लेख
31-Jan-2026
...


हालिया आर्थिक सर्वेक्षण ने एक साथ दो तस्वीरें देश के सामने रखी हैं। पहली तस्वीर बताती है, भारत की जीडीपी वृद्धि दर लगभग 6–7 प्रतिशत के आसपास बनी हुई है। देश दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने की ओर बढ़ रहा है। दूसरी तस्वीर दिखाती है कि इसी दौरान आयात निर्यात व्यापार घाटा लगातार 250–280 अरब डॉलर के दायरे में अटका हुआ है। हाल में जारी आर्थिक सर्वेक्षण आंकड़े के रुझान बताते हैं, यह घाटा 300 अरब डॉलर से और भी बढ़ सकता है। सवाल यह है, तेज आर्थिक वृद्धि के बावजूद यह घाटा स्थाई क्यों बना हुआ है? यह अंतर भारत की अर्थव्यवस्था के लिए बड़ी चुनौती है। सर्वे के अनुसार भारत का वैश्विक माल निर्यात में हिस्सा अभी भी 2 प्रतिशत से कम है। आर्थिक विकास के दौरान निर्यात में कोई सफलता भारत को नहीं मिली। 2019 में लगभग 19 ट्रिलियन डॉलर का निर्यात व्यापार था जो अब बढ़कर करीब 24 ट्रिलियन डॉलर तक पहुँचा है। दुनिया का व्यापार पाँच साल में लगभग 4–5 ट्रिलियन डॉलर की रफ्तार से बढ़ा है। भारत का निर्यात 2019 के अनुपात में आज भी टिका हुआ है। इसके उलट भारत में आयात तेज़ी से बढ़ रहा है। क्रूड ऑयल, इलेक्ट्रॉनिक्स, कैपिटल गुड्स, केमिकल्स और सोना, चांदी जैसे सेक्टर में आयात बिल बढ़ता चला जा रहा है। तेल सेक्टर में भारत लगभग 85प्रतिशत आयात पर निर्भर है। इसलिए रुपये में आई गिरावट से आयात बिल में हजारों करोड़ रुपये का अतिरिक्त बोझ भारतीय अर्थव्यवस्था में पड़ रहा है। पिछले एक दशक में मेक इन इंडिया और पीएलआई जैसी योजनाओं के बावजूद ना तो हम अपने देश की मांग को पूरा कर पा रहे हैं और ना ही विदेश मे निर्यात बढ़ा पा रहे हैं। 2019 में जो स्थिति थी वह आज भी बनी हुई है। उदाहरण के तौर पर इलेक्ट्रॉनिक्स का निर्यात जरूर बढ़ा है। उसमें बड़ा हिस्सा आयातित सामग्री का है। इसका नतीजा यह हुआ, जिन इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों का भारत निर्यात कर रहा है, उसकी असेंबलिंग भारत में होती है। असली कमाई कंपोनेंट बनाने वाले देशों में चली जाती है। यही कारण है, निर्यात वॉल्यूम इंडेक्स लगभग 179 होने के बावजूद यूनिट वैल्यू इंडेक्स करीब 164 पर अटकी हुई है। जो भारत के निर्यात में कमजोर प्राइसिंग पावर को दर्शाता है। इस कमी की भरपाई सेवा निर्यात सेक्टर से कुछ हद तक हो रही है। आईटी और अन्य सेवाओं से करीब 260 अरब डॉलर का और प्रवासी भारतीयों से लगभग 100–125 अरब डॉलर की आय हो रही है। वह आयात निर्यात के व्यापार घाटे का 70–80 से संतुलित भरपाई कर रहा है। इसलिए चालू खाता घाटा जीडीपी के लगभग 1प्रतिशत के आसपास बना हुआ दिखता है। यह संतुलन नाजुक स्थिति पर पहुंच गया है। एआई जैसी तकनीक के कारण लो-एंड आईटी सेवाओं की मांग घटने की दिशा में भारत की आर्थिक स्थिति बहुत खराब होगी। सेवा अधिशेष 260 से फिसलकर 200 अरब डॉलर पर आया, तो पूरा आर्थिक समीकरण बिगड़ सकता है। निर्यात के क्षेत्र में भारत को दोहरा नुकसान उठाना पड़ रहा है। इंजीनियरिंग गुड्स, टेक्सटाइल, जेम्स-ज्वेलरी और एग्री कमोडिटी हम भारत से निर्यात करते हैं। बहुत कम क्षेत्रों में वैश्विक मोनोपोली है। नतीजा विदेशी खरीददार भारत के सामान की कीमत तय करता है। भारतीय निर्यातकों में प्रतिस्पर्धा होने का लाभ भी आयातक को मिलता है। आर्थिक सर्वेक्षण का संकेत साफ है। भारत की अर्थव्यवस्था अभी घरेलू मांग और सेवा निर्यात से चल रही है। नाकि वैश्विक विनिर्माण के क्षेत्र में भारत का कोई बेहतर स्थान नहीं है। जब तक उच्च तकनीक, रिसर्च आधारित और कंपोनेंट स्तर पर भारत निर्माण के क्षेत्र में आगे नहीं बढ़ेगा, तब तक आर्थिक विकास में जीडीपी के बढ़ने के बाद भी भारत को आर्थिक चुनौतियों का सामना करना पड़ेगा। तेज विकास के साथ आयात को नियंत्रित करना भारत में तकनीकी रोजगार और सेवा के क्षेत्र में रिसर्च मॉडल में वृद्धि करते हुए आयात पर निर्भरता कम करना, भारतीय निर्यात को बढ़ाना, स्थायी व्यापार घाटा को नियंत्रित करने पर ही हम अपनी आर्थिक स्थिति को ठीक-ठाक कर पाएंगे। बजट के पहले जो आर्थिक सर्वेक्षण के आंकड़े आए हैं, वे भारतीय अर्थव्यवस्था की भयावह तस्वीर को उजागर कर रहे हैं। आर्थिक सर्वेक्षण के आंकड़े बता रहे हैं, पिछले 7 साल से भारत की अर्थव्यवस्था आयात और निर्यात में भारी अंतर है। जीडीपी जरूर आर्थिक विकास को दर्शा रही है, लेकिन आयात-निर्यात वाले आंकड़े बड़ी चिंता पैदा करने वाले हैं। सरकार को इस स्थिति को देखते हुए विशेष प्रयास करने की जरूरत है। सरकार को इस वास्तविकता को देखना, ऒर स्वीकार करना होगा। ईएमएस / 31 जनवरी 26