आज विश्व एक ऐसे मोड़ पर खड़ा है जहाँ आर्थिक अस्थिरता, व्यापार युद्ध, जलवायु संकट और सामाजिक असमानता एक साथ गहराते जा रहे हैं। इसी पृष्ठभूमि में रिस्पांसिबल नेशंस इंडेक्स (आरएनआई) का आना केवल एक रैंकिंग नहीं, बल्कि वैश्विक व्यवस्था के लिए एक वैचारिक चेतावनी है। इस सूचकांक में भारत का 154 देशों में 16वां स्थान प्राप्त करना बताता है कि जिम्मेदारी आधारित विकास मॉडल आज भी प्रासंगिक और आवश्यक है। इस रैंकिंग को डब्लयू आईएफ. जवाहरलाल नेहरु विश्वविघालय और आई आई एम मुंबई ने तैयार किया है। ये एक ऐसा दस्तावेज है जो अस्थिरता के दौर से गुजर रही दुनिया को जिम्मेदारी की एक नई सोच तैयार करने में मदद कर सकती है। खासतौर पर इस समय फिर से ये सोचने की जरुरत है कि विकास का माडल किस तरह से पर्यावरण पूरक और सर्व समावेशी तैयार किया जायेगा जो सतत विकास और सबके विकास के लिए काम आ सके । सो सुख राम नाम अस धामा अखिल लोक दयाक विश्राम।। राम जमन जग मंगल हेतू सत्य संघ पालक श्रुति सेतु।। पौराणिक साहित्य के अनुसार प्रभु श्री राम का जन्म राज करने के लिए नहीं बल्कि समस्त जगत के कल्याण के लिए हुआ था और उसी के अनुरुप उन्होंने लोगों को साथ लेकर समाज के लिए कार्य किया। इसी सोच के साथ ही ये नयी इंडेक्स तैयार की गयी है। पिछले कुछ दशकों में दुनिया ने जिस पूंजीवादी मॉडल को अपनाया, वह मुनाफे, उपभोग और प्रतिस्पर्धा पर आधारित रहा। लेकिन आज वही मॉडल गंभीर सवालों के घेरे में है। अमेरिका जैसी महाशक्ति द्वारा एकतरफा टैरिफ नियम, संरक्षणवादी नीतियाँ और आर्थिक दबाव बनाने की रणनीति ने वैश्विक बाजार में अस्थिरता पैदा की है। इसके दुष्परिणाम विकासशील देशों के साथ-साथ आम नागरिकों को भी झेलने पड़ रहे हैं। ऐसे समय में रिस्पांसिबल नेशंस इंडेक्स यह स्पष्ट करता है कि किसी देश की ताकत केवल उसकी GDP, सैन्य क्षमता या बाजार नियंत्रण से नहीं मापी जा सकती। असली ताकत इस बात में है कि वह अपने नागरिकों, पर्यावरण और वैश्विक समुदाय के प्रति कितना उत्तरदायी है। यही कारण है कि अमेरिका और चीन जैसी आर्थिक महाशक्तियाँ इस सूचकांक में पीछे हैं, जबकि सिंगापुर, स्विट्जरलैंड और डेनमार्क जैसे देश शीर्ष पर हैं। आज वैश्विक पूंजीवाद का स्वरूप ऐसा हो गया है जिसमें कुछ देश नियम बनाते हैं और बाकी दुनिया को उन्हें मानने के लिए मजबूर किया जाता है। अमेरिका द्वारा समय-समय पर लगाए जाने वाले एकतरफा टैरिफ केवल व्यापारिक फैसले नहीं, बल्कि वैश्विक आर्थिक असंतुलन को बढ़ाने वाले कदम हैं। इससे छोटे और मध्यम देशों की अर्थव्यवस्थाएँ कमजोर होती हैं और वैश्विक सहयोग की भावना को नुकसान पहुँचता है। भारत का इस इंडेक्स में आगे रहना इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि भारत ने विकास के साथ-साथ समावेशी सोच, सामाजिक न्याय, और अंतरराष्ट्रीय सहयोग को महत्व दिया है। भारत की विदेश नीति “वसुधैव कुटुम्बकम्” की भावना पर आधारित रही है, जो आज की स्वार्थ-प्रधान वैश्विक राजनीति में एक वैकल्पिक रास्ता दिखाती है। रिस्पांसिबल नेशंस इंडेक्स के तीन मुख्य आधार—आंतरिक जिम्मेदारी, पर्यावरण जिम्मेदारी और बाहरी जिम्मेदारी—आज की दुनिया की सबसे बड़ी जरूरत हैं। जलवायु परिवर्तन, युद्ध, आर्थिक असमानता और सामाजिक असंतोष जैसी समस्याएँ तभी सुलझेंगी जब देश केवल अपने फायदे के बजाय सामूहिक भलाई के बारे में सोचेंगे। यह भी उल्लेखनीय है कि इस सूचकांक को तैयार करने में जेएनयू और आईआईएम मुंबई जैसे भारतीय संस्थानों का योगदान रहा। यह दिखाता है कि भारत न केवल नीति-निर्माण में, बल्कि वैचारिक नेतृत्व में भी वैश्विक भूमिका निभा सकता है। आज जरूरत इस बात की है कि दुनिया जिम्मेदारी आधारित पूंजीवाद की ओर बढ़े—जहाँ मुनाफा जरूरी हो, लेकिन मानवता, पर्यावरण और शांति की कीमत पर नहीं। अगर वैश्विक व्यवस्था इसी तरह एकतरफा फैसलों और आर्थिक दबावों पर चलती रही, तो अस्थिरता और टकराव बढ़ते जाएंगे। अंततः, रिस्पांसिबल नेशंस इंडेक्स हमें यह सोचने पर मजबूर करता है कि क्या हम केवल ताकतवर बनना चाहते हैं या सच में जिम्मेदार राष्ट्र भी। आज की आर्थिक उथल-पुथल में यही नई सोच दुनिया को एक स्थिर, न्यायपूर्ण और टिकाऊ भविष्य की ओर ले जा सकती है। रैंकिंग जो ताकत नहीं, जिम्मेदारी मापती है रिस्पांसिबल नेशंस इंडेक्स की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह देशों को जीडीपी, सैन्य शक्ति या बाजार प्रभुत्व के आधार पर नहीं आंकता। इसके बजाय यह देखता है कि कोई देश— • अपने नागरिकों के जीवन स्तर को कितना बेहतर बनाता है, • पर्यावरण संरक्षण के प्रति कितना गंभीर है, • और वैश्विक शांति व सहयोग में कितना योगदान देता है। इस इंडेक्स को तैयार करने में तीन वर्षों तक काम किया गया और इसमें विश्व बैंक, संयुक्त राष्ट्र एजेंसियों तथा वर्ल्ड जस्टिस प्रोजेक्ट जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों के आंकड़ों का उपयोग किया गया। भारत से जेएनयू और आईआईएम मुंबई जैसे शैक्षणिक संस्थानों ने इसमें बौद्धिक सहयोग दिया। सूचकांक तीन मुख्य आधारों पर टिका है— 1. आंतरिक जिम्मेदारी 2. पर्यावरणीय जिम्मेदारी 3. बाहरी / वैश्विक जिम्मेदारी इन तीन आधारों को मापने के लिए सात प्रमुख पैमाने तय किए गए हैं— • क्वालिटी ऑफ लाइफ • सुशासन • सामाजिक न्याय और सशक्तीकरण • आर्थिक दक्षता • पर्यावरण संरक्षण • शांति के लिए प्रतिबद्धता • अंतरराष्ट्रीय आर्थिक संबंध इन सात पैमानों के अंतर्गत कुल 58 संकेतकों के माध्यम से अंतिम स्कोर तय किया गया है। यही कारण है कि यह रैंकिंग केवल आंकड़ों का खेल नहीं, बल्कि नीतिगत और नैतिक मूल्यांकन भी है। अमेरिका, टैरिफ युद्ध और वैश्विक अस्थिरता आज की वैश्विक आर्थिक उथल-पुथल का एक बड़ा कारण एकतरफा आर्थिक फैसले हैं। अमेरिका द्वारा समय-समय पर लगाए जाने वाले टैरिफ, संरक्षणवादी नीतियाँ और “अमेरिका फर्स्ट” जैसी सोच ने वैश्विक व्यापार व्यवस्था को कमजोर किया है। इन नीतियों का असर केवल चीन या यूरोप तक सीमित नहीं रहता, बल्कि विकासशील देशों की अर्थव्यवस्थाएँ भी इससे बुरी तरह प्रभावित होती हैं। जब दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था नियम तोड़कर नियम बनाती है, तो वैश्विक पूंजीवाद का संतुलन बिगड़ता है। यही कारण है कि अमेरिका जैसी आर्थिक महाशक्ति इस जिम्मेदारी आधारित सूचकांक में 66वें स्थान पर है। यह दर्शाता है कि ताकत और जिम्मेदारी के बीच बड़ा अंतर पैदा हो चुका है। भारत की रैंकिंग और वैकल्पिक विकास मॉडल भारत का 16वां स्थान केवल एक उपलब्धि नहीं, बल्कि एक संकेत है कि भारत का विकास मॉडल वैश्विक बहस में एक विकल्प पेश करता है। भारत ने आर्थिक विकास के साथ-साथ— • सामाजिक समावेशन, • लोकतांत्रिक मूल्यों, • और अंतरराष्ट्रीय सहयोग को प्राथमिकता दी है। “वसुधैव कुटुम्बकम्” की अवधारणा केवल कूटनीतिक नारा नहीं, बल्कि भारत की वैश्विक सोच का आधार है। जी-20 की अध्यक्षता से लेकर जलवायु मुद्दों तक, भारत ने यह दिखाया है कि जिम्मेदारी और विकास साथ-साथ चल सकते है। (डायरेक्टर आईआईएम मुंबई ) ईएमएस / 22 जनवरी 25