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24-Jan-2026
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नई दिल्ली, (ईएमएस)। लगातार तीन साल तक अपने खर्चों को काबू में रखने के बाद, भारतीय राज्यों का राजकोषीय घाटा एक बार फिर बढ़ गया है। भारतीय रिजर्व बैंक की ताजा रिपोर्ट के मुताबिक, वित्त वर्ष 2024-25 में राज्यों का कुल घाटा बढक़र जीडीपी के 3.3 प्रतिशत पर पहुंच गया है, जो इससे पहले 3 प्रतिशत से नीचे बना हुआ था। हालांकि, राहत की बात यह है कि घाटे में यह बढ़ोतरी राज्यों की खराब वित्तीय स्थिति के कारण नहीं, बल्कि विकास कार्यों (पूंजीगत निवेश) के लिए केंद्र सरकार से मिले 50 साल के ब्याज-मुक्त कर्ज को लेने की वजह से हुई है। आरबीआई की रिपोर्ट में बताया गया है कि घाटे का 3 प्रतिशत की सीमा से ऊपर जाना अनिवार्य रूप से खराब वित्तीय प्रबंधन का संकेत नहीं है। यह वृद्धि मुख्य रूप से केंद्र सरकार की ओर से पूंजीगत निवेश के लिए राज्यों को विशेष सहायता योजना के तहत दिए गए 50 वर्षीय ब्याज मुक्त ऋणों को दर्शाती है। यह उधारी राज्यों की सामान्य शुद्ध उधार सीमा से ऊपर है, जिसका सीधा असर राजकोषीय आंकड़ों पर पड़ा है। आगामी वित्त वर्ष 2025-26 के लिए भी, राज्यों ने अपने सकल राजकोषीय घाटे को जीडीपी के 3.3 प्रतिशत पर ही बजट किया है। हालांकि इस दौरान राजस्व व्यय को नियंत्रित करके खर्च की संरचना में सुधार करने का लक्ष्य रखा गया है। राज्यों के लिए नई चुनौती और अवसर इस वर्ष की आरबीआई की रिपोर्ट का केंद्रीय विषय भारत में जनसांख्यिकीय संक्रमण - राज्य वित्त के लिए निहितार्थ था। रिपोर्ट में इस बात पर गहराई से प्रकाश डाला गया है कि कैसे विभिन्न राज्यों की बदलती जनसांख्यिकी उनके खजाने को प्रभावित कर रही है। आरबीआई ने राज्यों को उनकी आबादी की उम्र के आधार पर अलग-अलग रणनीतियां अपनाने की सलाह दी है कि युवा राज्यों के पास कामकाजी उम्र की बढ़ती आबादी और मजबूत राजस्व जुटाने की क्षमता का लाभ उठाने का व्यापक अवसर है। आरबीआई ने सुझाव दिया है कि इन राज्यों को अपने डेमोग्राफिक डिविडेंड का लाभ उठाने के लिए मानव पूंजी निवेश को मजबूत करना चाहिए। मध्यवर्ती राज्यों को विकास की प्राथमिकताओं को संतुलित करते हुए भविष्य में आबादी के वृद्ध होने की स्थिति के लिए अभी से तैयारी करनी चाहिए। वृद्ध होते राज्यों के लिए विंडो संकरी हो रही है। उन्हें सिकुड़ते कर आधार (टैक्स आधार) और स्वास्थ्य सेवा व पेंशन जैसी प्रतिबद्ध व्यय से उत्पन्न होने वाले राजकोषीय दबाव का सामना करना पड़ रहा है। आरबीआई ने सलाह दी है कि ऐसे राज्यों को राजस्व क्षमता बढ़ाने के साथ-साथ कार्यबल नीति और पेंशन सुधारों पर ध्यान देना चाहिए। आरबीआई की यह रिपोर्ट साफ करती है कि जहां एक ओर केंद्र की ओर से पूंजीगत व्यय के लिए दिए गए प्रोत्साहन के कारण राजकोषीय घाटा बढ़ा है, वहीं दूसरी ओर राज्यों को अपनी भविष्य की वित्तीय रणनीतियों को अपनी जनसंख्या के स्वरूप के अनुसार ढालना होगा। 2025-26 के बजट अनुमानों के विश्लेषण के कारण यह रिपोर्ट नीति निर्माताओं के लिए एक रोडमैप के रूप में काम कर सकती है। -सुधार के बाद मामूली बढ़ोतरी के संकेत राज्यों की कुल देनदारियों के मोर्चे पर रिपोर्ट मिश्रित लेकिन सकारात्मक संकेत देती है। मार्च 2021 के अंत में राज्यों की समेकित देनदारियां जीडीपी के 31 प्रतिशत के शिखर पर थीं, जो वित्तीय समेकन के प्रयासों और अनुकूल ऋण गतिशीलता के कारण मार्च 2024 के अंत तक घटकर 28.1 प्रतिशत रह गईं। हालांकि, मार्च 2026 के अंत तक इन देनदारियों के बढक़र जीडीपी के 29.2 प्रतिशत होने का अनुमान बजट में लगाया गया है। बावजूद इसके, केंद्रीय बैंक ने जोर देकर कहा है कि कर्ज का स्तर ऊंचा होने के बाद भी, ऋण स्थिरता के संकेतक अनुकूल बने हुए हैं।