-हर्जाना चुकाने में असमर्थ क्षेत्रों को अंग्रेजों ने जम्मू के राजा गुलाब सिंह को बेच दिया नई दिल्ली,(ईेएमएस)। जम्मू और कश्मीर का गठन किसी स्वाभाविक राजनीतिक प्रक्रिया का परिणाम नहीं, बल्कि युद्ध, विश्वासघात और औपनिवेशिक सौदेबाजी की उपज था। इसकी नींव 1845–46 के पहले एंग्लो–सिख युद्ध में पड़ी, जब सिख साम्राज्य की कमजोर होती शक्ति और ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी की विस्तारवादी नीति आमने-सामने आ गईं। महाराजा रणजीत सिंह की मृत्यु के बाद सिख साम्राज्य आंतरिक कलह और नेतृत्व संकट से जूझ रहा था। ब्रिटिशों ने पंजाब की सीमाओं पर अपनी सैन्य गतिविधियां तेज कर दीं। खतरे को भांपते हुए खालसा सेना ने सतलुज नदी पार की, लेकिन युद्ध के शुरुआती चरणों में उसे पराजय का सामना करना पड़ा। फरवरी 1846 तक सिख सेना सतलुज के दक्षिण में केवल सोबरांव गांव के पास एक मजबूत मोर्चे तक सिमट गई थी। करीब 35 हजार खालसा सैनिक, भारी तोपखाने और किलेबंदी के साथ यहां डटे थे। 10 फरवरी 1846 की सुबह जैसे ही कोहरा छंटा, ब्रिटिश तोपों ने भीषण गोलाबारी शुरू कर दी। घंटों चली इस मारक कार्रवाई के बाद ब्रिटिश पैदल सेना ने मोर्चों पर धावा बोला। प्रतिरोध असाधारण था। सिख तोपचियों और पैदल सैनिकों ने अंतिम सांस तक लड़ाई लड़ी। ब्रिटिश अधिकारियों ने माना कि उन्होंने ऐसी हताश वीरता पहले कभी नहीं देखी थी, लेकिन निर्णायक क्षण तब आया, जब सतलुज पर बना नावों का पुल टूट गया जो सिख सैनिकों का एकमात्र पलायन मार्ग था। पुल टूटते ही हजारों सिख सैनिक उफनती नदी और ब्रिटिश गोलाबारी के बीच फंस गए। कई सैनिकों ने आत्मसमर्पण के बजाय डूबकर मरना स्वीकार किया। ब्रिटिश घोड़ा-तोपखाने ने नदी में संघर्ष कर रहे सैनिकों पर भी गोलियां बरसाईं। इस युद्ध में कम से कम 10 हजार सिख सैनिक मारे गए थे, जो घायल हुए या डूब गए। यह खालसा सेना के इतिहास का सबसे भीषण विनाश था। पुल टूटने को लेकर आज भी विवाद है। ब्रिटिश दस्तावेज इसे दुर्घटना बताते हैं, जबकि सिख परंपराओं में तत्कालीन सेनापति तेज सिंह पर जानबूझकर पुल तुड़वाने का आरोप लगाया जाता है। लाल सिंह और तेज सिंह की भूमिका को लेकर इतिहासकारों के बीच आज भी तीखी बहस जारी है। सोबरांव के बाद ब्रिटिश सेना बिना किसी बड़े प्रतिरोध के लाहौर पहुंच गई। 9 मार्च 1846 को लाहौर की संधि पर हस्ताक्षर हुए। शर्तें अपमानजनक थीं। जालंधर दोआब और पहाड़ी क्षेत्र ब्रिटिशों को सौंपे गए, 1.5 करोड़ रुपए का युद्ध हर्जाना लगाया और खालसा सेना को करीब निष्क्रिय कर दिया गया। लाहौर दरबार व्यावहारिक रूप से ब्रिटिश नियंत्रण में आ गया। हर्जाना चुकाने में असमर्थ सिख राज्य से मिले क्षेत्रों को ब्रिटिशों ने महज सात दिन बाद, 16 मार्च 1846 को जम्मू के राजा गुलाब सिंह को बेच दिया। अमृतसर की संधि के तहत कश्मीर घाटी समेत विशाल पहाड़ी क्षेत्र 75 लाख नानकशाही रुपये में उनके हवाले कर दी। लाखों लोगों की आबादी वाली भूमि को संपत्ति की तरह खरीदा-बेचा गया। ब्रिटिशों को इससे तीन लाभ मिले- युद्ध खर्च की भरपाई, दुर्गम पहाड़ी इलाकों के सीधे प्रशासन से मुक्ति और उत्तर-पश्चिम में एक बफर राज्य। गुलाब सिंह को एक नया साम्राज्य मिला। इस प्रकार जम्मू और कश्मीर- जो पहले अलग-अलग प्रशासनिक इकाइयां थीं- एक औपनिवेशिक सौदे के जरिए स्थायी रूप से एक राज्य में बंध गईं। युद्ध, खूनखराबे और कूटनीतिक चालों से जन्मा जम्मू-कश्मीर आज भी इतिहास के उन घावों को अपने अंदर समेटे हुए है, जिनकी गूंज डेढ़ सदी बाद भी सुनाई देती है। सिराज/ईएमएस 21 जनवरी 2026