कुश और लव कहते हैं कि महर्षि वाल्मीकि द्वारा निर्मित यह रामायण नामक सर्वश्रेष्ठ आख्यान उत्तरकाण्ड सहित इतना ही है। ब्रह्माजी ने भी इसका बड़ा आदर किया है। इस प्रकार भगवान श्रीरामचन्द्रजी पहले की ही भाँति अपने विष्णु स्वरूप से परमधाम में प्रतिष्ठित हुए। उनके द्वारा चराचर प्राणियों सहित समस्त त्रिलोकी व्याप्त है। ततो देवा: सगन्धर्वा: सिद्धाश्च परमर्षय:। नित्यं शृण्वन्ति संहृष्टा: कामं रामायणं दिवि।। वाल्मीकिरामायण उत्तरकाण्ड सर्ग. १११-३ उन भगवान के पावन चरित्र से युक्त होने के कारण देवता, गन्धर्व, सिद्ध और महर्षि सदा प्रसन्नतापूर्वक देवलोक में इस रामायण काव्य का श्रवण करते हैं। यह प्रबन्धकाव्य आयु तथा सौभाग्य में वृद्धि करता है और पापों का सर्वनाश करता है। रामायण वेद के समान है। विद्वान पुरुष को श्राद्धों में इसे पढ़कर सुनाना चाहिए। इसके पाठ से पुत्रहीन को पुत्र और धनहीन को धन प्राप्त होता है। जो प्रतिदिन इसके श्लोक के एक चरण का भी पाठ-पारायण करता है, वह सब पापों से मुक्त हो जाता है। इतना ही नहीं जो मनुष्य प्रतिदिन पाप करता है वह भी यदि इसके एक श्लोक का नित्य पाठ करें तो वह सारी पाप राशि से मुक्त हो जाता है। इसकी कथा को सुनाने वाले वाचक को वस्त्र, गौ और सुवर्ण की दक्षिणा देनी चाहिए। वाचक के संतुष्ट होने पर सभी देवता भी संतुष्ट हो जाते हैं। यह रामायण नामक प्रबन्धकाव्य आयु की वृद्धि करने वाला है। जो मनुष्य नित्य इसका पाठ करता है, उसे इस लोक में भी पुत्र-पौत्र की प्राप्ति होती है और मृत्यु के पश्चात् परलोक में भी उसका बड़ा सम्मान होता है। जो प्रतिदिन एकाग्रचित्त होकर प्रात:काल, मध्याह्न, अपराह्न अथवा सायंकाल में रामायण का पाठ करता है उसे कभी कोई दु:ख नहीं होता है। श्रीरघुनाथजी को अयोध्यापुरी उनके जाने के बाद बहुत दिनों तक सूनी पड़ी रहेगी। फिर राजा ऋषभ के समय यह आबाद होगी। एतदाख्यानमायुष्यं सभविष्यं सहोत्तरम्। कृतवान् प्रचेतस: पुत्रस्तद् ब्रह्माप्यन्वेमन्यत:।। वाल्मीकिरामायण उत्तरकाण्ड सर्ग १११-११ प्रचेता के पुत्र महर्षि वाल्मीकिजी ने अश्वमेध यज्ञ की समाप्ति के बाद की कथा एवं उत्तरकाण्ड सहित रामायण नामक इस ऐतिहासिक काव्य का निर्माण किया है। ब्रह्माजी ने भी इसका अनुमोदन किया है। इस काव्य के एक सर्ग का श्रवण करने मात्र से मनुष्य एक हजार अश्वमेध और दस हजार वाजपेय यज्ञों का फल प्राप्त कर लेता है। जिसने इस लोक में रामायण की कथा सुन ली, उसने मानों प्रयाग आदि तीर्थों, गंगा आदि पवित्र नदियों, नैमिषारण्य आदि वनों और कुरुक्षेत्र आदि पुण्य क्षेत्रों की यात्रा पूरी कर ली। जो सूर्यग्रहण के समय कुरुक्षेत्र में एक भार सुवर्ण का दान करता है और जो लोक में प्रतिदिन रामायण सुनता है, वे दोनों समान पुण्य के भागी होते हैं, जो कोई उत्तम श्रद्धा से भरकर श्री रघुनाथजी की कथा श्रवण करते हैं वह सब पापों से मुक्त हो जाता है और विष्णुलोक में जाता है। इतना ही नहीं जो पूर्वकाल में वाल्मीकिजी द्वारा निर्मित इस आर्षरामायण आदिकाव्य का सदा भक्तिभाव से श्रवण करता है, वह भगवान विष्णु का सारूप्य प्राप्त कर लेता है। इसके श्रवण से स्त्री, पुत्रों की प्राप्ति होती है, धन और संतति की वृद्धि होती है। इसे पूर्णत: सत्य समझकर मन को वश में रखते हुए इसका श्रवण करना चाहिए। यह परम उत्तम रामायणकाव्य गायत्री का स्वरूप है। इतना ही नहीं उसके पिता, पितामह, प्रपितामह, वृहद प्रपितामह तथा उनके भी पिता भगवान विष्णु को प्राप्त कर लेते हैं, इसमें कोई संशय नहीं है। चतुर्वर्गप्रिदं नित्यं चरितं राघवस्य तु। तस्माद् यत्नवता नित्यं श्रोतव्यं परमं सदा।। वाल्मीकिरामायण उत्तरकाण्ड १११-२३ श्री राघवेन्द्रजी का यह चरित्र सदा धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष चारों पुरुषार्थों को देने वाला है। इसलिए प्रतिदिन यत्नपूर्वक निरन्तर इस उत्तम काव्य का श्रवण करना चाहिए। ईएमएस/01/02/2026