31-Jan-2026
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- धर्म : सिध्द चक्र महामंडल विधान में मुनि प्रमाण सागर जी के प्रवचन जबलपुर (ईएमएस)। सिद्धों की आराधना करते करते अपने भीतर के उस सिद्ध परमात्मा की तरफ दृष्टि जगा लूं, सिद्ध चक्र महामंडल विधान करने का यही उद्देश्य है, उपरोक्त उदगार मुनि श्री प्रमाण सागर महाराज ने विधान के प्रथम दिवस व्यक्त किये। मुनि श्री ने कहा कि इस महामंडप मेंबैठकर बड़ा अच्छा लग रहा है,ऐसा प्रतीत हो रहा है,मानो हम साक्षात सिद्धों के इस महान सिद्धायतन में विराजमान है, मुनि श्री ने कहा कि इसे केवल आठ दिवसीय अनुष्ठान के रूप में न देखें,सच्चे अर्थों में देखा जाए तो यह अनुष्ठान हमारे जीवन के रूपांतरण की प्रक्रिया है,इसमें अंतर्निहित संदेशों और संकेतों को समझकर हम अपने जीवन में आमूलचूल रूपांतरण घटित कर सकते हैं, सिद्ध चक्र महामंडल विधान जैन धर्म का सबसे श्रेष्ठ तथा महिमाशाली विधान है सिद्ध चक्र महामंडल विधान का एक रूप हमें बाहर दिख रहा है,और दूसरा रूप जिसे हमें पहचानना है, सिद्ध चक्र यानी सिद्धों का समूह एक चित्र नहीं हमारीमुक्ति यात्रा का मानचित्र है,इसमें उन सब शक्तियों को अंतरर्निहित किया गया है। जिससे एक आत्मा परमात्मा को प्राप्त करती है। उस मंडल की संरचना यहां रखी गई। इसका मांत्रिक, यांत्रिक और तांत्रिक जगत में तो महत्व है ही। इसका आध्यात्मिक मूल्य भी बहुत ज्यादा है. मुनिश्री ने आगे कहा कि निरहम, यह एक ऐसा बीज है जो केवल ज्ञान को प्रकट करता है हम लोग जब भगवान के पंच कल्याणक में ज्ञान कल्याणक की प्रारंभिक क्रिया शुरू करते हैं तो सबसे पहले नाभि में इसी बीज को अंकित करते हैं क्योंकि यह केवल ज्ञान का बीज है।कर्म के हनन के लिए अपने भीतर ऐसी शक्ति को जो उद्घाटित करते हैंउनके जीवन में ही अध्यात्म का प्रकाश प्रकट होता है।इसके चारों तरफ अ से लेकर ह तक सारे अक्षर है। अ आ इ आदि थोड़ा मुझे मंडल देना। मुनी श्री ने मंडल की व्याख्या करते हुये कहा कि आप लोग के पास मंडल है। और इस मंडल में मुख्य रूप से पंच परमेष्ठी है। इसमें आप स्क्रीन में देखिए सबसे बाहरी हिस्से में यहां विभिन्न प्रकार के मंत्रों के साथ पंच परमेष्ठी की आराधना, सम्यक दर्शन, सम्यक ज्ञान, सम्यक चारित्र और सम्यक तपकी बात यानी पांच परमेष्ठी और चार आराधना नौ पद की मूल आराधना है। इसके चारों तरफ अनाहत विद्या करके नमोकार मंत्र की पूरी चर्चा है और अ से लेकर ह तक सभी अक्षरों का विन्यास है। इस बात का प्रतीक है कि संसार के जितने भी मंत्र हैं वे अ से लेकर के ह तक ही बने। मुनी श्री ने कहा कि सिध्द चक्र की साधना का यह फल कहा गया है कि जो नित्य सिद्ध चक्र की आराधना करता है वह शीघ्र ही मुक्ति को प्राप्त करता है। सिद्ध चक्र की आराधना महामंडल 108 के साथ होंना था, यहां आज देखिए एक दो नहीं बल्कि122 मंडल के साथ पहली बार होने जा रहा है,विधान एक पूजन मात्र नहीं है, उन्होंने पूजन और विधान में अंतर है?जहां केवल पूजा की प्रक्रिया हो उसका नाम पूजन, लेकिन पूजन के साथ जहां जप, आराधनाऔर हवन हो उसका नाम विधान। सिद्ध चक्र आत्मा की शुद्ध, बुद्ध, निरंजन और पवित्र अवस्था का नाम है।हमें अपने भीतर उसे उद्घाटित करने का भाव जगाने चाहिए तथा एक आध्यात्मिकदृष्टि के साथ देखने की कोशिश कीजिए। केवल बाहर की क्रियाओं में मत उलझिए,अंदर की प्रक्रिया को जानने की कोशिश कीजिए। राष्ट्रीय प्रवक्ता अविनाश जैन विद्यावाणी एवं सुवोध कामरेड ने बताया कि प्रातःकालीन बेला में 6:30 बजे मंगलाष्टक के साथ अभिषेक एवं शांतिधारा की गई. तत्पश्चात विधान प्रारंभ हुआ एवं आठ अधर्य समर्पित किये गये, तथा मध्यान्ह में शंकासमाधान कार्यक्रम संपन्न हुआ। सुनील साहू / शहबाज/ 31 जनवरी 2026