लेख
25-Jan-2026
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दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था माने जाने वाले अमेरिका की वित्तीय स्थिति गंभीर सवालों के घेरे में है। अमेरिकी ट्रेज़री से जिस तेज़ी के साथ विदेशी पूंजी की निकासी हो रही है, जिस अनुपात में नया निवेश नहीं आ रहा है उसने अमेरिका के साथ-साथ वैश्विक आर्थिक व्यवस्था को अस्थिरता में धकेल दिया है। अमेरिकी प्रतिबंधों के डर और अमेरिका द्वारा कई देशों की संपत्तियों की जब्ती की कार्यवाही को देखते हुए दुनिया के कई देशों और निवेशकों ने अपना पैसा अमेरिका की ट्रेजरी से निकालना शुरू कर दिया है। अमेरिकी ट्रेजरी में बांड के रूप में किए गए निवेश को अधिकांश देश निकाल रहे हैं। वैश्विक स्तर पर यह आशंका व्यक्त की जा रही है, कि अमेरिका में रखा उनका पैसा अब सुरक्षित नहीं है। अमेरिका पर सार्वजनिक कर्ज़ 34 ट्रिलियन डॉलर पर पहुँच चुका है। पिछले वर्षों में अमेरिकी ट्रेज़री में विभिन्न देशों की सरकारों और संस्थाओं का जमा लगातार घट रहा है। एक समय अमेरिका को सुरक्षित निवेश का सबसे बड़ा ठिकाना माना जाता था। अमेरिका द्वारा रूस, अफगानिस्तान और ईरान पर लगाए गए प्रतिबंधों के बाद उन देशों की संपत्ति और जमा राशि को जब्ती की कार्यवाही करके दुनिया के अन्य देशों के भरोसे को बड़ी चोट पहुँचाई है। नतीजतन, यूरोप, चीन, भारत सहित दर्जनों देशों ने अमेरिकी ट्रेज़री बॉन्ड से दूरी बनानी शुरू कर दी है। अमेरिका और ब्रिटेन में जो सोना अन्य देशों ने जमा करके रखा था, उसे भी अब वापस लाया जा रहा है। दुनिया के कई देशों ने अमेरिकी बांड से राशि निकालकर सोने के रूप में निवेश करने का नया विकल्प तलाश लिया है। सभी देश डॉलर मुद्रा में जमा धन सोने के रूप में कन्वर्ट करके अपने देश के सेंट्रल बैंक में सुरक्षित रख रहे हैं। जिसके कारण अमेरिका की आर्थिक स्थिति लगातार खराब हो रही है। डोनाल्ड ट्रंप की आक्रामक व्यापार नीति, टैरिफ युद्ध, और बार-बार प्रतिबंधों की धमकी तथा मनमाने निर्णय लेने के कारण दुनिया के देशों में अमेरिका की विश्वसनीयता लगभग खत्म हो गई है। अमेरिका की टैक्स एवं आर्थिक नीति में अनिश्चितता के कारण विदेशी निवेशक अमेरिका की ट्रेजरी में नए बॉन्ड खरीदने से हिचक रहे हैं। अमेरिका की ट्रेजरी में बहुत बड़ी राशि के पुराने बॉन्ड की समय-सीमा पूर्ण होने जा रही है। अमेरिका की ट्रेजरी पर बांड में जमा राशि लौटाने का दबाव बन रहा है। अमेरिकी ट्रेजरी से धन की निकासी बड़े पैमाने पर हो रही है। ट्रेजरी से जिस राशि का भुगतान किया जा रहा है, उस भुगतान की राशि का 25 फ़ीसदी धन भी अमेरिकी ट्रेजरी में जमा नहीं हो रहा है। अमेरिकी ट्रेजरी में जमा कम और निकासी अधिक होने से अमेरिका की अर्थव्यवस्था खतरनाक संकट की ओर आगे बढ़ रही है। इस संकट का असर केवल अमेरिका तक सीमित नहीं रहेगा। जब अमेरिका जैसी बड़ी अर्थव्यवस्था दबाव में आती है। इसका असर पूरी दुनिया पर पड़ना तय है। वैश्विक विकास-दर पहले ही सुस्त पड़ चुकी है। महँगाई, ऊँची ब्याज दरें और निवेश में गिरावट के कारण दुनिया के सभी देशों में आम लोगों की क्रय शक्ति लगातार घट रही है। लोगों के पास जरूरी खर्च करने के लिए भी पर्याप्त राशि नहीं है। नागरिकों की बचत खत्म हो गई है। नागरिकों के ऊपर कर्ज का बोझ लगातार बढ़ता चला जा रहा है, जिससे सभी देशों में मांग कमजोर हो रही है। जिसके कारण आर्थिक मंदी की आशंका गहराती जा रही है। आज दुनिया के अधिकांश देश भारी कर्ज़ के बोझ में दबे हैं। यदि अमेरिका जैसी केंद्रीय अर्थव्यवस्था की स्थिति कमजोर होती है। ऐसी स्थिति में वैश्विक वित्तीय व्यवस्था में हाहाकार मचना तय है। वैश्विक स्तर पर जिस तरह से युद्ध के हालात बने हुए हैं, वैश्विक व्यापार संधि भी टैरिफ के कारण खतरे में है। अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने जिस तरह से वैश्विक व्यापार संधि को नजरअंदाज करते हुए टैरिफ का नया युद्ध शुरू किया है, वह अमेरिका के साथ-साथ सारी दुनिया के देशों के लिए नए संकट के रूप में सामने है। किसी भी देश की ताकत उसकी आर्थिक एवं सैन्य शक्ति से नहीं तय की जा सकती है। ताकतवर देश के ऊपर भरोसे, स्थिरता और जिम्मेदार नीतियां उस देश को ताकतवर बनाती हैं। अमेरिका के सामने यही सबसे बड़ी चुनौती है। ट्रंप के राष्ट्रपति बनने के बाद से विश्वास, अब अविश्वास में बदल गया है। अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को अब गैंगस्टर के रूप में पहचाना जा रहा है। जिसके कारण अमेरिका पर पहले जो विश्वास था, वह तेजी के साथ खत्म हो रहा है। अमेरिकी राष्ट्रपति की वर्तमान नीतियों के कारण सारी दुनिया के लिए एक नई चुनौती खड़ी हो गई है। दुनिया का खोया हुआ विश्वास, अमेरिका कैसे प्राप्त करेगा, इसको लेकर तरह-तरह की आशंका दुनिया के देशों में देखने को मिल रही है। अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अपनी सनक के कारण सारी दुनिया के देशों से न केवल दूरियां बढ़ा ली हैं, वरन अमेरिका की वित्तीय व्यवस्था को भी ऐसी स्थिति में लाकर खड़ा कर दिया है, जहां अमेरिका को अपने आप को बचाने के लिए कडा संघर्ष करना पड़ रहा है। अब देखना यह है, अमेरिका इस चुनौती का मुकाबला किस तरह से करता है। दुनिया के देशों में इसका किस हद तक असर पड़ता है। ईएमएस / 25 जनवरी 26