देशभर में विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) ने शिक्षा संस्थानों के लिए जो नए नियम लागू किए हैं, उसको लेकर देश भर में भारी विरोध देखने को मिल रहा है। उच्च शिक्षा व्यवस्था में विश्वास, विचारधारा, सरकार की उपेक्षा जातिगत एवं धार्मिक भेदभाव के कारण पिछले एक दशक से उच्च शिक्षा संस्थानों में छात्र-छात्राओं के बीच में भारी रोष देखने को मिल रहा था। जो नए नियम लागू किए गए हैं उसके बाद उच्च शिक्षा संस्थानों में पढ़ने वाले सभी वर्ग के छात्रों में उसकी तीव्र प्रतिक्रिया देखने को मिल रही है। यह उच्च शिक्षा संस्थानों के लिए एक गंभीर सवाल बन चुका है। ‘प्रमोशन ऑफ इक्विटी इन हायर एजुकेशन इंस्टीट्यूशन रेगुलेशन्स, 2026’ के नाम से 13 जनवरी को जो नई व्यवस्था अधिसूचित की गई है, उसका उद्देश्य भले ही कैंपस में भेदभाव खत्म करना बताया जा रहा हो, लेकिन इसके क्रियान्वयन और दायरे को लेकर स्वर्ण वर्ग और सामान्य वर्ग की आशंकाएं गहरा गई हैं। ब्राह्मण वर्ग द्वारा जिस तरह का विरोध प्रदर्शित किया जा रहा है, उसके बाद दिल्ली स्थित उच्च शिक्षा अनुदान आयोग (यूजीसी) के मुख्यालय की सुरक्षा बढ़ा दी गई, देश के कई राज्यों में प्रदर्शन, इस्तीफे, प्रतीकात्मक विरोध, चूड़ियां भेजना और सोशल मीडिया पर पक्ष और विपक्ष को लेकर आलोचना और समर्थन यह सभी विरोध के संकेत हैं। इसकी क्रिया और प्रतिक्रिया सीमित दायरे तक नहीं है। उत्तर प्रदेश के बरेली में एक वरिष्ठ अधिकारी का इस्तीफा और करणी सेना द्वारा भारत बंद की चेतावनी, यह दर्शाती है, मामला अब शिक्षा नीति से आगे सामाजिक और राजनीतिक स्थिति को प्रभावित कर रहा है। नए नियमों के तहत सभी विश्वविद्यालयों और कॉलेजों में समान अवसर केंद्र गठित किए जाएंगे। इसके लिए एक समिति बनाई जाएगी जिसमें सभी वर्गों का प्रतिनिधित्व होगा। विशेष शिकायत समितियां, 24 घंटे की हेल्पलाइन और निगरानी तंत्र का प्रावधान किया गया है। इनका मुख्य उद्देश्य अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग के छात्रों से जुड़ी शिकायतों के तुरंत निराकरण के लिए होगा। सरकार और यूजीसी का तर्क है, कि यह कदम इसलिए जरूरी है, क्योंकि पिछले कुछ वर्षों में जाति आधारित भेदभाव की शिकायतों में भारी वृद्धि हुई है। उच्च शिक्षा संस्थानों में उच्च वर्ग के लोगों द्वारा एसटी, एससी और अन्य वर्ग के छात्रों को प्रताड़ित किए जाने की घटनाएं बढ़ रही थी। इसको लेकर सुप्रीम कोर्ट ने इस दिशा में मजबूत कानून बनाकर कार्यवाही करने के निर्देश दिए थे। उच्च शिक्षा अनुदान आयोग द्वारा जो नए नियम लागू किए जा रहे हैं उनमें सामान्य श्रेणी के खिलाफ झूठी शिकायतें तथा कमेटी में सामान्य वर्ग को प्रतिनिधित्व नहीं होने के कारण इस मामले ने तूल पकड़ लिया है। असंतोष के पीछे नियमों के उद्देश्य से अधिक उनके स्वरूप और व्याख्या को लेकर है। जनरल कैटेगरी के छात्रों और शिक्षकों का कहना है, इन प्रावधानों में अस्पष्टता है। शिकायत दर्ज कराने की प्रक्रिया एकतरफा है। सामान्य वर्ग के लिए बचाव का कोई मौका नहीं है। विरोध करने वालों का आरोप है, नए नियमों के तहत सवर्ण छात्रों को ‘स्वाभाविक अपराधी’ की तरह देखा जा रहा है, जिससे कैंपस में भय और अविश्वास का माहौल बन सकता है। झूठी या दुर्भावनापूर्ण शिकायतों से बचाव के लिए स्पष्ट सुरक्षा प्रावधानों का अभाव एक बड़ी चिंता है। इसके अलावा एक वर्ग का यह भी मानना है, कि सरकार ने जो नए नियम लागू किए हैं उसमें छात्रों के साथ-साथ शिक्षण संस्थानों को भी दंडित किए जाने का प्रावधान किया गया है। इस तरह की घटनाओं पर सरकार उच्च शिक्षा संस्थानों को मिलने वाले अनुदान और अन्य सहायता को रोक सकता है। इसको लेकर उच्च शिक्षा संस्थानों के प्रबंधन में भी चिंता देखी जा रही है। शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने सरकार का पक्ष रखते हुए स्पष्ट किया है, कि किसी के साथ भेदभाव या अत्याचार नहीं होगा। कानून का दुरुपयोग किसी भी स्तर पर स्वीकार नहीं किया जाएगा। उन्होंने भरोसा दिलाया है, पूरी व्यवस्था संविधान के दायरे में रहेगी। सवाल यह है, क्या आश्वासन पर्याप्त हैं? जब नियम ज़मीनी स्तर पर लागू होंगे, तब संस्थागत समितियों को मिले व्यापक अधिकार कहीं मनमानी का रास्ता तो नहीं खोलेंगे। जिस तरह से एक वर्ग विशेष को संरक्षित करने के लिए जो भी कानून बनाए जाते हैं, इसका दुरुपयोग बड़े पैमाने पर होता है लाभ बहुत कम स्तर पर ही मिल पाता है। इसके पहले जो भी नियम और कानून इस तरह के बने हुए हैं उसके परिणामों को देखते हुए यह आशंका स्वाभाविक है। शिक्षा का परिसर संवाद, विचार और समान अवसर का स्थान होना चाहिए। उच्च शिक्षा संस्थानों में डर, आरोप-प्रत्यारोप का भेदभाव रोकना निस्संदेह आवश्यक है। पिछले एक दशक में उच्च शिक्षा संस्थानों में एक वर्ग विशेष की विचारधारा को लेकर जो माहौल बनाया गया है, उसके बाद स्थिति दिन-प्रतिदिन बिगड़ती चली जा रही है। उच्च शिक्षा संस्थानों में विचारों का आदान-प्रदान खुले रूप से होना चाहिए। पिछले 6 दशक से उच्च शिक्षा संस्थानों में विभिन्न विचारधारा के लोगों द्वारा परिसर में एक साथ रहते और पढ़ते हुए एक दूसरे को समझने का अवसर मिलता था। पिछले एक दशक में इसका अभाव देखने को मिल रहा है। वर्तमान में उच्च शिक्षा संस्थानों में जिस तरह का माहौल है। उसको नियंत्रित करने के स्थान पर जो नए नियम बनाए गए हैं उसमें जातिगत भेदभाव को मुख्य आधार बना दिया गया है, जिसके कारण नए नियमों का लाभ कम और नुकसान ज्यादा होगा। बनाए गए नियम अगर नए प्रकार के भेदभाव की भावना पैदा करने वाले होंगे, तो उद्देश्य पर प्रश्नचिह्न लगना स्वाभाविक है। जरूरत इस बात की है, कि (यूजीसी) और सरकार, उच्च शिक्षा संस्थानों के सभी हितधारकों, छात्रों, शिक्षकों, प्रशासन और सामाजिक समूहों में खुला संवाद हो। नियमों की भाषा और प्रक्रिया को लेकर सभी वर्ग को भरोसे में लिया जाए। झूठी शिकायतों पर रोक, कार्यवाही के पहले सुनवाई का पर्याप्त अवसर, सभी वर्गों को शिकायत करने का अधिकार, के साथ संतुलित प्रावधान किए जाने चाहिए। वर्तमान विरोध से यह संकेत मिलता है, शिक्षा नीति केवल काग़ज़ी नियम कानून से नहीं सुधारी जा सकती है। उच्च शिक्षा संस्थानों में विश्वास, पारदर्शिता और निष्पक्षता का विश्वास सभी वर्गों के बीच में बने। नियमों का नैतिकता के साथ पालन हो। कोई भी नियम कितने ही नेक इरादे से बनाया गया हो। उस पर विश्वास नहीं होने पर वह विवाद का कारण बनता है। सरकार और यूजीसी के सामने चुनौती है, वह विरोध को टकराव में बदलने के पूर्व संवाद का माध्यम बनाएं। शिक्षा व्यवस्था को सचमुच समावेशी व न्यायपूर्ण बनाने की दिशा में ठोस कदम उठाएं। उच्च शिक्षा संस्थानों में किसी भी विषय में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता हो। यदि किसी एक विचारधारा को लादने का प्रयास होगा। तभी जाकर इस तरह की स्थितियां निर्मित होती हैं। ज्ञान का जाति-धर्म से कोई लेना-देना नहीं होता है। ज्ञान मेहनत से और विचारों की स्वतंत्रता से ही हासिल किया जा सकता है। उच्च शिक्षा संस्थानों को सीमित विचार से बाधित करना ज्ञान को बाधित करने जैसा है। ईएमएस / 28 जनवरी 26