लेख
04-Feb-2026
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अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भारत के साथ ट्रेड डील की पेशकश करके वैश्विक व्यापार पर हलचल पैदा कर दी है। उन्होंने भारत पर लगाए गए पारंपरिक टैरिफ को 50 प्रतिशत से घटाकर 18 प्रतिशत करने का प्रस्ताव रखा है। इसके साथ ही कहा गया है कि कुछ उत्पादों पर शून्य टैरिफ लागू किया जा सकता है, हालांकि अभी यह स्पष्ट नहीं है कि कौन से उत्पाद इसमें शामिल होंगे। इस तरह एक प्रकार से ट्रंप ने भारत सरकार को एक लॉलीपॉप दिया है, कि वह भारत के टैरिफ को शून्य कर देंगे। बहरहाल इस प्रस्ताव को लेकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भारत सरकार ने राहत जताई है, क्योंकि पिछले कई महीनों से दोनों देशों के बीच टैरिफ़ मुद्दे पर तनाव बना हुआ था। हालांकि, इस प्रस्ताव में कई जटिलताएं भी हैं। अमेरिका ने भारत से अगले 20 वर्षों में 500 अरब डॉलर के आयात का लक्ष्य निर्धारित किया है, जो भारतीय मुद्रा में लगभग 46 लाख करोड़ रुपए होता है। यह लक्ष्य भारत के लिए अत्यंत चुनौतीपूर्ण प्रतीत होता है। अमेरिका ने यह भी स्पष्ट किया कि भारत रूस और ईरान से तेल नहीं खरीदेगा और उसकी जगह वेनेज़ुएला से तेल की खरीदी करेगा। इसके साथ ही कृषि और डेयरी उत्पादों में अमेरिकी निर्यात को बढ़ावा मिलेगा। इस प्रस्ताव से भारतीय किसानों और घरेलू उद्योगों को गंभीर चिंता है। यदि अनाज, गेहूं, मक्का, डेयरी उत्पाद और अन्य प्रमुख कृषि उत्पाद अमेरिका से शून्य ड्यूटी पर आयात होते हैं, तो इससे घरेलू किसानों और डेयरी उत्पादकों को भारी नुकसान हो सकता है। अमेरिका के डेयरी उत्पादों में गायों और अन्य जानवरों को मांसाहारी भोजन दिया जाता है, जो धार्मिक और सामाजिक दृष्टिकोण से भारत में स्वीकार्य नहीं है। यही कारण था कि भारत सरकार अनाज और डेरी उत्पाद जैसे संवेदनशील क्षेत्रों में विदेशी बाजार को खोलने का सख्त विरोध करता रहा है। ऐसे में यह समझौता भारतीय किसानों के हितों के लिए गंभीर चुनौती बन सकता है। वहीं दूसरी तरफ अमेरिका की इस पेशकश से भारतीय शेयर बाजार को नई ऊर्जा मिली है। मंगलवार को शेयर बाजार मे रिकॉर्ड तोड़ तेजी देखने को मिली। मुंबई स्टॉक एक्सचेंज का कारोबार लगभग 2500 अंको की बढ़त के साथ कारोबार हुआ। डॉलर के मुकाबले रुपया भी मजबूत हुआ। अडानी और रिलायंस के शेयरों में भारी बढ़त देखने को मिली। इसके अलावा शेयर बाजार में हीरा, सोना, मशीनरी, स्टील, अल्युमिनियम, कॉपर, टेक्सटाइल और केमिकल कंपनियों के स्टॉक में तेजी देखने को मिली। यह दर्शाता है कि निवेशक इस कदम को भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए अवसर के रूप में देख रहे हैं। यही नहीं इस डील से भारत की विदेश नीति और अंतरराष्ट्रीय रिश्तों पर भी असर पड़ेगा। अमेरिका की इस डील के बाद रूस और ईरान से तेल आयात पर प्रतिबंध लग जाएगा, जबकि यूरोपीय संघ और चीन के साथ भारत के व्यापार और कूटनीतिक संबंधों में असमंजस की स्थिति उत्पन्न हो सकती है। ऊर्जा, तकनीकी और कृषि क्षेत्र में बड़े पैमाने पर अमेरिकी आयात बढ़ाने की मांग भारत की आर्थिक स्वतंत्रता और दीर्घकालीन रणनीति के लिए चुनौतीपूर्ण हो सकती है। इसलिए, भारत सरकार को इस मामले में संतुलित निर्णय लेने की आवश्यकता है। एक ओर यह डील आर्थिक स्थिरता और निवेश के नए अवसर ला सकती है, वहीं दूसरी ओर घरेलू उद्योग और किसानों के हितों की रक्षा करना भी अनिवार्य है। भारतीय नीति निर्माताओं को न केवल वर्तमान स्थिति बल्कि आने वाले दशकों में इसके प्रभावों को भी ध्यान में रखना होगा। सारांश यह है कि अमेरिका की यह सशर्त पेशकश अवसर और जोखिम दोनों लेकर आई है। इसे लेकर भारत को सावधानीपूर्वक निर्णय लेना होगा, ताकि व्यापारिक लाभ के साथ-साथ घरेलू हितों की रक्षा भी सुनिश्चित की जा सके। अंतरराष्ट्रीय दबाव और घरेलू संवेदनशीलताओं के बीच संतुलन बनाना अब भारत सरकार की सबसे बड़ी चुनौती बन गई है। ईएमएस / 04 फरवरी 26