मनुष्य की सहृदयता का कोई जोड़ नहीं है। कोंकण रेलवे का एक स्टेशन है -करमली। करमली स्टेशन एक झील के एक हिस्से में मिट्टी डाल कर बनाया गया है। नतीजा यह हुआ है कि झील दो हिस्से में बंट गया है और अब एक हिस्सा मृतप्राय हो गया है। दरअसल यह ओल्ड गोवा है। करमली स्टेशन से दूर इस नाम का एक गांव है। उस समय के प्रशासकों को ओल्ड गोवा नाम पसंद नहीं आया, इसलिए करमली नाम रख दिया गया। गोवा में पांच साथी थे जो साथ साथ घूम रहे थे। अब हम लोगों को कुडाल जाना था। करमली होकर मांडवी एक्सप्रेस कुडाल जाती है। हम सब पौने नौ बजे सुबह करमली पहुंच गए थे। ट्रेन आने में लगभग घंटे भर की देर थी। गोवा के साथी भी छोड़ने आ गये थे। समय था और कहने के लिए बहुत कुछ था, इसलिए हम सब बातें करने लगे। हम सब की बात एक वेंडर सुनने लगा। वेंडर स्टेशन पर पानी की बोतल और कुछ खाने का सामान बेचता था। सुनते सुनते जब वह आश्वस्त हो गया कि हम सब बिहार के हैं तो उसने पूछा कि आप लोग कहां से आये हैं? हम लोगों ने अपने जिले का नाम बताया। इसके बाद उसने पहले तो चाय पिलाने की कोशिश की और जब संभव नहीं हुआ तो जबर्दस्ती एक बोतल ठंडा पानी पकड़वा दिया। पैसा देने की कोशिश की तो उसने लिया नहीं। दरअसल वह वैशाली जिले का रहने वाला था। जीवनयापन के लिए गोवा में रह रहा था। उसकी तत्परता और स्वागत करने की सदिच्छा गजब की थी। मनुष्य में संभावनाएं बहुत हैं। वह बहुत तरल होता है। उसमें संवेदनाएं बहती रहती हैं, इसलिए उसमें बदलाव की अपार संभावनाएं हैं। वह परिस्थितियों के शिकार भी होता है और उसे बदल भी देता है। खैर। तब तक मांडवी एक्सप्रेस आने की सूचना हो गई थी। ट्रेन आयी और हम सब सवार हुए। चार स्टेशन के बाद कुडाल स्टेशन आया। हम सब आटो से कुडाल बस स्टैंड और वहां से बस पकड़ कर मालवण के लिए चल पड़े। मालवण वेस्टर्न घाट का ही एक हिस्सा है। महाराष्ट्र की बसों में सीनियर सिटीजन का आधा किराया लगता है। कुडाल से बस चली तो थोड़ी दूर तक तो गांव घर मिलते रहे। फिर बस जंगल से होकर गुजरने लगी और पहाड़ की ऊंचाई को नापने के लिए चढ़ने लगी। सुहाना मौसम, आम की मंजरियों से भरा जंगल, वासंती हवा। कल वसंत पंचमी भी थी। बिहार में ठंड पड़ रही होगी, लेकिन यहां मौसम सुखद अहसास से भरा हुआ था। हम लोग मालवण बस स्टैंड उतरे। वहां से सेवागंन। सेवागंन समाजवादियों के द्वारा बनाई गई संस्था है और यह समुद्र के किनारे पर स्थित है। मेरे कमरे के बाहर थोड़ी जगह, एक सड़क और फिर समुद्र की ऊंची ऊंची लहरें। ये लहरें किनारे पर आती हैं। हर लहर रेत पर एक चिट्ठी लिखती है और दूसरी उसे मिटाती है। अज्ञेय ने सागर की विभिन्न मुद्राओं पर कई कविताएं लिखी हैं। सागर मुद्रा 12 शीर्षक कविता की कुछ पंक्तियां हैं - लहर पर लहर पर लहर पर लहर : सागर, क्या तुम जानते हो कि तुम क्या कहना चहाते हो? टकराहट, टकराहट, टकराहट : पर तुम तुम से नहीं टकराते; कुछ ही तुम से टकराता है और टूट जाता है जिसे तुम ने नहीं तोड़ा। सागर पर पक्षी ऊपर ही ऊपर उड़ जाते हैं, सागर पर मछलियाँ नीचे ही नीचे तैरती हैं, नावें, जहाज़ पर वे सतह को ही चीरते हुए चले जाते हैं- वह भी घाट से घाट तक। ईएमएस / 26 जनवरी 26