लेख
31-Jan-2026
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मणिपुर के इंफाल पश्चिम जिले का छोटा सा गांव कौत्रुक चिंग लेइकाई आज भी उस डर के साथ जी रहा है, जिसे देश के बाकी हिस्सों में शायद ही कोई महसूस कर सके। राजधानी इंफाल से महज 25 किलोमीटर दूर बसा यह गांव घाटी और पहाड़ की सीमा पर स्थित आखिरी बस्ती है। इसके आगे पहाड़ शुरू हो जाते हैं और यहीं से मणिपुर की सबसे जटिल और खतरनाक कहानी जन्म लेती है। मई 2023 में भड़की जातीय हिंसा के दौरान यह गांव सबसे ज्यादा प्रभावित इलाकों में शामिल था, लेकिन ढाई साल बाद भी यहां हालात पूरी तरह सामान्य नहीं हो पाए हैं। गोली नहीं चल रही, बम नहीं गिर रहे, लेकिन चैन की नींद आज भी लोगों के लिए सपना बनी हुई है। गांव के लोग बताते हैं कि हर रात पहाड़ियों की ओर से अजीबोगरीब आवाजें आती हैं। कभी जानवरों जैसी चीखें, कभी सामूहिक शोर। आरोप है कि कुकी उग्रवादी इन आवाजों के जरिए गांव में दहशत फैलाने की कोशिश करते हैं ताकि लोग मानसिक रूप से टूट जाएं और गांव खाली करने पर मजबूर हो जाएं। गांव में रहने वाली बीए पैथी संगठन से जुड़ी सविना तैमा कहती हैं कि गांव की आबादी करीब 300 है, जिनमें 57 परिवार रहते हैं। किसी भी कोने में कोई घटना होती है, उसका असर सबसे पहले हमारे गांव में दिखता है। डर यहां स्थायी मेहमान बन चुका है। कौत्रुक चिंग लेइकाई का सामरिक महत्व भी कम नहीं है। यह गांव राष्ट्रीय राजमार्ग के बेहद करीब है और यहां से पहाड़ी इलाकों तक पहुंच आसान है। स्थानीय लोगों का आरोप है कि इसी वजह से कुकी उग्रवादी इस इलाके पर नजर बनाए हुए हैं। गांव की युवा महिला मिनिया बताती हैं कि सुरक्षा बल मौजूद हैं, लेकिन डर खत्म नहीं होता। रोज रात को उकसाने की कोशिश होती है ताकि किसी प्रतिक्रिया के बहाने हालात फिर बिगाड़े जा सकें। सरकारी आंकड़ों और बयानों में भले ही कहा जा रहा हो कि मणिपुर में स्थिति धीरे-धीरे सामान्य हो रही है, लेकिन जमीनी सच्चाई कुछ और ही कहानी कहती है। सितंबर 2023 और फिर 2024 में हुई घटनाओं में कई लोग घायल हुए, एक महिला की मौत भी हुई। एक ग्रामीण बताते हैं कि खेत में काम करते समय गोली उनके दाहिने पैर को छूते हुए निकल गई। इसके बाद महीनों तक इलाज चला। बम भले न गिर रहे हों, लेकिन साहस भी पूरी तरह लौट नहीं पाया है। लोग अब भी डर के साये में जी रहे हैं। मणिपुर की यह हिंसा केवल एक गांव या एक जिले की कहानी नहीं है। यह उस गहरे सामाजिक और राजनीतिक टकराव का नतीजा है, जो दशकों से सुलग रहा था और 2023 में विस्फोट के रूप में सामने आया। राज्य की आबादी का बड़ा हिस्सा मैतेई समुदाय का है, जो घाटी क्षेत्रों में रहता है। वहीं कुकी और अन्य जनजातीय समुदाय पहाड़ी इलाकों में बसे हैं। यही भौगोलिक बंटवारा इस संघर्ष की जड़ है। मैतेई समुदाय की सबसे बड़ी मांग अनुसूचित जनजाति का दर्जा पाने की है। उनका तर्क है कि राज्य का करीब 90 प्रतिशत क्षेत्र पहाड़ियों का है, जहां वे जमीन नहीं खरीद सकते। घाटी सिर्फ 10 प्रतिशत भूभाग में सिमटी है और बढ़ती आबादी के कारण वहां जमीन, रोजगार और संसाधनों पर दबाव लगातार बढ़ रहा है। मैतेई समाज यह भी मानता है कि अवैध अफीम की खेती और ड्रग्स तस्करी ने मणिपुर को अस्थिर किया है और इसका बड़ा हिस्सा पहाड़ी इलाकों से जुड़ा है। वे राज्य की भौगोलिक अखंडता को लेकर भी बेहद संवेदनशील हैं और किसी भी तरह के अलग प्रशासन या विभाजन का खुलकर विरोध करते हैं। दूसरी ओर कुकी समुदाय खुद को लगातार हाशिए पर धकेला हुआ महसूस करता है। उनका कहना है कि राज्य सरकार और प्रशासन मैतेई बहुल होने के कारण निष्पक्ष नहीं है। हिंसा के दौरान कुकी बहुल इलाकों में सैकड़ों घर, चर्च और फार्महाउस जलाए गए। हजारों लोग विस्थापित होकर राहत शिविरों में रहने को मजबूर हुए। इसी अनुभव के बाद कुकी संगठनों ने अलग प्रशासन या केंद्रशासित क्षेत्र जैसी मांग उठाई। उनके लिए यह केवल राजनीतिक मांग नहीं, बल्कि सुरक्षा और अस्तित्व का सवाल बन चुका है। सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि जब भी शांति वार्ता या हालात सुधरने की बात सामने आती है, उसके कुछ ही समय बाद किसी न किसी हिस्से में हिंसा फिर भड़क उठती है। इससे यह सवाल उठता है कि आखिर शांति के बाद भी उपद्रव क्यों होता है। इसका जवाब सिर्फ जातीय तनाव में नहीं, बल्कि उन ताकतों में छिपा है, जिनके हित अस्थिरता से जुड़े हुए हैं। मणिपुर लंबे समय से सशस्त्र उग्रवादी संगठनों की गतिविधियों का केंद्र रहा है। घाटी और पहाड़ी दोनों इलाकों में सक्रिय ये संगठन शांति को अपने अस्तित्व के लिए खतरा मानते हैं। हिंसा के माहौल में ही उनकी पकड़ मजबूत रहती है। इसके अलावा मणिपुर गोल्डन ट्रायंगल के नजदीक स्थित है, जहां ड्रग्स, हथियार और अवैध कारोबार का बड़ा नेटवर्क सक्रिय है। अस्थिरता इस पूरे नेटवर्क के लिए सबसे मुफीद जमीन साबित होती है। राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी भी इस आग को बुझने नहीं दे रही। निर्णायक और निष्पक्ष फैसलों की जगह अक्सर हालात को टालने या संभालने की नीति अपनाई गई। इससे अविश्वास और गहरा होता गया। प्रशासनिक स्तर पर भी एकरूपता की कमी साफ नजर आती है। एक ही राज्य में अलग-अलग समुदायों के लिए अलग-अलग सुरक्षा और नियम लोगों के मन में भेदभाव की भावना पैदा करते हैं। इस पूरे संघर्ष में सबसे ज्यादा नुकसान आम लोगों का हुआ है। महिलाएं और बच्चे आज भी राहत शिविरों में जीवन बिता रहे हैं। बच्चों की पढ़ाई प्रभावित हुई है, खेती और व्यापार ठप पड़े हैं और सामाजिक ताना-बाना बिखर चुका है। कौत्रुक चिंग लेइकाई जैसे गांवों में लोग न तो पूरी तरह सुरक्षित महसूस करते हैं और न ही गांव छोड़ने का फैसला कर पा रहे हैं। मणिपुर की आग बुझाने के लिए केवल सुरक्षाबलों की तैनाती या अस्थायी शांति पर्याप्त नहीं होगी। जरूरत है भरोसे की बहाली की, निष्पक्ष संवाद की और उस राजनीतिक साहस की जो दोनों समुदायों की आशंकाओं को सुने और संतुलित समाधान दे सके। जब तक घाटी और पहाड़ के बीच भरोसे की दीवार नहीं गिरेगी, तब तक कौत्रुक जैसे गांवों की रातें यूं ही डर में कटती रहेंगी। आज मणिपुर एक ही सवाल पूछ रहा है कि क्या शांति सिर्फ बंदूकों की खामोशी है या लोगों के दिलों में लौटता सुकून। जब तक लोग चैन से सो नहीं पाते, तब तक यह मान लेना कि मणिपुर में हालात सामान्य हो गए हैं, सच्चाई से मुंह मोड़ने जैसा होगा। मणिपुर की आग अभी बुझी नहीं है, वह बस धीमी आंच पर सुलग रही है, और अगर समय रहते सही कदम नहीं उठाए गए, तो यह चिंगारी फिर भड़क सकती है। (वरिष्ठ पत्रकार,साहित्यकार,स्तम्भकार) (यह लेखक के व्य‎‎‎क्तिगत ‎विचार हैं इससे संपादक का सहमत होना अ‎निवार्य नहीं है) .../ 31 जनवरी /2026