- डॉलर की दादागिरी के आगे बेबस रुपया! - ‘मजबूत अर्थव्यवस्था’ के दावों के बीच रुपये की ऐतिहासिक फिसलन - टैरिफ का तगड़ा असर, ट्रंप फैक्टर भी जिम्मेदार - शेयर बाजार भी सहमा नई दिल्ली (ईएमएस)। भारतीय रुपये को गुरुवार को बड़ा झटका लगा, जब वह अमेरिकी डॉलर के मुकाबले रिकॉर्ड निचले स्तर 92.00 तक फिसल गया। डॉलर की मजबूत मांग, एशियाई मुद्राओं की कमजोरी और वैश्विक अनिश्चितताओं के बीच रुपया अब तक के सबसे कमजोर स्तर पर पहुंच गया है। यह गिरावट ऐसे समय में आई है, जब सरकार अर्थव्यवस्था की मजबूती के दावे कर रही है। इंटरबैंक विदेशी मुद्रा बाजार में रुपया 91.95 पर खुला और शुरुआती कारोबार में ही 92.00 के स्तर तक टूट गया। बुधवार को भी रुपया 31 पैसे की गिरावट के साथ 91.99 पर बंद हुआ था, जो अपने आप में अब तक का सबसे कमजोर क्लोजिंग स्तर था। फॉरेक्स बाजार विशेषज्ञों के अनुसार, रुपये की गिरावट के पीछे सबसे बड़ा कारण अमेरिकी डॉलर की वैश्विक मजबूती है। अमेरिकी फेडरल रिजर्व द्वारा ब्याज दरों को फिलहाल स्थिर रखने के संकेत के बाद डॉलर इंडेक्स में मजबूती आई है, जिससे उभरते बाजारों की मुद्राओं पर दबाव बढ़ गया। इसके साथ ही, एशियाई मुद्राओं में व्यापक कमजोरी और भू-राजनीतिक तनावों ने निवेशकों को सुरक्षित निवेश की ओर मोड़ दिया है। नतीजतन, डॉलर की मांग बढ़ी और रुपया कमजोर होता चला गया। विशेषज्ञों का कहना है कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा भारत के निर्यात पर भारी टैरिफ लगाए जाने के बाद से रुपये पर अतिरिक्त दबाव बना हुआ है। इस साल अब तक रुपया करीब 2 प्रतिशत कमजोर हुआ है, जबकि टैरिफ एलान के बाद इसमें लगभग 5 प्रतिशत तक की गिरावट दर्ज की जा चुकी है। सीआर फॉरेक्स एडवाइजर्स के मैनेजिंग डायरेक्टर अमित पाबरी के मुताबिक, कच्चे तेल की कीमतों में तेजी भी रुपये के लिए परेशानी बढ़ा रही है। इस सप्ताह ब्रेंट क्रूड में 4 प्रतिशत से ज्यादा की बढ़त दर्ज की गई है और यह 69.30 डॉलर प्रति बैरल के स्तर पर पहुंच गया है। अमेरिका द्वारा ईरान को लेकर संभावित सैन्य कार्रवाई की चेतावनी के बाद तेल आपूर्ति बाधित होने की आशंका बढ़ी है। भारत एक बड़ा तेल आयातक देश है, ऐसे में तेल की महंगाई सीधे रुपये की सेहत पर असर डालती है। फॉरेक्स बाजार में 92.00 का स्तर तकनीकी रूप से बेहद अहम माना जा रहा है। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि यह स्तर स्थायी रूप से टूटता है, तो रुपया 92.20 से 92.50 तक और फिसल सकता है। हालांकि, भारतीय रिजर्व बैंक के संभावित हस्तक्षेप से गिरावट कुछ हद तक थम सकती है और रुपया 91.00–91.20 की ओर लौट सकता है। रुपये की कमजोरी का असर शेयर बाजार पर भी दिखा। शुरुआती कारोबार में बीएसई सेंसेक्स 343 अंक गिरकर 82,001 के स्तर पर आ गया, जबकि निफ्टी 94 अंकों की गिरावट के साथ 25,248 पर कारोबार करता दिखा। हालांकि, विदेशी संस्थागत निवेशकों द्वारा 480 करोड़ रुपये की खरीद ने बाजार को कुछ सहारा दिया। दिलचस्प बात यह है कि इसी बीच दिसंबर 2025 में औद्योगिक उत्पादन 7.8 प्रतिशत की दर से बढ़ा, जो दो साल का उच्चतम स्तर है। इसके बावजूद रुपये की गिरावट ने यह सवाल खड़ा कर दिया है कि मजबूत आंकड़ों के बावजूद भारतीय मुद्रा क्यों लगातार कमजोर हो रही है। अब नजरें आरबीआई की रणनीति और वैश्विक हालात पर टिकी हैं। क्या रुपया संभलेगा या डॉलर की दादागिरी और गहराएगी।