* भारत बना वैश्विक मंच पर पर्यावरण संरक्षण का अग्रदूत, गुजरात के ‘छारी-ढंड’ को मिली रामसर मान्यता गांधीनगर (ईएमएस)| हर वर्ष 2 फ़रवरी को पूरे विश्व में ‘विश्व वेटलैंड दिवस’ मनाया जाता है। वेटलैंड्स अर्थात् जलप्लावित क्षेत्र पृथ्वी की पारिस्थितिकी का एक अनिवार्य हिस्सा हैं, जो जैव विविधता के संरक्षण और पर्यावरणीय संतुलन बनाए रखने में आधारभूत भूमिका निभाते हैं। इस दिवस का मुख्य उद्देश्य झीलों, नदियों, दलदली क्षेत्रों और तटीय भागों के संरक्षण के प्रति वैश्विक जागरूकता फैलाना है। वर्ष 1971 में ईरान के रामसर शहर में वेटलैंड्स के संरक्षण हेतु एक अंतरराष्ट्रीय संधि पर हस्ताक्षर किए गए, जिसे ‘रामसर कन्वेंशन’ कहा जाता है। भारत वर्ष 1982 में इस संधि से जुड़ा और तब से वेटलैंड संरक्षण के प्रयास निरंतर सशक्त होते गए हैं। आज भारत पर्यावरण संरक्षण और विकास के संतुलित मॉडल के रूप में वैश्विक मंच पर उभर कर सामने आया है। वर्ष 2026 की विशेष थीम: सांस्कृतिक विरासत का उत्सव वर्ष 2026 के लिए विश्व वेटलैंड दिवस की थीम है - “Wetlands and Traditional Knowledge: Celebrating Cultural Heritage” अर्थात “वेटलैंड्स और परंपरागत ज्ञान: सांस्कृतिक विरासत का उत्सव”। यह थीम भारत की सभ्यतागत पहचान से सीधे जुड़ी हुई है। भारत की सभ्यता सदियों से नदियों और सरोवरों के किनारे फली-फूली है। जल संरक्षण और वेटलैंड प्रबंधन से जुड़ा हमारे पूर्वजों का परंपरागत ज्ञान आज भी प्रासंगिक है। सरकार आधुनिक विज्ञान के साथ इस पारंपरिक ज्ञान को जोड़कर सतत विकास का मार्ग प्रशस्त कर रही है। इस थीम के अंतर्गत स्थानीय आदिवासी और ग्रामीण समुदायों की उस सांस्कृतिक व आध्यात्मिक आस्था को भी रेखांकित किया गया है, जो पीढ़ियों से इन प्राकृतिक संसाधनों के सच्चे संरक्षक रहे हैं। भारत की रामसर साइट्स: एक ऐतिहासिक उपलब्धि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारत में रामसर साइट्स की संख्या में अभूतपूर्व वृद्धि हुई है। जनवरी 2026 तक के आंकड़ों के अनुसार, गुजरात के कच्छ स्थित ‘छारी-ढंढ’ और उत्तर प्रदेश के ‘पटना पक्षी अभयारण्य’ को हाल ही में रामसर सूची में शामिल किया गया है। इसके साथ ही भारत में कुल 98 रामसर साइट्स हो गई हैं, जो दक्षिण एशिया में सर्वाधिक हैं। ये साइट्स लगभग 13.84 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में फैली हुई हैं। पश्चिम बंगाल का सुंदरबन भारत का सबसे बड़ा वेटलैंड है, जबकि हिमाचल प्रदेश का रेणुका सरोवर आकार में छोटा होते हुए भी जैव विविधता की दृष्टि से अत्यंत समृद्ध है। ये आंकड़े भारत की पारिस्थितिकी शक्ति का प्रमाण हैं। गुजरात का गौरव: ‘छारी-ढंढ’ की वैश्विक पहचान मुख्यमंत्री भूपेंद्र पटेल के मार्गदर्शन में गुजरात सरकार का वन एवं पर्यावरण विभाग वेटलैंड संरक्षण की दिशा में निरंतर कार्य कर रहा है। कच्छ के बन्नी क्षेत्र और महान रण के बीच स्थित ‘छारी-ढंढ’ का भारत की 98वीं रामसर साइट के रूप में चयन राज्य के लिए गौरव का विषय है। ‘छारी-ढंढ’ का अर्थ है खारे पानी का सरोवर, जो मानसून के दौरान हजारों एकड़ में फैल जाता है। यह क्षेत्र गूगल और कडायो जैसी दुर्लभ वनस्पतियों का प्राकृतिक आवास है। जैव विविधता और स्थानीय समुदायों की भूमिका छारी-ढंढ हर वर्ष सर्दियों में 30,000 से अधिक कॉमन क्रेन पक्षियों का स्वागत करता है, जो मध्य एशिया से लंबी दूरी तय कर यहां आते हैं। इसके अलावा यह गंभीर रूप से संकटग्रस्त सोशिएबल लैपविंग और कॉमन पोचार्ड जैसे पक्षियों का भी सुरक्षित आश्रय स्थल है। यह वेटलैंड सेंट्रल एशियन फ्लायवे में भारत की महत्वपूर्ण भूमिका को दर्शाता है। बन्नी क्षेत्र के मालधारी समुदाय पीढ़ियों से छारी-ढंढ के संरक्षक रहे हैं। सरकार द्वारा स्थानीय समुदायों और एनजीओ के सहयोग से आक्रामक प्रजातियों के नियंत्रण हेतु विशेष कार्ययोजना लागू की गई है। लगभग 80 वर्ग किलोमीटर में फैला यह क्षेत्र मानसून में जल से भर जाता है और सर्दियों में पक्षियों के कलरव से गूंज उठता है। गुजरात की पंचरत्न रामसर साइट्स गुजरात की पांच रामसर साइट्स राज्य की भौगोलिक विविधता को दर्शाती हैं: नल सरोवर - पेलिकन और फ्लेमिंगो के लिए विश्व प्रसिद्ध थोल पक्षी अभयारण्य - कृषि और प्रकृति के सामंजस्य का प्रतीक वढवाण झील - गायकवाड़ी शासन की दूरदर्शी जल प्रबंधन नीति का उदाहरण खीजड़िया - मीठे और खारे पानी के संगम का अनूठा पारिस्थितिकी तंत्र छारी-ढंढ - रेगिस्तान और जल का अद्भुत संगम प्रधानमंत्री की ‘अमृत धरोहर योजना’ के तहत इन क्षेत्रों में परंपरागत ज्ञान के उपयोग, ड्रोन सर्विलांस, सैटेलाइट मैपिंग और आक्रामक वनस्पतियों के नियंत्रण हेतु व्यापक कार्य किए जा रहे हैं। विकास भी, विरासत भी वेटलैंड्स केवल प्राकृतिक सौंदर्य नहीं, बल्कि जलवायु परिवर्तन से लड़ने में हमारे सबसे बड़े सहयोगी हैं। गुजरात सरकार इन्हें ‘पृथ्वी की किडनी’ मानती है, जो जल को शुद्ध करती हैं, भूजल स्तर बढ़ाती हैं और बाढ़ नियंत्रण में अहम भूमिका निभाती हैं। ‘विकास भी, विरासत भी’ के मंत्र के साथ सरकार इन अमूल्य प्राकृतिक धरोहरों को आने वाली पीढ़ियों के लिए सुरक्षित रखने हेतु संकल्पबद्ध है। विश्व वेटलैंड दिवस केवल एक उत्सव नहीं, बल्कि पर्यावरणीय न्याय और सतत विकास की दिशा में एक सशक्त कदम है। आइए, हम सब मिलकर इन प्राकृतिक ‘जल-तीर्थों’ का संरक्षण करें और भावी पीढ़ियों को एक हरित, सुरक्षित और समृद्ध भारत सौंपें। सतीश/01 फरवरी