इक्कीसवीं सदी की वैश्विक राजनीति आज ऐसे दौर में प्रवेश कर चुकी है जहाँ शांति और युद्ध के बीच की रेखा लगातार धुंधली होती जा रही है। हाल की घटनाओं पर दृष्टि डालें तो यह स्पष्ट होता है कि अंतरराष्ट्रीय अशांति किसी एक क्षेत्र की समस्या नहीं रह गई है, बल्कि यह एक सुनियोजित वैश्विक परिघटना बन चुकी है। इस परिघटना के केंद्र में बार-बार जिस देश का नाम उभरता है, वह है अमेरिका। कभी लोकतंत्र का रक्षक बनने का दावा करने वाला यह देश आज अपनी नीतियों, धमकियों और सैन्य तैनातियों के कारण विश्व अस्थिरता का सबसे बड़ा स्रोत बनता जा रहा है। कतर में स्थित अपने एयरबेस से अमेरिकी सैनिकों को हटने की सलाह, ईरान की ओर युद्धपोत भेजना, और दर्जनों देशों के नागरिकों पर वीज़ा रोकने की घोषणा, ये सभी कदम अमेरिका की उस मानसिकता को दर्शाते हैं जिसमें संवाद नहीं, बल्कि दबाव प्राथमिक हथियार है। कूटनीति का स्थान अब चेतावनियों ने ले लिया है और अंतरराष्ट्रीय सहयोग की जगह एकतरफा फैसलों ने। इससे दुनिया में भय का वातावरण बनता है, जो किसी भी तरह से स्थायी शांति का आधार नहीं हो सकता। ईरान के संदर्भ में यह दावा किया गया कि अमेरिकी धमकी के बाद वहां हिंसक प्रदर्शनों में कमी आई और प्रदर्शनकारियों की हत्याएँ रुक गईं। यदि यह दावा सही भी मान लिया जाए, तो भी यह प्रश्न अनुत्तरित रह जाता है कि क्या भय के बल पर थोपी गई शांति वास्तविक शांति होती है। इतिहास साक्षी है कि दबाव में पैदा हुई चुप्पी अक्सर भविष्य के बड़े विस्फोट का कारण बनती है। मध्य-पूर्व दशकों से इसी प्रयोगशाला का उदाहरण रहा है, जहाँ बाहरी हस्तक्षेपों ने समस्याओं को सुलझाने के बजाय और जटिल बना दिया। अमेरिका की वीज़ा नीति भी इसी अस्थिरता की एक कड़ी है। पाकिस्तान, बांग्लादेश सहित 75 देशों के नागरिकों पर वीज़ा रोकने की धमकी सामूहिक दंड की मानसिकता को दर्शाती है। इसका असर केवल सरकारों पर नहीं, बल्कि आम नागरिकों, छात्रों, व्यापारियों और परिवारों पर पड़ता है। यह नीति वैश्वीकरण की उस भावना के विरुद्ध है, जिसकी वकालत अमेरिका स्वयं वर्षों से करता आया है। इसी क्रम में ग्रीनलैंड को लेकर दिया गया बयान भी ध्यान खींचता है। ‘डोम प्रोजेक्ट’ के लिए ग्रीनलैंड की आवश्यकता का तर्क यह दर्शाता है कि अब संघर्ष केवल तेल या युद्धक्षेत्रों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि आर्कटिक जैसे संवेदनशील और पर्यावरणीय दृष्टि से महत्वपूर्ण क्षेत्रों तक फैल चुका है। सुरक्षा के नाम पर भू-राजनीतिक विस्तार की यह होड़ आने वाले समय में नए तनावों को जन्म दे सकती है। लैटिन अमेरिका भी इस वैश्विक उथल-पुथल से अछूता नहीं है। वेनेजुएला की विपक्षी नेता द्वारा अमेरिकी राष्ट्रपति को शांति पुरस्कार भेजना प्रतीकात्मक भले ही लगे, लेकिन यह उस प्रवृत्ति को दर्शाता है जिसमें आंतरिक राजनीतिक संघर्षों में बाहरी समर्थन को निर्णायक माना जाने लगा है। इससे संप्रभुता की अवधारणा कमजोर होती है और देशों के भीतर ध्रुवीकरण बढ़ता है। दक्षिण एशिया में स्थिति और भी जटिल है। पाकिस्तान के प्रधानमंत्री द्वारा यह दावा कि भारत के साथ संघर्ष के बाद पाकिस्तानी लड़ाकू विमानों की मांग बढ़ गई है, यह दर्शाता है कि कैसे सैन्य टकराव को विपणन अवसर में बदला जा रहा है। JF-17 जैसे फाइटर जेट्स की संभावित बिक्री को लेकर बांग्लादेश, सऊदी अरब, सूडान, लीबिया जैसे देशों के नाम सामने आना इस बात का संकेत है कि हथियारों का बाजार अस्थिरता से ही फलता-फूलता है। हालाँकि इन दावों पर अब तक कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है, फिर भी यह तथ्य चिंताजनक है कि युद्ध या झड़पों को सैन्य क्षमता के प्रदर्शन के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है। यह प्रवृत्ति क्षेत्रीय सुरक्षा के लिए खतरनाक है, क्योंकि इससे हथियारों की दौड़ को प्रोत्साहन मिलता है। नाइजीरिया, म्यांमार और अज़रबैजान जैसे देशों के पास पहले से JF-17 का होना इस प्रसार की गंभीरता को दर्शाता है। भारत और पाकिस्तान के बीच मई 2025 में हुए संघर्ष को लेकर दोनों पक्षों के दावे भी आधुनिक युद्ध के एक नए आयाम की ओर संकेत करते हैं। यह केवल हथियारों की टक्कर नहीं थी, बल्कि सूचना और प्रचार का भी युद्ध था। किसने कितने विमान गिराए, किसकी तकनीक बेहतर रही, इन सब पर विरोधाभासी बयान सामने आए। ऐसे समय में सत्य अक्सर शोर में दब जाता है और आम जनता भ्रमित होती है। इस पूरे परिदृश्य में भारत का तेजस लड़ाकू विमान आत्मनिर्भरता और रणनीतिक सोच का उदाहरण बनकर उभरता है। तेजस की तुलना JF-17 से करते हुए तकनीकी श्रेष्ठता की चर्चा होती है, लेकिन असली महत्व इस बात का है कि भारत रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनने की दिशा में आगे बढ़ रहा है। यह दृष्टिकोण केवल सैन्य शक्ति बढ़ाने का नहीं, बल्कि क्षेत्रीय संतुलन और दीर्घकालिक सुरक्षा सुनिश्चित करने का है। पहलगाम जैसे आतंकी हमले और उसके बाद की सैन्य कार्रवाइयाँ यह दर्शाती हैं कि आतंकवाद आज भी दक्षिण एशिया की सबसे बड़ी चुनौती बना हुआ है। भारत की जवाबी कार्रवाई और मजबूत वायु रक्षा प्रणाली ने यह स्पष्ट कर दिया कि देश अपनी सुरक्षा को लेकर सतर्क है। लेकिन साथ ही यह भी सच है कि आतंकवाद की समस्या का स्थायी समाधान केवल सैन्य उपायों से संभव नहीं है। इसके लिए क्षेत्रीय सहयोग और राजनीतिक इच्छाशक्ति आवश्यक है। इन सभी घटनाओं के बीच अमेरिका की भूमिका बार-बार संदेह के घेरे में आती है। क्या वह वास्तव में शांति का पक्षधर है या फिर अपनी रणनीतिक और आर्थिक हितों के लिए दुनिया को अस्थिर बनाए रखना उसके लिए लाभकारी है। इराक, अफगानिस्तान और लीबिया जैसे उदाहरण बताते हैं कि अमेरिकी हस्तक्षेप के बाद इन देशों में स्थिरता नहीं, बल्कि अराजकता बढ़ी। आज की दुनिया बहुध्रुवीय है। शक्ति का केंद्र केवल एक देश नहीं रह गया है। ऐसे में एकध्रुवीय सोच और धमकी की राजनीति न केवल अप्रासंगिक है, बल्कि खतरनाक भी है। यदि वैश्विक शांति की कोई संभावना है, तो वह सहयोग, संवाद और अंतरराष्ट्रीय कानून के सम्मान में निहित है, न कि युद्धपोतों, प्रतिबंधों और वीज़ा रोक जैसी नीतियों में। अंततः यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगा कि अमेरिका की वर्तमान नीतियाँ दुनिया के कई हिस्सों में अशांति को बढ़ावा दे रही हैं। शक्ति के प्रदर्शन से भय तो पैदा किया जा सकता है, लेकिन भरोसा नहीं। और बिना भरोसे के कोई भी वैश्विक व्यवस्था टिकाऊ नहीं हो सकती। यदि सच में शांति की स्थापना करनी है, तो अमेरिका सहित सभी महाशक्तियों को आत्ममंथन करना होगा और यह स्वीकार करना होगा कि दुनिया को नियंत्रित नहीं, बल्कि समझा जाता है। तभी यह अशांत विश्व किसी स्थिर भविष्य की ओर बढ़ सकता है। (L 103 जलवंत टाऊनशिप पूणा बॉम्बे मार्केट रोड़, नियर नन्दालय हवेली सूरत मो 99749 40324 वरिष्ठ पत्रकार,साहित्यकार,स्तम्भकार) ईएमएस / 19 जनवरी 26