लेख
01-Feb-2026
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हाल ही में माननीय सुप्रीम कोर्ट ने मेंस्ट्रुअल हाईजीन( मासिक धर्म स्वच्छता) को संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन के अधिकार का अहम हिस्सा मानते हुए एक ऐतिहासिक फैसला सुनाया है,जो कि काबिले-तारीफ है। कोर्ट ने बिल्कुल साफ यह बात कही है कि लड़कियों और महिलाओं को गरिमापूर्ण जीवन जीने के लिए मासिक धर्म के दौरान स्वच्छ और सुरक्षित सुविधाएं मिलना जरूरी है। यहां पाठकों को स्पष्ट करता चलूं कि अनुच्छेद 21 भारतीय संविधान का एक अत्यंत महत्वपूर्ण अनुच्छेद है, जो प्रत्येक व्यक्ति को जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार प्रदान करता है। इस अनुच्छेद के अनुसार-किसी व्यक्ति को उसके जीवन या व्यक्तिगत स्वतंत्रता से विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया के अनुसार ही वंचित किया जा सकता है। इसका सीधा सा मतलब यह है कि राज्य किसी भी व्यक्ति के जीवन या स्वतंत्रता में मनमाने ढंग से हस्तक्षेप नहीं कर सकता; ऐसा केवल कानून के तहत, न्यायसंगत और उचित प्रक्रिया अपनाकर ही किया जा सकता है। यहां पाठकों को यह भी बताता चलूं कि समय के साथ सुप्रीम कोर्ट ने अनुच्छेद 21 की व्याख्या को व्यापक बनाया है। आज यह केवल शारीरिक अस्तित्व तक सीमित नहीं है, बल्कि गरिमापूर्ण जीवन को भी समाहित करता है। इसके अंतर्गत स्वास्थ्य का अधिकार, स्वच्छ पर्यावरण, स्वच्छ पेयजल, शिक्षा, गोपनीयता, आजीविका(रोज़गार), आवास, त्वरित न्याय, मानवीय कार्य-स्थितियाँ, महिला सुरक्षा और मासिक धर्म स्वच्छता जैसे अधिकार शामिल माने गए हैं। इस प्रकार, अनुच्छेद 21 नागरिकों के मूल अधिकारों की रीढ़ या यूं कहें कि यह भारतीय संविधान की आत्मा है और लोकतांत्रिक शासन में मानव गरिमा की रक्षा का सशक्त आधार प्रदान करता है। दरअसल, हाल ही में इसी सोच के साथ माननीय सुप्रीम कोर्ट ने यह निर्देश दिया है कि स्कूलों में छात्राओं को मुफ्त और आसानी से मिलने वाले सैनिटरी पैड उपलब्ध कराए जाएं, ताकि मासिक धर्म की वजह से उनकी पढ़ाई और सेहत प्रभावित न हो। यहां पाठकों को यह भी बताता चलूं कि यह फैसला जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस आर. महादेवन की बेंच ने सुनाया है ।कोर्ट ने कहा कि मासिक धर्म स्वच्छता तक पहुंच न होना लड़कियों के गरिमा और निजता के अधिकार का हनन है। इसकी वजह से कई बार लड़कियां स्कूल जाने से कतराती हैं, अनुपस्थित रहती हैं या पढ़ाई ही छोड़ देती हैं। माननीय न्यायालय ने शिक्षा को एक मल्टीप्लायर राइट बताया, यानी ऐसा अधिकार जो बाकी सभी मानवाधिकारों के उपयोग का रास्ता खोलता है। अगर शिक्षा बाधित होती है, तो अन्य अधिकार भी कमजोर पड़ जाते हैं।भारतीय स्कूलों में शौचालयों की स्थिति के राष्ट्रीय आंकड़ों की यदि हम यहां पर बात करें तो इसके अनुसार, लगभग 1.47 करोड़ यू-डाइस वर्ष 2024-25 की रिपोर्ट में यह दिखाया गया है कि लगभग 96.8% स्कूलों में लड़कियों के लिए शौचालय हैं (और 95.3% फंक्शनल) तथा 94.5% स्कूलों में लड़कों के लिए शौचालय मौजूद हैं (90.7% कार्यशील), जो कि पिछले वर्षों की तुलना में एक सकारात्मक संकेत है कि मूलभूत स्वच्छता सुविधाओं का कवरेज बेहतर हुआ है। हालाँकि, अन्य रिपोर्टों में यह भी सामने आया है कि लगभग 67,000 स्कूलों में कार्यशील टॉयलेट की कमी है, जिनमें अधिकतर सरकारी स्कूल शामिल हैं, जिससे साफ-सुथरे और सुरक्षित शौचालय की उपलब्धता में कमी बनी हुई है। इसके अलावा, विशेष आवश्यकताओं वाले छात्रों के लिए दिव्यांग-अनुकूल टॉयलेट केवल लगभग 30-35% स्कूलों में ही मौजूद व कार्यशील हैं, जिससे समावेशी सुविधाओं में और सुधार की आवश्यकता स्पष्ट होती है। कुछ क्षेत्रों में अभी भी कई सरकारी स्कूलों में कार्यशील शौचालयों की कमी है। जैसे कर्नाटक में लगभग 3,580 सरकारी स्कूलों में शौचालय काम नहीं कर रहे हैं और लगभग 4,000 में हाथ धोने की सुविधाएँ भी नहीं हैं।इन आंकड़ों से स्पष्ट होता है कि भारत में अधिकांश स्कूलों ने शौचालयों को उपलब्ध कराया है और उनमें से अधिकतर काम भी कर रहे हैं, लेकिन करीब 5-10% स्कूलों में अभी भी कार्यशील सुविधाओं की कमी और विशेष जरूरतों वाले छात्रों के लिए उपयुक्त सुविधाओं की गंभीर कमी बनी हुई है, जो नीति-निर्माताओं और प्रशासकों के लिए प्राथमिकता का विषय है। हाल फिलहाल,सुप्रीम कोर्ट ने यह बात मानी है कि शौचालयों की कमी, पानी और साबुन की अनुपलब्धता, मासिक धर्म पर सामाजिक चुप्पी और संसाधनों का अभाव लड़कियों की शिक्षा में बड़ी रुकावट हैं। कोर्ट ने साफ कहा है कि इन बाधाओं को दूर करना राज्य की जिम्मेदारी है। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि मासिक धर्म स्वच्छता तक पहुंच जीवन और स्वास्थ्य के अधिकार का अभिन्न हिस्सा है और हर लड़की को सुरक्षित मासिक धर्म प्रबंधन तथा स्वस्थ प्रजनन जीवन का पूरा अधिकार है। गौरतलब है कि माननीय कोर्ट ने सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को यह साफ निर्देश दिए हैं कि हर स्कूल चाहे वह ग्रामीण हो या शहरी, सरकारी हो या निजी में लड़कियों और लड़कों के लिए अलग-अलग शौचालय हों, शौचालयों में पर्याप्त पानी, साबुन और कार्यशील हैंडवॉश सुविधा हो, स्कूलों में मानकों के अनुसार ऑक्सो-बायोडिग्रेडेबल सैनिटरी नैपकिन मुफ्त में उपलब्ध कराए जाएं। कोर्ट ने यह बात कही है कि ये पैड स्कूल टॉयलेट या तय स्थान पर आसानी से मिलें, मासिक धर्म स्वच्छता प्रबंधन (एमएचएम) कॉर्नर बनाए जाएं, जरूरत पड़ने पर अतिरिक्त यूनिफॉर्म, इनरवियर और डिस्पोजेबल बैग उपलब्ध हों तथा साथ ही साथ छात्राओं, शिक्षकों और स्कूल स्टाफ को मासिक धर्म और स्वच्छता को लेकर प्रशिक्षण व जागरूकता दी जाए।यह एक कटु सत्य और चिंताजनक है कि आज भी हमारे देश के कई स्कूलों में लड़कियों के लिए शौचालयों की व्यवस्था या तो अपर्याप्त है या अनुपयोगी बनी हुई है। यह विडंबना ही है कि आज भी ग्रामीण और दूरदराज़ इलाकों में अनेक स्कूलों में या तो लड़कियों के लिए अलग शौचालय उपलब्ध नहीं हैं, या फिर हैं तो पानी, साफ-सफ़ाई और सुरक्षा का अभाव है। कई जगह शौचालयों के दरवाज़े,कमोड,नल,फर्श आदि टूटे होते हैं, इनकी नियमित साफ-सफ़ाई नहीं होती और सैनिटरी पैड निस्तारण की कोई व्यवस्था नहीं होती। ऐसे हालात में किशोरावस्था की लड़कियों को खासकर मासिक धर्म के दौरान भारी कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है, जिसका सीधा असर उनकी स्कूल में उपस्थिति, स्वास्थ्य और आत्मसम्मान पर पड़ता है। यही कारण है कि कई छात्राएँ इस उम्र में स्कूल छोड़ने को मजबूर हो जाती हैं। हालाँकि, अच्छी बात यह है कि सरकार की ओर से स्वच्छ भारत अभियान, समग्र शिक्षा अभियान और हालिया न्यायिक हस्तक्षेपों के तहत सुधार के काफी प्रयास किए गए हैं, लेकिन ज़मीनी स्तर पर क्रियान्वयन अभी भी कमजोर है। आवश्यकता इस बात की है कि केवल शौचालय बनाकर ही नहीं, बल्कि उनकी निरंतर देखरेख, स्वच्छता, पानी की उपलब्धता और जागरूकता पर भी गंभीरता से काम किया जाए। जब तक स्कूलों में लड़कियों के लिए सुरक्षित, स्वच्छ और सम्मानजनक शौचालय सुनिश्चित नहीं होंगे, तब तक लैंगिक समानता और शिक्षा का अधिकार अधूरा ही रहेगा।बहरहाल, अपने फैसले में कोर्ट ने बेहद संवेदनशील टिप्पणी करते हुए यह बात कही कि यह आदेश सिर्फ कानून के लिए नहीं है, बल्कि उन लड़कियों के लिए है जो मदद मांगने में झिझकती हैं, उन शिक्षकों के लिए है जो मदद करना चाहते हैं, लेकिन संसाधनों की कमी से बंधे रहते हैं, और उन माता-पिता(पेरेंट्स) के लिए है जो इस विषय पर अक्सर चुप्पी साध लेते हैं। कोर्ट ने कहा कि उसके शब्द सिर्फ अदालत या कानून की किताबों तक सीमित न रहें, बल्कि आवश्यकता इस बात की है कि समाज की सोच बदलनी चाहिए। उल्लेखनीय है कि यह मामला कांग्रेस नेत्री, सामाजिक कार्यकर्ता व पेशे से डॉ.जया ठाकुर द्वारा दायर एक जनहित याचिका से जुड़ा है, जिसमें यह मांग की गई थी कि सरकारी और सरकारी सहायता प्राप्त स्कूलों में कक्षा 6 से 12 तक की छात्राओं को मुफ्त सैनिटरी पैड दिए जाएं और उनके सुरक्षित व सम्मानजनक निपटान की व्यवस्था हो। सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार ने अदालत को बताया कि उसने स्कूली छात्राओं की मासिक धर्म स्वच्छता सुनिश्चित करने के लिए राष्ट्रीय स्तर की नीति तैयार कर ली है। अब डॉ.जया ठाकुर की याचिका पर सुनवाई करते हुए माननीय सुप्रीम कोर्ट ने यह निर्देश दिया है कि इस नीति को पूरे देश के सरकारी और सरकारी सहायता प्राप्त स्कूलों में लागू किया जाए। दरअसल,कोर्ट ने जोर देकर यह बात कही है कि अवसरों की समानता का मतलब है कि हर बच्ची को बिना किसी बाधा के शिक्षा पाने का समान अवसर मिले। स्कूलों में लड़कियों के लिए अलग शौचालय न होना और उन्हें सैनिटरी पैड न मिलना शिक्षा के अधिकार(राइट टू एजुकेशन) का उल्लंघन है। अदालत ने साफतौर पर यह बात कही कि मासिक धर्म की वजह से स्कूल न जा पाने में बच्चियों की कोई गलती नहीं है और उन्हें अपने शरीर को बोझ समझने पर मजबूर नहीं किया जाना चाहिए। माननीय सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला काबिले-तारीफ है और निश्चित ही कोर्ट के इस फैसले से महिला सशक्तीकरण को बल मिलेगा। कहना ग़लत नहीं होगा कि माननीय सुप्रीम कोर्ट ने यह स्पष्ट कर दिया है कि स्कूलों में मासिक धर्म स्वच्छता सुविधाएं देना अब कोई नीति या सुविधा का विषय नहीं है, बल्कि यह एक संवैधानिक अधिकार है। समाज की प्रगति इसी से आंकी जाएगी कि वह अपनी सबसे कमजोर बच्चियों की किस तरह रक्षा करता है। (सुनील कुमार महला, फ्रीलांस राइटर, कॉलमिस्ट व युवा साहित्यकार, पिथौरागढ़, उत्तराखंड।) ईएमएस / 01 फरवरी 26