प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के रेडियो कार्यक्रम मन की बात का 130वां एपिसोड कई मायनों में खास रहा। इस बार का मन की बात केवल सरकारी योजनाओं का विवरण नहीं था बल्कि यह समाज को जोड़ने वाला एक भावनात्मक संवाद भी बना। राष्ट्रीय मतदाता दिवस के अवसर पर प्रधानमंत्री ने लोकतंत्र के मूल में बसे मतदाता की भूमिका को रेखांकित किया और नए वोटरों के स्वागत को सामाजिक उत्सव बनाने का आह्वान किया। इसके साथ ही उन्होंने स्टार्टअप इंडिया की दस साल की यात्रा पर्यावरण संरक्षण जनभागीदारी सांस्कृतिक चेतना और सामूहिक प्रयासों की शक्ति को एक सूत्र में पिरोया। अगर पिछले मन की बात और इस बार के मन की बात की तुलना की जाए तो यह साफ दिखता है कि संवाद का फोकस अब योजनाओं से आगे बढ़कर नागरिक सहभागिता और सामाजिक जिम्मेदारी की ओर गया है। इस बार के मन की बात की शुरुआत मतदाता दिवस की शुभकामनाओं के साथ हुई। प्रधानमंत्री ने कहा कि मतदाता लोकतंत्र की आत्मा होता है। यह कथन केवल एक औपचारिक वाक्य नहीं था बल्कि इसके साथ उन्होंने एक व्यावहारिक और भावनात्मक सुझाव भी दिया। उन्होंने कहा कि जब कोई युवा पहली बार वोटर बनता है तो पूरे मोहल्ले गांव या शहर को मिलकर उसे बधाई देनी चाहिए और मिठाई बांटनी चाहिए। यह विचार अपने आप में नया नहीं है लेकिन इसे राष्ट्रीय मंच से कहना लोकतंत्र को रोजमर्रा के जीवन से जोड़ने का प्रयास है। पिछले मन की बात में जहां अधिक जोर सरकारी पहलों और उपलब्धियों पर रहा था वहीं इस बार लोकतंत्र को सामाजिक संस्कार बनाने की बात सामने आई। पिछले एपिसोड में प्रधानमंत्री ने विकास योजनाओं और राष्ट्रीय उपलब्धियों का उल्लेख किया था। वहां स्वर अधिकतर सूचनात्मक था। इस बार का स्वर अधिक सहभागी और प्रेरक दिखा। मतदाता को केवल एक अधिकारधारी नागरिक नहीं बल्कि लोकतांत्रिक संस्कृति का वाहक बताया गया। यह बदलाव बताता है कि मन की बात अब केवल सरकार की बात नहीं रह गई है बल्कि समाज की बात बनने की दिशा में आगे बढ़ रही है। स्टार्टअप इंडिया पर प्रधानमंत्री की बात इस एपिसोड का एक और मजबूत स्तंभ रही। उन्होंने कहा कि आज भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा स्टार्टअप इकोसिस्टम बन चुका है। दस साल पहले जिन क्षेत्रों की कल्पना भी कठिन थी आज उन्हीं क्षेत्रों में भारतीय युवा नेतृत्व कर रहे हैं। एआई स्पेस सेमीकंडक्टर ग्रीन हाइड्रोजन बायोटेक्नोलॉजी और मोबिलिटी जैसे क्षेत्रों का उल्लेख करते हुए उन्होंने युवाओं को सलाम किया। पिछले मन की बात में भी नवाचार का जिक्र हुआ था लेकिन इस बार यह जिक्र स्मृति और गर्व के भाव के साथ आया। सोशल मीडिया पर 2016 की तस्वीरें साझा करने के ट्रेंड को उन्होंने स्टार्टअप इंडिया की शुरुआत से जोड़ा। इससे यह संदेश गया कि बीते दस वर्षों का सफर केवल सरकारी नहीं बल्कि युवाओं का सामूहिक सफर है। यहां भी तुलना करने पर फर्क साफ दिखता है। पहले नवाचार को नीति और योजना के रूप में प्रस्तुत किया गया था। इस बार नवाचार को एक जनआंदोलन और युवा आकांक्षा के रूप में रखा गया। यह बदलाव मन की बात के स्वर को अधिक मानवीय बनाता है। पर्यावरण संरक्षण पर प्रधानमंत्री की बात इस एपिसोड में विशेष महत्व रखती है। उन्होंने तमसा नदी का उदाहरण देते हुए बताया कि कैसे जनभागीदारी से एक नदी को नया जीवन मिला। इसी तरह आंध्र प्रदेश के अनंतपुर में जलाशयों के पुनर्जीवन और हजारों पेड़ों के रोपण का उल्लेख किया। उन्होंने यह भी कहा कि पर्यावरण संरक्षण हमेशा बड़े अभियानों से ही नहीं होता बल्कि छोटे प्रयास भी बड़ा बदलाव ला सकते हैं। बेनॉय दास और जगदीश प्रसाद अहिरवार जैसे व्यक्तियों का उदाहरण देकर उन्होंने यह दिखाया कि व्यक्तिगत संकल्प भी राष्ट्रीय परिवर्तन का आधार बन सकता है। पिछले मन की बात में पर्यावरण पर चर्चा अधिकतर अभियानों और आंकड़ों तक सीमित थी। इस बार पर्यावरण को लोगों की कहानी के रूप में पेश किया गया। एक पेड़ मां के नाम अभियान का जिक्र करते हुए जब उन्होंने 200 करोड़ पेड़ों की बात कही तो यह केवल संख्या नहीं रही बल्कि सामूहिक चेतना का प्रतीक बन गई। यह फर्क बताता है कि संवाद अब आंकड़ों से भावनाओं की ओर बढ़ रहा है। संस्कृति और परंपरा का विषय भी इस बार अलग रंग में सामने आया। प्रधानमंत्री ने विदेशों में भारतीय त्योहारों की बढ़ती पहचान और मलेशिया के तमिल स्कूलों का उल्लेख किया। उन्होंने भक्ति परंपरा की बदलती अभिव्यक्ति की बात की और बताया कि आज का युवा भक्ति को अपने जीवन अनुभव से जोड़ रहा है। गुजरात के चंदनकी गांव के कम्यूनिटी किचन का उदाहरण सामूहिकता की जीवंत तस्वीर पेश करता है। यह दिखाता है कि भारतीय समाज में सहयोग और सहभागिता की जड़ें कितनी गहरी हैं। पिछले मन की बात में संस्कृति का उल्लेख अधिकतर विरासत और इतिहास के संदर्भ में था। इस बार संस्कृति को जीवित और गतिशील रूप में दिखाया गया। यह बताया गया कि परंपराएं केवल अतीत की धरोहर नहीं बल्कि वर्तमान की ताकत भी हैं। अगर समग्र रूप से देखा जाए तो पिछले मन की बात और इस बार के मन की बात के बीच सबसे बड़ा फर्क दृष्टिकोण का है। पहले जहां सरकार केंद्र में थी वहीं इस बार नागरिक केंद्र में नजर आए। मतदाता युवा स्टार्टअप से जुड़े लोग पर्यावरण के लिए काम करने वाले साधारण नागरिक और विदेशों में संस्कृति को जीवित रखने वाले भारतीय सभी इस संवाद के नायक बने। प्रधानमंत्री ने खुद को सूत्रधार की भूमिका में रखा और समाज को मंच दिया। मन की बात का यह एपिसोड लोकतंत्र नवाचार और पर्यावरण के बीच एक सेतु बनाता है। यह बताता है कि भारत की प्रगति केवल नीतियों से नहीं बल्कि लोगों की भागीदारी से संभव है। मतदाता दिवस पर मिठाई बांटने का सुझाव हो या स्टार्टअप युवाओं को सलाम करने का भाव या फिर नदी और पेड़ों के पुनर्जीवन की कहानियां सभी एक ही संदेश देती हैं। भारत की असली ताकत उसकी सामूहिक चेतना है। इस तुलना से यह निष्कर्ष निकलता है कि मन की बात धीरे धीरे एक सरकारी कार्यक्रम से सामाजिक संवाद का मंच बन रहा है। यह बदलाव ही इसकी सबसे बड़ी उपलब्धि है। लोकतंत्र को उत्सव बनाने की सोच नवाचार को जनआंदोलन बनाने का प्रयास और पर्यावरण को व्यक्तिगत जिम्मेदारी से जोड़ने का संदेश आने वाले समय में समाज पर गहरा असर डाल सकता है। मन की बात का यह बदला हुआ स्वर भारत की बदलती चेतना का प्रतिबिंब है। ईएमएस, 25 जनवरी, 2025