अंतर्राष्ट्रीय
22-Jan-2026
...


दावोस(ईएमएस)। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एक बार फिर अपनी अपरंपरागत कूटनीति से वैश्विक राजनीति के स्थापित समीकरणों को हिला कर रख दिया है। स्विट्जरलैंड के दावोस में जारी हलचल के बीच यह साफ हो गया है कि ट्रंप द्वारा परिकल्पित बोर्ड ऑफ पीस अब एक वास्तविकता बनने जा रहा है। बुधवार को दुनिया के आठ सबसे प्रभावशाली मुस्लिम देशों—सऊदी अरब, तुर्की, मिस्र, जॉर्डन, इंडोनेशिया, पाकिस्तान, कतर और संयुक्त अरब अमीरात—ने आधिकारिक तौर पर इस बोर्ड में शामिल होने की घोषणा कर दी है। ये सभी देश अपने उच्च-स्तरीय प्रतिनिधियों को इस मंच पर भेजेंगे, जिसे संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के एक विशेष आदेश के तहत गाजा में युद्ध के बाद की व्यवस्था और पुनर्निर्माण की निगरानी के लिए गठित किया गया है। हालांकि इस बोर्ड की प्राथमिक समय सीमा 2027 तक तय की गई है, लेकिन ट्रंप की महत्वाकांक्षाएं इससे कहीं अधिक व्यापक हैं। वह इसे केवल गाजा तक सीमित न रखकर दुनिया भर के पुराने और जटिल विवादों को सुलझाने वाले एक स्थायी वैश्विक मंच के रूप में स्थापित करना चाहते हैं। इस पहल की सबसे अनूठी और विवादास्पद शर्त यह है कि ट्रंप स्वयं इस बोर्ड की आजीवन अध्यक्षता करेंगे। साथ ही, इसके स्थायी सदस्य बनने के लिए प्रत्येक देश को एक अरब डॉलर की भारी-भरकम सदस्यता फीस भी देनी होगी। ट्रंप की इस रणनीति को एक बड़ी कूटनीतिक जीत के रूप में देखा जा रहा है, विशेष रूप से सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान को इस मंच पर लाने में उनकी सफलता ने अंतरराष्ट्रीय विश्लेषकों को हैरान कर दिया है। ट्रंप ने दावोस में एक बड़ा खुलासा करते हुए यह भी बताया कि रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने भी इस बोर्ड में शामिल होने का न्योता स्वीकार कर लिया है। अपने चिर-परिचित अंदाज में ट्रंप ने कहा कि इस बोर्ड में केवल वही लोग शामिल होंगे जिनके पास वास्तविक सत्ता और प्रभाव है। उन्होंने तर्क दिया कि शांति स्थापित करने के लिए उन ताकतों का साथ होना जरूरी है जो जमीन पर बदलाव लाने की क्षमता रखती हैं। इसी बीच, गाजा से जुड़े रोजमर्रा के फैसलों और जमीनी कार्यान्वयन के लिए एक अलग गाजा एग्जीक्यूटिव बोर्ड का गठन किया गया है, जबकि मुख्य बोर्ड साल में केवल कुछ ही बार रणनीतिक बैठकों के लिए जुटेगा। इस नई वैश्विक व्यवस्था को लेकर पश्चिमी देशों और यूरोपीय संघ के भीतर चिंता की लहर भी देखी जा रही है। कुछ राजनयिकों का मानना है कि यह बोर्ड संयुक्त राष्ट्र की भूमिका और उसकी प्रासंगिकता को सीधे तौर पर चुनौती दे सकता है। स्लोवेनिया जैसे देशों ने इस बोर्ड का हिस्सा बनने से साफ इनकार कर दिया है, उनका तर्क है कि यह पहल मौजूदा अंतरराष्ट्रीय ढांचों को कमजोर कर सकती है। वहीं, स्वीडन, नॉर्वे और इटली जैसे देशों ने भी फिलहाल इससे दूरी बना ली है। दूसरी ओर, शामिल होने वाले मुस्लिम देशों ने एक संयुक्त बयान जारी कर स्पष्ट किया है कि उनकी भागीदारी फिलिस्तीनी लोगों के आत्मनिर्णय और एक स्वतंत्र राज्य के अधिकार पर आधारित है। वे इस मंच को क्षेत्र में स्थायी शांति और स्थिरता के एक अवसर के रूप में देख रहे हैं। वर्तमान में लगभग 60 देशों को इस बोर्ड का हिस्सा बनने का न्योता दिया गया है, जिनमें इजरायल, अर्जेंटीना, वियतनाम और हंगरी जैसे देश अपनी सहमति दे चुके हैं। कूटनीति के इस दिलचस्प सफर में वेटिकन को भी आमंत्रित किया गया है, जिस पर पोप की ओर से विचार किया जा रहा है। कुल मिलाकर, बोर्ड ऑफ पीस ने वैश्विक शक्ति संतुलन के एक नए युग की आहट दे दी है। वीरेंद्र/ईएमएस/22जनवरी2026