एक जांबाज पत्रकार, वो शख्सियत जिसकी विश्वसनीयता ने भारत में विदेशी ब्रॉडकास्टर बीबीसी को वो पहचान दिलाई जो दुनिया में शायद ही किसी को मिली हो। यारों का यार होकर भी रिपोर्टिंग करते वक्त उसूलों से समझौता न करने वाली रिपोर्ट के धनी मार्क टली भारत में ही जन्मे भारत की मिट्टी में आखिरी सांस भी ली। फक गोरा होकर भी भारतीय परिवेश में रंगे टली जब फर्राटेदार कवरेज करते तो बरबस ही मुंह से निकलता ये गोरा कोई कैसा लंदन का। जीवन में जो सादगी, विनम्रता सहजता, संतुलन और सरलता उनमें बेमिशाल थी। दिखावे और ठाठ-बाट से दूर रहने वाले मार्क का जन्म 24 अक्टूबर 1935, टालीगंज, कोलकाता में हुआ और आखिरी सांस देश की राजधानी नई दिल्ली में 25 दिसंबर 2026 को ली। भारत को लेकर विदेशियों की राय भी प्रायः अलग-अलग रहती है। पत्रकार बिरादरी तो और भी अलग नजरिए से देखती है। भारत को कभी आध्यात्म तो कभी ऐसा देश समझते हैं जहां काफी कुछ ठीक नहीं लगता। लेकिन मार्क का नजरिया भारत के प्रति हमेशा से अलग रहा। उन्होंने न भारत को पर्यटन स्थल समझा और न ही विदेशियों की भांति उपनिवेशवादी मानसिकता से देखा। वो तो एक चलता, फिरता, हाड़मांस का पुतला बनकर भारत में रहे, जो दिखा वही लिखा और कहा। इसी विशेषता ने भारत में इतना भरोसेमंद और लोकप्रिय बना दिया कि एक समय आया और अभी भी है कि कहीं भीतर या मोहल्ले की गुप्त बातें भी साझा होती हैं तो कहा जाता कि बीबीसी लंदन की पक्की खबर है, गलत कैसे होगी! इतनी विश्वनीयता वह भी उस दौर में जब भारतीय मीडिया पूरी तरह से सरकार के नियंत्रण में थी के बहुत कुछ मायने हैं। निश्चित रूप से मार्क टली के निधन से भारत ने अपना एक सच्चा दोस्त खो दिया है। मार्क टली के पिता एक रईस अंग्रेज थे जो व्यापारिक एजेंसी, गिलैंडर्स एंड अर्बुथनोट में वरिष्ठ भागीदार थे। ये तबकी बहुत बड़ी कंपनी थी जो कोयला खदानों, रेलवे और बीमा कंपनी का काम करती थी। उनकी मां का जन्म बांग्लादेश में हुआ था। बचपन के दस साल भारत में बिताया लेकिन भारतीयों से मिलने-जुलने की उन्हें आजादी नहीं थी। स्कूल शिक्षा खातिर उन्हें इंग्लैंड जाना पड़ा जहां ट्वाईफोर्ड स्कूल, मार्लबोरो कॉलेज और ट्रिनिटी हॉल तथा कैम्ब्रिज में पढ़े। धर्मशास्त्र का अध्ययन किया। विचार पादरी बनने का था लेकिन दो सत्रों के बाद ही इसे बदला और 1964 में बीबीसी में शामिल हुए। 1960 के दशक में आकाशवाणी का बोलबाला था। मेल्विल डी मेलो जैसे बड़े नाम रेडियो पर राज करते थे। आकाशवाणी और रेडियो सीलोन का दबदबा था। ऐसे में रेडियो प्रसारण में जगह बनाना आसान नहीं था। लेकिन मार्क टली की निष्ठा, लगन थी जो कर दिखाया। तमाम कठिनाइयों, सरकारी दबाव के बावजूद 1965 का भारत-पाकिस्तान युद्ध, 1971 का मुक्ति युद्ध और बांग्लादेश का जन्म, 1975 का आपातकाल, 1980 के दशक का पंजाब विद्रोह और 5 जून, 1984 का ऑपरेशन ब्लू स्टार कवर कर न केवल वो खास मुकाम बनाया बल्कि उन्हें इतिहास का प्रत्यक्ष गवाह बनने का मौका भी मिला। अन्य चर्चित कवरेजों में इंदिरा गांधी की हत्या, सिख विरोधी दंगे, राजीव गाँधी की हत्या एवं बाबरी मस्जिद विध्वंस भी रहे। आपातकाल में निष्पक्षता के चलते इन्दिरा गाँधी उन्हें गिरफ्तार करना चाहती थीं तो कुछ दिनों के लिए लंदन चले गए। 1975 के आपातकाल पर उनकी पुस्तक ‘इंडियाज अनएंडिंग जर्नी’ तो 1978 के प्रयागराज कुंभ का व्यापक कवरेज और उनकी पुस्तक ‘नो फुल स्टॉप्स इन इंडिया’ पर इस सबसे बड़े मेले का पूरा वृतांत काफी चर्चाओं में रहा। मार्क टली को दक्षिण एशिया की पूरी जानकारी और समझ थी। इन देशों में व्यापक भ्रमण और कवरेज किया। जहां भी जाते केवल प्रशासनिक या राजनीतिक जानकारियां भर नहीं जुटाते बल्कि वहां के भू-भाग, सामाजिक ताने-बाने, संस्कृति, रीति-रिवाज भाषा, दाना-पानी, परंपरा और खान-पान से भी जुड़, समझ, उसे अनुभव करते। उनकी सादगी ने उन्हें एक अद्वितीय पत्रकार बनाया। पूरी उम्र उनके व्यक्तित्व में कहीं कोई अहंकार नहीं दिखा। भारतीय वेशभूषा उन्हें बेहद पसंद थी। इतनी कि लंदन जाते तो कई बार विशेष स्थानों पर बिना टाई लगाए ही पहुंच जाते जहां यह अनिवार्य थी। वहां उन्हें रिसेप्शन पर उधार लेनी पड़ता। वो भारत की सबसे बड़ी ताक़त उसकी स्थिरता को जबकि सबसे बड़ी खूबी विभिन्न धर्मावलंबियों की एकजुटता को मानते रहे। वो भारत को वो भूमि मानते जहां पहाड़, रेगिस्तान, समुंदर के किनारे हैं। भारत में इंगलैंड जैसी मॉडर्न पुलिसिंग के पक्षधर मार्क थानेदार प्रणाली से नाखुश रहते। वो भारत में अंग्रेजों के जमाने से जारी बाबूगिरी को नाकाम मानते रहे। गांवों तक से उन्हें शिकायत मिलती कि बाबू लोग सुनवाई नहीं करते क्योंकि उनकी अब भी लोगों के ऊपर राज करने की सोच नहीं बदली है। उनकी संवेदनशीलता की यही बानगी उन्हें पत्रकार बिरादरी में सबसे अलग जगह दिलाती है। मार्क टली हों या बीबीसी लंदन ये जुमला आज भी विश्वनीयता का पर्याय बना हुआ है। 2002 में नाइटहुड से सम्मानित और 2005 में पद्म भूषण से नवाजे गए सर मार्क टली, प्रेस क्लब ऑफ इंडिया और इंडिया इंटरनेशनल सेंटर का एक जाना-पहचाना चेहरा थे जहां हमेशा बातचीत खातिर उपलब्ध रहते। वाकई नारद के इस वंशज को आधुनिक नारद अवतार कहा जाए तो बेजा नहीं होगा। (यह लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं इससे संपादक का सहमत होना अनिवार्य नहीं है) .../ 28 जनवरी /2026