- रुपया-शेयर बाज़ार वेंटिलेटर पर पिछले कुछ दिनों से भारतीय अर्थ व्यवस्था के संकेत एक गहरी चिंता की ओर इशारा कर रहे हैं। डॉलर के मुकाबले रुपये में निरंतर गिरावट, पिछले एक सप्ताह में शेयर बाज़ार से विदेशी निवेशकों द्वारा पैसा निकालना एवं भारतीय निवेशकों द्वारा शेयर बाजार में पैसा डालने के बाद भी शेयर बाजार में निरंतर गिरावट देखने को मिल रही है। शेयर बाजार के असामान्य उतार-चढ़ाव ने न केवल देशी निवेशकों की नींद उड़ा दी है, बल्कि सरकार और आर्थिक नीति-निर्माताओं के लिए भी गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। हालात ऐसे बन गए हैं, रुपये को संभालने के लिए रिज़र्व बैंक को बार-बार बाज़ार में डॉलर के मुकाबले रुपए की गिरावट को रोकने के लिए हस्तक्षेप करना पड़ रहा है। इसके बाद भी रुपए की गिरावट थमने का नाम नहीं ले रही। बुधवार को डॉलर के मुकाबले रुपया 91. 73 पर आ गया। इससे भारतीय अर्थव्यवस्था को गहरा नुकसान उठाना पड़ रहा है। भारत का व्यापार घाटा लगातार बढ़ रहा है। आयात ज्यादा हो रहा है, उसके मुकाबले में निर्यात बहुत कम है। जिसके कारण विदेशी मुद्रा का संकट लगातार बढ़ रहा है। शेयर बाज़ार का सेंसेक्स और निफ्टी बुधवार को दिन भर सैकड़ों अंकों की गिरावट के साथ झूलता रहा। संस्थागत वित्तीय निवेशकों ने भारी निवेश करके निफ्टी को 25157 तथा बीएसई के सेंसेक्स को 270.64 अंकों की गिरावट के साथ 81124 पर रोकने में सफल हुए। विदेशी संस्थागत निवेशक (एफआईआई) लगातार शेयर बाजार से पूंजी निकाल रहे हैं। जिससे शेयर बाज़ार पर दबाव और बढ़ गया है। रुपये की कमजोरी को कभी निर्यात के लिए फायदेमंद बताया जाता था। ज़मीनी हकीकत इसके विपरीत है। भारत का निर्यात उस अनुपात में नहीं बढ़ा, जिस मात्रा में आयात बढा है। जिसके कारण डॉलर के मुकाबले रुपए का तेजी के साथ अवमूल्यन हो रहा है। इसका मतलब साफ है। कमज़ोर रुपया अपने आप में समाधान नहीं, बल्कि निर्यात को और विदेश में पढ़ने वाले बच्चों के लिए सबसे बड़ा आर्थिक संकट है। वहीं विदेशी सामान भारत में ज्यादा मात्रा में आयात हो रहा है उसके कारण भारत में कीमतें बढ़ रही हैं। आर्थिक मोर्चे पर सरकारी खजाने की स्थिति भी दबाव में दिख रही है। जीएसटी, आयकर और कॉर्पोरेट टैक्स का संग्रह लक्ष्य से कम है। उपभोक्ता मांग कमजोर पड़ने से खरीददारी घट रही है। इसका सीधा असर टैक्स कलेक्शन पर पड़ रहा है। सरकार को बैंकों और आरबीआई के डिविडेंड पर निर्भर होना पड़ रहा है। सरकारी खजाने की हालत को सुधारने के लिए पेट्रोल-डीज़ल पर करों की संभावित बढ़ोतरी और कस्टम ड्यूटी जैसे निर्णय सरकारी खजाने को राहत तो दे सकते हैं, लेकिन यह दीर्घकालिक समाधान नहीं होगा। सोना, चांदी और डॉलर की कीमतों की तेजी ने सरकार को चिंता में डाल दिया है। निवेशकों और आम जनता का झुकाव सुरक्षित निवेश की ओर होना यह बताता है, कि शेयर बाज़ार और बैंकों के भविष्य को लेकर निवेशकों को अब भरोसा नहीं रहा। बैंकिंग सेक्टर पर दबाव लगातार बढ़ रहा है। बैंकों में गिरते डिपॉजिट और बढ़ता कर्ज बैंकों की अर्थव्यवस्था की अनिश्चिता को बढ़ा रहे हैं। भारतीय अर्थ व्यवस्था धीरे-धीरे “वेंटिलेटर” में जाने की स्थिति में दिख रही है। वर्तमान स्थिति को देखते हुए सरकार के नीति-निर्माताओं को ज़मीनी सच्चाइयों को स्वीकार करना होगा। ऊँची जीडीपी ग्रोथ या भविष्य के बड़े काल्पनिक लक्ष्यों की बातें करके अर्थव्यवस्था को सुधारा नहीं जा सकता है। केंद्र सरकार और रिजर्व बैंक को आर्थिक नीतियों में सुधार, भरोसेमंद राजकोषीय नीति, शेयर बाजार और वित्तीय संस्थानों पर देसी एवं विदेशी निवेशकों का विश्वास बढ़ाना होगा। आम जनता की क्रय-शक्ति को बढ़ाने के लिए नीतियां बनानी होंगी। अर्थव्यवस्था को मजबूत करने और संकट से निकालने के लिए गंभीरता के साथ काम करना होगा। सरकार को वास्तविकता को स्वीकार करना होगा। स्नो- पाउडर लगाकर मेकअप के पीछे वास्तविक कमज़ोरियों को छुपाने से स्थिति और भी खराब होगी। 1 फरवरी को सरकार जो बजट पेश करने जा रही है, उस बजट को वास्तविकता के धरातल पर तैयार किया जाए। यदि ऐसा नहीं हुआ तो बजट के बाद सरकार, रिजर्व बैंक, बैंकिंग सेक्टर और नीति आयोग के लिए स्थितियों को संभालना आसान नहीं होगा। ईएमएस/22/01/2026