भारतीय न्याय,सांस्कृतिक नैतिकता और विधवा बहू का अधिकार-मनुस्मृति से संविधान तक एक समावेशी न्यायिक यात्रा क़ा समग्र विश्लेषण भारतीय न्याय प्रणाली में मनुस्मृति जैसे ग्रंथ नैतिक संदर्भ प्रदान करते हैं व संविधान उस नैतिकता को कानूनी अधिकारों में परिवर्तित करता है,यही भारतीय न्याय की वह विशिष्ट पहचान है - वैश्विक स्तरपर भारत केवल एक भौगोलिक राष्ट्र नहीं, बल्कि एक जीवित सभ्यता है,जिसकी चेतना में धर्म नैतिकता, आस्था, परंपरा और न्याय एक-दूसरे से गहराई से जुड़े हुए हैं।भारतीय समाज में बड़े- बुजुर्गों की सीख,शास्त्रों में वर्णित जीवन-मूल्य और लोक-स्मृति में बसे संस्कार केवल निजी आचरण तक सीमित नहीं रहे, बल्कि उन्होंने सदियों तक सामाजिक और विधिक व्यवस्था को भी दिशा दी है। यही कारण है कि भारत जैसे विशाल आध्यात्मिक और सांस्कृतिक राष्ट्र में शास्त्रों, पुराणों और स्मृतियों में कही गई बातों का उल्लेख साधारण व्यक्ति से लेकर देश की सर्वोच्च अदालत तक में उदाहरण स्वरूप किया जाता रहा है। यह तथ्य अपने आप में भारतीय न्याय प्रणाली की विशिष्टता को रेखांकित करता है, जहाँ आधुनिक संवैधानिक ढांचे के भीतर भी सांस्कृतिक नैतिकता को पूरी तरह नकारा नहीं जाता, बल्कि उसे न्याय की संवेदनशील व्याख्या का माध्यम बनाया जाता है।13 जनवरी को सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिए गए एक महत्वपूर्ण निर्णय ने इसी भारतीय न्यायिक परंपरा को एक बार फिर वैश्विक मंच पर स्थापित किया। यह फैसला केवल एक विधवा बहू के भरण-पोषण के अधिकार से जुड़ा मामला नहीं था, बल्कि यह उस गहरे दर्शन को प्रतिबिंबित करता है, जिसमें कानून, नैतिकता और सामाजिक उत्तरदायित्व एक-दूसरे के पूरक बनकर सामने आते हैं।मैं एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र यह मानता हूं क़ि अदालत द्वारा मनुस्मृति जैसे प्राचीन ग्रंथ का संदर्भ लेना यह स्पष्ट करता है कि भारतीय न्याय प्रणाली आधुनिकता और परंपरा के बीच टकराव नहीं,बल्कि संवाद में विश्वास करती है।इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने मनुस्मृति के उस श्लोक का उल्लेख किया जिसमें स्पष्ट रूप से कहा गया है कि माता, पिता, पत्नी और पुत्र को कभी नहीं त्यागना चाहिए, और जो व्यक्ति ऐसा करता है,उसे दंडित किया जाना चाहिए।यह श्लोक केवल धार्मिक उपदेश नहीं है, बल्कि सामाजिक उत्तरदायित्व का एक मूलभूत सिद्धांत प्रस्तुत करता है। अदालत ने इस श्लोक को केवल सांस्कृतिक प्रतीक के रूप में नहीं,बल्कि नैतिक आधार के रूप में उद्धृत किया, ताकि यह स्पष्ट किया जा सके कि भरण- पोषण का दायित्व भारतीय समाज में केवल कानूनी नहीं, बल्कि नैतिक और मानवीय भी है।सुप्रीम कोर्ट की तीन माननीय जजों की पीठ ने यह रेखांकित किया कि किसी मृत व्यक्ति की संपत्ति केवल उत्तराधिकारियों की निजी संपत्ति नहीं होती, बल्कि उस पर उन सभी निर्भर व्यक्तियों का नैतिक और कानूनी अधिकार होता है, जिनकी देखभाल मृतक के जीवनकाल में उसकी जिम्मेदारी थी। यह दृष्टिकोण भारतीय पारिवारिक संरचना की उस अवधारणा को मजबूत करता है, जिसमें परिवार को केवल रक्त-संबंधों का समूह नहीं, बल्कि परस्पर उत्तरदायित्वों की इकाई माना गया है। साथियों बात अगर हम 13 जनवरी 2026 को सुप्रीम कोर्ट के तीन माननीय न्यायमूर्तियों की पीठ ने दिए गए निर्णय की करें तो,इस मामले का मूल विवाद अत्यंत तकनीकी प्रतीत हो सकता है,लेकिन इसके निहितार्थ अत्यंत व्यापक हैं। प्रश्न यह था कि यदि किसी विवाहित महिला के पति की मृत्यु उसके ससुर के जीवनकाल में हो जाती है, तो उसे भरण- पोषण का अधिकार मिलता है, लेकिन यदि पति की मृत्यु ससुर की मृत्यु के बाद होती है, तो क्या वह इस अधिकार से वंचित हो जाएगी?याचिकाकर्ता की ओर से यह तर्क दिया गया कि ससुर की मृत्यु के बाद विधवा बहू का उनके परिवार की संपत्ति पर कोई अधिकार नहीं बचता। यह तर्क भारतीय समाज की उस संकीर्ण व्याख्या को दर्शाता है,जिसमें रिश्तों को केवल जीवनकाल की घटनाओं से जोड़कर देखा जाता है, न कि उनके नैतिक दायित्वों से।सुप्रीम कोर्ट ने इस तर्क को पूरी तरह खारिज करते हुए कहा कि पति की मृत्यु के समय के आधार पर विधवा बहुओं के बीच भेदभाव करना न केवल तर्कहीन है,बल्कि यह संवैधानिक समानता के सिद्धांत के भी विरुद्ध है।अदालत ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि ऐसी किसी भी व्याख्या का कोई संवैधानिक या तार्किक आधार नहीं हो सकता, जो समान परिस्थितियों में मौजूद महिलाओं के बीच भेदभाव उत्पन्न करे। यह टिप्पणी भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14 में निहित समानता के अधिकार की एक सशक्त पुनर्पुष्टि है। साथियों बात अगर हम अदालत ने अपने निर्णय में हिंदू दत्तक ग्रहण एवं भरण-पोषण अधिनियम 1956 की धारा 22 का विशेष उल्लेख किया, इसको समझने की करें तो यह धारा स्पष्ट रूप से कहती है कि मृतक हिंदू की संपत्ति से उसके सभी उत्तराधिकारियों पर यह दायित्व बनता है कि वे उसके निर्भर व्यक्तियों का भरण-पोषण करें। सुप्रीम कोर्ट ने इस प्रावधान की व्याख्या करते हुए कहा कि विधवा बहू भी निर्भर व्यक्तियों की श्रेणी में आती है, बशर्ते वह स्वयं या मृत पति द्वारा छोड़ी गई संपत्ति से अपना निर्वाह करने में असमर्थ हो।यह निर्णय इस मायने में भी ऐतिहासिक है कि इसमें अदालत ने कानूनी दायित्व और नैतिक दायित्व के बीच कृत्रिम विभाजन को अस्वीकार किया। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि भारतीय पारिवारिक कानून की आत्मा केवल विधिक प्रावधानों तक सीमित नहीं है, बल्कि उसमें सामाजिक नैतिकता की गहरी छाप है। जब कानून नैतिकता से कट जाता है, तब वह केवल नियमों का संकलन बनकर रह जाता है, लेकिन जब वह नैतिक मूल्यों से जुड़ता है, तब वह न्याय का माध्यम बनता है।मनुस्मृति के श्लोक का उल्लेख करते हुए अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि प्राचीन ग्रंथों का संदर्भ लेना किसी धर्मनिरपेक्ष राज्य के सिद्धांत के विरुद्ध नहीं है, जब तक कि उसका उपयोग सार्वभौमिक नैतिक सिद्धांतों को समझाने के लिए किया जा रहा हो। यह दृष्टिकोण अंतरराष्ट्रीय न्यायिक विमर्श में भी महत्वपूर्ण है, जहाँ सांस्कृतिक विविधता और स्थानीय नैतिकता को न्यायिक निर्णयों में स्थान देने की आवश्यकता पर लगातार चर्चा होती रही है। साथियों बात अगर हम इस निर्णय कोवैश्विक परिप्रेक्ष्य में देखनें की करें तो यह फैसला केवल भारत तक सीमित नहीं है। दुनियाँ भर में पारिवारिक कानूनों में यह प्रश्न उठता रहा है कि क्या विधवा महिलाओं को केवल उनके पति की संपत्ति तक सीमित रखा जाए, या उन्हें परिवार की सामूहिक संपत्ति से भी संरक्षण दिया जाए। सुप्रीम कोर्ट का यह निर्णय उन सभी समाजों के लिए एक उदाहरण प्रस्तुत करता है, जो पारंपरिक पारिवारिक संरचनाओं और आधुनिक मानवाधिकारों के बीच संतुलन बनाने की कोशिश कर रहे हैं।यह फैसला विशेष रूप से पितृसत्तात्मक समाजों के लिए एक स्पष्ट संदेश देता है कि महिलाओं के अधिकार किसी पुरुष रिश्तेदार के जीवनकाल या मृत्यु की तकनीकी घटनाओं पर निर्भर नहीं हो सकते। साथियों बात अगर हम विधवा बहू को परिवार से बाहर मानने की मानसिकता को समझने की करें तो अदालत ने स्पष्ट रूप से अस्वीकार कर दिया। यह निर्णय भारतीय समाज में विधवाओं के प्रति लंबे समय से चली आ रही उपेक्षा और असुरक्षा की भावना को चुनौती देता है अदालत ने यह भी कहा कि पुत्र की मृत्यु के बाद पिता की यह धार्मिक और नैतिक जिम्मेदारी बनती है कि वह अपनी बहू का भरण-पोषण करे, यदि वह स्वयं अपने निर्वाह में असमर्थ है।यह टिप्पणी भारतीय परिवार की उस अवधारणा को पुनर्जीवित करती है, जिसमें बुजुर्ग केवल अधिकारों के धारक नहीं, बल्कि उत्तरदायित्वों के संरक्षक भी होते हैं।यह दृष्टिकोण बुजुर्गों के सम्मान औरसामाजिक सुरक्षा को भी एक नया अर्थ देता है।इस निर्णय का एक महत्वपूर्ण पहलू यह भी है कि यह न्यायिक सक्रियता और संवेदनशीलता का उदाहरण प्रस्तुत करता है।अदालत ने कानून की संकीर्ण व्याख्या करने के बजाय उसके उद्देश्य और आत्मा को समझने का प्रयास किया। यह वही दृष्टिकोण है, जिसे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पुरपज़िव इंटरप्रिटेशन के रूप में जाना जाता है, और जिसे आधुनिक न्यायशास्त्र का एक महत्वपूर्ण सिद्धांत माना जाता है। साथियों बात अगर हम भारतीय संविधान और प्राचीन भारतीय ग्रंथों के बीच की स्थिति को समझने की करें तो यह संवाद यह दर्शाता है कि दोनों एक-दूसरे के विरोधी नहीं हैं। संविधान ने जिन मूल्यों,समानता, गरिमा और सामाजिक न्याय को स्थापित किया है,उनके बीजभारतीय सांस्कृतिक परंपरा में पहले से मौजूद रहे हैं।सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला इस ऐतिहासिक निरंतरता को रेखांकित करता है। अतःअगर हम उपरोक्त पूरे विवरण का अध्ययन कर इसका विश्लेषण करें तो हम पाएंगे क़ि यह निर्णय केवल एक विधवा बहू के अधिकारों की रक्षा नहीं करता,बल्कि यह भारतीय समाज को यह याद दिलाता है कि न्याय केवल अदालतों में नहीं, बल्कि परिवारों और समाज में भी स्थापित होना चाहिए।जब कानून परिवार की सबसे कमजोर कड़ी को संरक्षण देता है तब वह केवल कानूनी दस्तावेज नहीं,बल्कि सामाजिक परिवर्तन का उपकरण बन जाता है।इस फैसले ने यह स्पष्ट कर दिया है कि भारतीय न्याय प्रणाली न तो अंधी परंपरा की गुलाम है, और न ही सांस्कृतिक जड़ों से कटे हुए आधुनिकतावाद की। वह दोनों के बीच एक संतुलित मार्ग अपनाती है,जहाँ मनुस्मृति जैसे ग्रंथ नैतिक संदर्भ प्रदान करते हैं,और संविधान उस नैतिकता को कानूनी अधिकारों मेंपरिवर्तित करता है। यही भारतीय न्याय की वह विशिष्ट पहचान है, जो उसे वैश्विक मंच पर अलग स्थान प्रदान करती है। (संकलनकर्ता लेखक-क़र विशेषज्ञ स्तंभकार साहित्यकार अंतरराष्ट्रीय लेखक चिंतक कवि संगीत माध्यमा सीए हैं)। ईएमएस/17/01/2026