लेख
20-Jan-2026
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प्रत्येक वर्ष 21 जनवरी को विश्व स्तर पर स्क्विरल एप्रिसिएशन डे (गिलहरी प्रशंसा दिवस) मनाया जाता है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार इस दिवस की शुरुआत वर्ष 2001 में उत्तरी कैरोलिना की वन्यजीव पुनर्वासकर्ता क्रिस्टी हारग्रोव द्वारा की गई थी। इस दिन को मनाने का मुख्य उद्देश्य केवल इस चंचल जीव की सुंदरता की सराहना करना नहीं है, बल्कि जैव-विविधता में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका, उनके पर्यावरणीय महत्व और उनके संरक्षण के प्रति जन-जागरूकता फैलाना है। गिलहरियाँ न केवल हमारे पार्कों और आंगनों की शोभा बढ़ाती हैं, बल्कि वे पारिस्थितिकी तंत्र के संतुलन को बनाए रखने में एक मूक सैनिक की तरह कार्य करती हैं। सांस्कृतिक महत्व और पौराणिक संदर्भ:- भारतीय संस्कृति में गिलहरी को केवल एक जीव के रूप में नहीं, बल्कि भक्ति और समर्पण के एक महान प्रतीक के रूप में देखा जाता है। रामायण का वह प्रसंग अत्यंत प्रेरणादायक है जब भगवान श्रीराम की वानर सेना लंका जाने के लिए रामसेतु का निर्माण कर रही थी। जहाँ विशाल वानर बड़ी-बड़ी शिलाएँ उठा रहे थे, वहीं एक नन्ही गिलहरी अपने सामर्थ्य अनुसार छोटे कंकड़, मिट्टी लाकर अपना योगदान दे रही थी। जब कुछ वानरों ने उसका उपहास किया, तब भगवान राम ने उसकी निष्काम सेवा और प्रयास को सराहा और प्रेमपूर्वक उसकी पीठ सहलाई। माना जाता है कि भगवान की उंगलियों के वे निशान आज भी गिलहरी की पीठ पर तीन धारियों के रूप में दिखाई देते हैं, जो यह सिखाते हैं कि कोई भी कार्य छोटा नहीं होता। हमारी पारिस्थितिकी के नन्हे माली:- गिलहरियों को प्रकृति का माली कहा जाता है, और इसके पीछे एक ठोस वैज्ञानिक कारण है। गिलहरियों की आदत होती है कि वे भविष्य के लिए बीज और मेवे (जैसे अखरोट या बादाम) ज़मीन में गाड़ कर छिपा देती हैं। अक्सर वे इन स्थानों को भूल जाती हैं, और यही भूल प्रकृति के लिए वरदान साबित होती है। मिट्टी में दबे ये बीज अंकुरित होकर नए पौधों और पेड़ों का रूप ले लेते हैं, जिससे पुनर्वनीकरण (रि-फोरेस्टेशन) में प्राकृतिक रूप से मदद मिलती है। इसके अलावा, गिलहरियाँ हानिकारक कीटों और लार्वा को खाकर फसलों और पेड़ों की रक्षा करती हैं और स्वयं भी खाद्य श्रृंखला (फूड चेन) का एक महत्वपूर्ण हिस्सा हैं, जो कई बड़े पक्षियों और वन्यजीवों का आहार बनती हैं। मलय (विशालकाय) गिलहरी: अस्तित्व पर संकट:- गिलहरियों की विभिन्न प्रजातियों में रतुफा बाइकलर (मलय विशालकाय गिलहरी) विशेष स्थान रखती है। यह विश्व की सबसे बड़ी गिलहरी प्रजातियों में से एक है और भारत के पूर्वोत्तर राज्यों (सिक्किम, असम, अरुणाचल, मेघालय आदि) में पाई जाती है। इसे वन स्वास्थ्य का संकेतक माना जाता है, क्योंकि इसकी उपस्थिति एक समृद्ध पारिस्थितिकी तंत्र का प्रमाण है। दुर्भाग्यवश, बढ़ते शहरीकरण, वनों की कटाई और पूर्वोत्तर भारत में प्रचलित झूम कृषि (स्लांट एंड बर्न एग्रीकल्चर) के कारण इनका अस्तित्व खतरे में है। एक डरावना अनुमान यह है कि यदि आवास क्षति इसी तरह जारी रही, तो 2050 तक इनका अनुकूल क्षेत्र मात्र 2.94% ही शेष रह जाएगा। पिछले दो दशकों में इनकी आबादी में लगभग 30% की गिरावट दर्ज की गई है। संरक्षण का आह्वान:- आज के समय में औद्योगिकीकरण और प्रदूषण ने इन नन्हे जीवों के प्राकृतिक आवासों को उजाड़ दिया है। स्क्विरल एप्रिसिएशन डे हमें याद दिलाता है कि पर्यावरण की सुरक्षा केवल बड़े जानवरों या जंगलों तक सीमित नहीं है, बल्कि गिलहरी जैसे छोटे जीवों का संरक्षण भी उतना ही अनिवार्य है। हमें उनके प्रति संवेदनशील व्यवहार अपनाना चाहिए, उनके लिए भोजन और पानी की व्यवस्था करनी चाहिए और सबसे महत्वपूर्ण रूप से पेड़ों को कटने से बचाना चाहिए। गिलहरियों का संरक्षण वास्तव में हमारे वनों और हमारी भावी पीढ़ियों के पर्यावरण का संरक्षण है। अंत में सार रूप में यही कहूंगा गिलहरी प्रशंसा दिवस हमें सिखाता है कि प्रकृति के चक्र में हर छोटा जीव जरूरी है। गिलहरियाँ न केवल पर्यावरण की सुंदरता बढ़ाती हैं, बल्कि अनजाने में बीज बोकर नए जंगल उगाने में नन्हे माली की भूमिका निभाती हैं। आज बढ़ते प्रदूषण और जंगलों की कटाई के कारण उनका जीवन खतरे में है। यह दिन हमें याद दिलाता है कि हम इन बेजुबान जीवों के प्रति दयालु बनें और पेड़ लगाकर उनके घरों को सुरक्षित रखें। गिलहरियों को बचाना दरअसल अपनी प्रकृति और भविष्य को बचाना है। (सुनील कुमार महला, फ्रीलांस राइटर, कॉलमिस्ट व युवा साहित्यकार, पिथौरागढ़, उत्तराखंड।) ईएमएस / 20 जनवरी 26