ट्रपति ट्रंप ईरान में जनता को उकसा रहा है तो भारत के प्रधानमंत्री को धमका रहा है। आसन्न खतरे को देखते हुए हमें आंतरिक रूप में मजबूत होना है। धार्मिक कट्टरवाद देश को तबाह कर देगा , जैसे ईरान, पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान तबाह हो रहा है। भारत के प्रधानमंत्री और उनके समर्थकों को यह समझ लेना चाहिए कि जनता ने उन्हें सत्ता अच्छे दिन लाने के लिए सौंपी थी, न कि धार्मिक तांडव करने के लिए। दुनिया में वही देश तरक्की कर रहा है, जिस देश में धार्मिक हस्तक्षेप कम से कम है। चाहे अमेरिका हो, या चीन, जापान या रूस। ईएमएस/17/01/2026